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गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

"दृष्टिकोण"

अक्सर पढ़ती हूँ तीज-त्यौहारों के संबन्धित विषयों
के बारे में..अच्छा लगता है भिन्न- भिन्न प्रान्तों के
रीति-रिवाजों के बारे में जानना । इन्द्रधनुषी सांस्कृतिक विरासत है हमारी ..संस्कृति की यही तो खूबी है कि
वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है । निरन्तरता में नव-पुरातन
घुल-मिल जाता है मिश्री और पानी की तरह मगर
उसका मूल नष्ट नही होता । इसी संस्कृति से हमारे
आचार विचार पोषित होते हैं । मगर मन खट्टा हो
जाता है जब इस तरह के क्रिया - कलापों की
आलोचनाएँ पढ़ती हूँ । नारी का साज-श्रृंगार
उसकी सुन्दरता के साथ साथ उसकी सम्पन्नता का
प्रतीक है । यही नहीं प्राचीनकाल का इतिहास यदि
चित्रों के माध्यम से समझने और देखने का प्रयास
करें तो पुरूष वर्ग भी महिला वर्ग के समान आभूषणों
से सजा दिखाई देता है ।
बाहरी आक्रमणकारियों के आने के बाद 'सोने की चिड़िया' हमारे देश की स्वर्णिम व्यवस्था चरमराई और
फिर रही सही कमी ब्रिटिशसरस् ने पूरी कर दी । 
आधुनिकता के नाम पर पायल , कंगन और अन्य वस्त्राभूषण को गुलामी या परतंत्रता का प्रतीक मानना ,
व्रत- पूजा पाठ को दकियानूसी विचार मानना  मुझे तो किसी भी नजरिए से तर्क संगत नजर नहीं आता । केवल विरोध करना है तो करना है यह एक अलग पहलू है ।
आज की अधिकांश महिलाएं शिक्षित और परिपक्व सोच रखती हैं यह उनके स्वविवेक पर निर्भर करता है कि
उन्हें क्या करना है ।
व्रत , उपासना , पूजा-अर्चना करना या ना करना उनकी व्यक्तिगत भावना और आध्यात्म से जुड़ाव की भावना है । रीति-रिवाजों के लिए जबरन विचार थोपे जाएँ तो यह अवश्य गलत होगा और इस तरह की बातों का विरोध भी पुरजोर होना चाहिए मगर स्वेच्छा से किये गए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यों की आलोचना अनुचित है ।  हमारे विचार किसी दूसरे के विचारों से मेल खायें या नहीं खायें
यह अलग विषय है लेकिन हमें दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए ।

★★★★★

32 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर और सारगर्भित आलेख, बिना किसी पर प्रहार किए,
    सही कहा आपने अपनी प्रज्ञा पर तोल कर ही प्रबुद्ध वर्ग अपना रहा है रिती-रिवाज ,
    चाहे आस्था के लिए या फिर परम्पराओं के निबाह के लिए ,जब तक बहुत असंग न हो किसी की आस्था पर प्रहार करना ठीक नहीं, हां किसीको अपना मत रखना हो तो शालिनता से रखिये, अगर अपनाने योग्य होगा तो लोग स्वयं विचार कर अपनाएंगे थोपने से नहीं।
    मीना जी आपके विचारों से मैं पूर्ण सहमत हूं ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी त्वरित प्रतिक्रिया के लिए हृदय की असीम गहराईयो से आभार कुसुम जी । आपकी सारगर्भित अनमोल प्रतिक्रिया से मेरे दृष्टिकोण को सार्थकता मिली । सस्नेह..

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार
      ज्योति जी ।

      हटाएं
  3. हमारे विचार किसी से मेल खाएं ना खाएं ये अगग बात है ,परंतु हमे दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए
    बिल्कुल सही मीणा जी सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से आलेख का मान बढ़ा ऋतु जी सादर आभार ..

      हटाएं
  4. मैं आपके विचारों से पूर्णतः सहमत हूँ।बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहनीय प्रतिक्रिया से लेखन का मान बढ़ाया आपने हृदय से आभार अनुराधा बहन !

      हटाएं
  5. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ४ अक्टूबर २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सृजन को पाँच लिंकों का आनंद में स्थान देने के आपका हार्दिक आभार ।

      हटाएं
  6. मीना जी !
    ब्लॉग की दुनिया मैं बिल्कुल ६ महीना पुराना और अनाड़ी हूँ। इस ब्लॉग की दुनिया में आपके कद का अंदाजा नहीं मुझे। पर एक छोटी मुँह बड़ी बात कहने के लिए गुस्ताख़ी माफ़ .. आपकी कथनी में ही तो विरोधाभास की झलक मिल रही है। आप अपने ही लेख को पुनः अवलोकन करने का कष्ट करें .. एक तरफ तो आप कह रही हैं कि -

    " हमारे विचार किसी दूसरे के विचारों से मेल खायें या नहीं खायें यह अलग विषय है लेकिन हमें दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए । "

