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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

"सवाल-2"

कल बादल का एक छोटा सा टुकड़ा
बहती हवाओं के संग
पतझड़ के सूखे पत्ते की मानिन्द
मेरी छत पर आ गिरा
छुआ तो हल्के गीलेपन के साथ
रूह का सा अहसास था
रूह इसलिए…..,
क्योंकि वह दीखती कहाँ है ?
बस होने का अहसास भर देती है
सुनो……. !
तुम्हारी दुनियाँ में भी पतझड़ होता है ?
सुख-दुख , जीवन-मरण और पतझड
ये सब जीवन के साझी हैं
तुम……… ,
तुम भी नश्वर हो
फिर ये आदत कहाँ से लाए ?
अजर-अमर होने की .

      ×××××

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- "मीना भारद्वाज"