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गुरुवार, 11 मई 2017

"गंगा"

स्कूल से आते समय एक दिन गली में दो गोल -मटोल बच्चों को खेलते देखा,सोचा पड़ोस में  रिश्तेदारी में‎ कोई महिला आईं होंगी । बच्चे सभी मासूम होते हैं मगर उन के चेहरे पर एक अलग सी आत्मीयता भरी मुस्कान थी । रात को खाना खाने के बाद छत पर टहलने गई तो गली की सामने वाली खण्डहरनुमा हवेली के आंगन में रोशनी दिखाई दी,बरसों पुरानी हवेलियाँ कस्बों में देखभाल के अभाव में खण्डहरों में तब्दील हो जाती हैं जिनको कभी इनके मालिकों ने बड़े अरमानों से बनवाया होगा । दूर-दराज क्षेत्रों से व्यापार में धन कमा कर  यहाँ के निवासियों ने अपने रुतबे  का प्रदर्शन करने का शायद यही तरीका अपनाया हुआ था । आजीविका की तलाश  में इन हवेलियों के वंशज भी शहरों की ओर उन्मुख हुए और लौटने का रास्ता भूल गए। कभी-कभार ही कोई भटका मुसाफिर मोह में बँध कर लौटता है तो हैरानी ही होती है।  नीचे‎ उतर कर मैनें अम्मा‎ से पूछा --- ‘ सामने की हवेली में कौन आया है । ‘
                            ‘ गंगा  नाम की औरत आई है अपने दो बच्चों के साथ । पति नशा करता है  कभी काम करता कभी नही इसलिए ये  किसी के यहाँ खाना बनाने का काम करती है उन्ही लोगों ने हवेली का एक कमरा खुलवा दिया है । ‘ एक दिन गली में दिखी वह  अपने बच्चों‎ के साथ । बच्चों के जैसी ही उजली वैसी ही निश्च्छल और जीवन से भरपूर आत्मीय मुस्कुराहट   के साथ । उसकी और उसके बच्चों की मुस्कुराहट को मैं नज़रअन्दाज नही कर पाई और पूछ बैठी ---- “ गंगा आप कहाँ से ---  वाक्य पूरा होने से पहले ही खनकती आवाज़‎ कानों में गूंजी ---- दीदी पहाड़ से ।” घर में घुसते स्मित मुस्कान के साथ मैं सोच रही थी ----गंगा  पहाड़ से …., वास्तव में गंगा हिमालय‎ में अपने उद्गम गंगोत्री से निकल कर निचले मैदानी भूभागों में उतरती है  और यह गंगा भी उत्तरांचल से है।
                               अभावों में भी हँसती मुस्कुराती गंगा शादी-ब्याह के दिनों में अधिक व्यस्त हो जाती उसके मासूम और समझदार बच्चे हवेली के चबूतरे पर बैठे माँ की राह तकते। कई बार वहाँ‎ से निकलते उनकी प्रतीक्षा‎रत उदास‎ आँखें‎ देखी तो कभी कभी माँ के साथ खिलखिलाने के स्वर सुने । रोज के आने-जाने के रास्ते में वह हवेली होने के कारण  मेरा उनसे एक अलग सा रिश्ता हो गया था  ……., मुस्कुराहट का। गंगा को देख  कर कई बार सोचती  कि निश्च्छलता और सौम्यता की  यह अनुकृति कहाँ आ पहुँची। पति के साथ छोटे से प्रकृति के गोद में बसे गाँव को छोड़ते हुए कितने सपने होंगे इसकी आँखों में और कल्पना कर बैठी गंगोत्री से निकल कर कलकल ,छमछम कर इठलाती गुनगुनाती  हरिद्वार से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती गंगा नदी की।
                                         एक दिन बच्चों की अंगुली थामें मुझे ढूंढती गंगा मेरे सामने आ खड़ी हुई-”दीदी मैं जा रही हूँ‎।” कहाँ ? मैनें पूछा‎ । “पहाड़ पर  वहाँ अपने लोग हैं बच्चों का ख्याल रखने को । मजदूरी‎ वहाँ भी कर लूंगी इनको पढ़ाना लिखाना जरूरी  है ना….,मोटा खा-पहन कर काम चला लेंगे , यहाँ सब कुछ महंगा …, दम घुटता है यहाँ ।” अन्दर से अम्मा‎ की आवाज आई- “कौन है? “  मैनें कहा --”गंगा है अम्मा‎ , विदा लेने आई है।”  “ कहाँ जा रही है “बाहर निकलते  हुए उन्होने पूछा।
“वापस पहाड़ पर अम्मा‎ ! यहाँ इसका अस्तित्व‎ जो खो रहा है।”

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- "मीना भारद्वाज"