    दूसरी तरफ आप ये भी कह रही हैं कि -

    " मन खट्टा हो जाता है जब इस तरह के क्रिया - कलापों की आलोचनाएँ पढ़ती हूँ । "

    जब आप विचार अभिव्यक्ति की पक्षधर हैं तो फिर आपका "मन खट्टा" नहीं होना चाहिए महोदया। बिल्कुल नहीं। सभी को अपने विचार , अपनी सोच को व्यक्त करने की आज़ादी है और उस से मन खट्टा जैसी बात नहीं उपजनी चाहिए।

    फिर आपने ये भी कहा (लिखा) है कि -

    " रीति-रिवाजों के लिए जबरन विचार थोपे जाएँ तो यह अवश्य गलत होगा और इस तरह की बातों का विरोध भी पुरजोर होना चाहिए मगर स्वेच्छा से किये गए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यों की आलोचना अनुचित है । "

    महोदया हमें तो सब से पहले राज राम मोहन राय जी को उस दिन रोक देना चाहिए था कि - भाई ! तुम बेकार बौखलाए हुए हो, जिसको अपनी संस्कृति बचा कर स्वेच्छा से "सती" होना है, तो होने दो उसको। तुम क्यों परेशान हो। फिर उन भगत सिंह जी को भी डांटना चाहिए कि - यार ! क्या फ़ालतू की नास्तिकता की बात ले कर तुम बड़बड़ कर रहे हो। यार ! लोग लालटेन की संस्कृति बचाने में लगे हैं और तुम एल ई डी जलाने की बात कर रहे हो।
    सुकरात को तो ज़हर दे दिया गया था क्यों कि ज़हर देने वालों की संस्कृति खतरे में थी।
    हम कंडे के कलम से लिखते- लिखते कंप्यूटर अपनाने में नहीं हिचकते , यहाँ हमारे कंडे के कलम वाली संस्कृति और जीन्स से धोती वाली संस्कृति,हिन्दी, ऊर्दू और अंग्रेजी अपनाने से संस्कृत वाली संस्कृति नहीं बिगड़ती है ... पर और बातों में संस्कृति के बिगाड़ने से मन खट्टा हो जा रहा है ...
    पहले मन को खट्टा होने से बचाइए, कहीं एसिडिटी न हो जाए ...
    आभार आपके विरोधाभास भरे लेख के लिए महोदया ...

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  7. शब्दों के चयन में सावधानी और मर्यादा का ख्याल रखते तो बेहतर होता ...एक शिक्षित व्यक्ति को यह कतई शोभा नही देता कि अपने को सही साबित करने के लिए वह अनावश्यक वाक्यों का प्रयोग करे ।
    सती होना... जहर देना स्वेच्छा की श्रेणी में नही आता महज किसी के विचारों की अभिव्यक्ति पर इतना आवेश भी अच्छा नही
    होता । आपकी आधुनिकता या क्रांतिकारी विचारधारा आपकी निजता है और मेरा दृष्टिकोण मेरा नजरिया । यही विविधता हमें इन्सान होने के नाते एक ही समाज का अंश साबित करती है । अपने विचारों का सम्मान चाहिए आपको तो दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखें । राजा राममोहन राय और भगत सिंह का सम्मान मैं आप से कहीं अधिक ही करती होऊँगी..इन महान विभूतियों के नाम पर हम और आप कौन होते हैं बराबरी का पाठ पढ़ाने वाले ...पहले स्वयं को सुधार लें वही काफी है । आभार आपकी खूबसूरत प्रतिक्रिया का । पहले पूरा लेख पढ़ा होता आपने तो इतने आवेशित नही होते... मैने यह भी लिखा है---
    "आज की अधिकांश महिलाएं शिक्षित और परिपक्व सोच रखती हैं यह उनके स्वविवेक पर निर्भर करता है कि
    उन्हें क्या करना है ।
    व्रत , उपासना , पूजा-अर्चना करना या ना करना उनकी व्यक्तिगत भावना और आध्यात्म से जुड़ाव की भावना है । रीति-रिवाजों के लिए जबरन विचार थोपे जाएँ तो यह अवश्य गलत होगा और इस तरह की बातों का विरोध भी पुरजोर होना चाहिए मगर स्वेच्छा से किये गए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यों की आलोचना अनुचित है । हमारे विचार किसी दूसरे के विचारों से मेल खायें या नहीं खायें
    यह अलग विषय है लेकिन हमें दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए ।"

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    उत्तर
    1. "शब्दों के चयन में सावधानी और मर्यादा का ख्याल रखते तो बेहतर होता ...एक शिक्षित व्यक्ति को यह कतई शोभा नही देता" ---
      आपकी ये बात तब सही मानी जाती , जब आप "मन खट्टा होने" जैसी बात नहीं करतीं। आपकी ये वाणी भी किसी को आहत कर सकती है, ऐसा सोचना चाहिए था।
      हम मूर्ख ही सही। पर कभी अपने विचार किसी पर थोपे नहीं। बस अपना विचार रखा।
      मैंने कभी नहीं कहा कि आडम्बर और अंधपरम्परा को देखकर मेरा मन खट्टा हुआ। मैंने किसी को रोका भी नहीं। कोई पायल पहने या बुर्क़ा, उसकी मर्जी है।
      मैंने जब भी कुछ लिखा बस अपने विचार को शब्द दिया, मन कभी खट्टा नहीं किया।
      मन तो आपके खट्टे हो रहे हैं। ये खट्टा होना गलत है महोदया ! बस ...
      आप अपने विचार रखिए ना। मैं आवेशित नहीं हूँ ,बस इंगित मात्र कर रहा था कि परेशानी आपको है, क्यों कि आपका मन खट्टा हो रहा है।
      आप कह रह रही हैं कि --
      "यह अलग विषय है लेकिन हमें दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए ।"
      पर आपने भी मन खट्टा जैसा लिख कर दूसरे को कितना सम्मान दे रहीं हैं, एक बार सोचिएगा ...

      हटाएं
    2. आप अगर किसी और के खट्टे मन की चिंता न करे तो बेहतर होगा। अगर आप को लगता है की आप मानवीय भावनाओ से ऊपर है तो बहुत अच्छी बात है।बस इतना ध्यान रखें की सही और गलत नाम की कोई चीज़ भी होती है - अगर हम किसी के अमानवीय कृत्यों पर भी मन खट्टा न करे तो ये हमारी मानवीयता की हार है । अगर आप को बुरी बात का भी बुरा न लगे तो आप को आत्ममंथन की दरकार है पर अगर आप में वो विवेक है तो आप तो महामानव हैं और मेरी और से आपको उस स्थिति में पहुँचने की हार्दिक शुभकामनाएं।

      हटाएं
    3. सही और गलत का पैमाना पहले आपको तय करनी चाहिए। आपकी व्यथा समझ से परे है। बात यहाँ विचारधारा की हो रही है और वह भी ब्लॉग जैसे खुले मंच पर। और आपकी शुभकामनाएं दी जा रही है कि किसी के खट्टे मन की चिंता ना की जाए। तरस आती है आपकी महान सोच पर कि मन खट्टे करने वाले को भी दुसरे के विचारधारा की इतनी मन में पैठ नहीं करनी चाहिए कि उसका मन खट्टा हो जाए।
      ये खुला मंच है भाई या चाचा जो भी हैं आप, यहाँ अगर आपका मन किसी की अलग विचारधारा वाली रचना या लेख से खट्टा हो सकता है तो सामने वाले को चिंता तो करनी होती है।
      पहले आप सही और गलत का पैमाना तय कर लीजिये फिर मानव और महामानव की बात किजिएगा।
      बुरी बात की परिभाषा जानने के लिए आपको मेरी हार्दिक शुभकामनाएं

      हटाएं
    4. १ "सही और गलत का पैमाना पहले आपको तय करनी चाहिए" - सही और गलत व्यक्ति विशेष परिभाषित नहीं करता अपितु वह एक शाश्वत परिभाषा होती है । वैसे ये "करनी" नहीं "करना" होगा। आप जैसे "महान" साहित्यकार को ऐसे त्रुटिया शोभा नहीं देती।
      २ "आपकी व्यथा समझ से परे है।" - आप नहीं समझ पाएंगे, ये आपके शब्दों से मैं समझ सकता हूँ, तो कृपया कष्ट न करें!
      ३ "और आपकी शुभकामनाएं दी जा रही है कि किसी के खट्टे मन की चिंता ना की जाए। " - आपका वाक्य पढ़ कर मुझे आश्चर्य हो रहा है। शुभकामाएं किसी और बात की थी और खट्टे मन की चिंता की बात किसी और सन्दर्भ में हो रही थी। मुझे आश्चर्य है की इतनी भरी भरकम टिपण्णी करने वाले और स्वघोषित साहित्यकार इतनी छोटी सी बात नहीं समझ पा रहे हैं। मुझे तो आपकी समझ पर तरस आ रही है। वैसे यहां भी "आपकी" नहीं "आपका" होगा।
      ४ "तरस आती है आपकी महान सोच पर कि मन खट्टे करने वाले को भी दुसरे के विचारधारा की इतनी मन में पैठ नहीं करनी चाहिए कि उसका मन खट्टा हो जाए।" - मैंने पहले भी कहा है की आप इस विषय में चिंता न करें। पता नहीं इस रचना ने आपकी ऐसी कौनसी कौन सी रग को छू दिया जो आप इतने विचलित हैं।
      ५ "ये खुला मंच है भाई या चाचा जो भी हैं आप" - ये इतना महत्वपूर्ण क्यों है ? अगर खुला मंच है तो सभी आमंत्रित है। आप भी किसी के चाचा भतीजे बन की ही आएं लगता है।
      ६ यहाँ अगर आपका मन किसी की अलग विचारधारा वाली रचना या लेख से खट्टा हो सकता है तो सामने वाले को चिंता तो करनी होती है।" - नहीं कोई जरूरत नहीं है। अगर आप को किसी की विचारधारा सही नहीं लगती और आप "गरिमापूर्ण" तरीके से अपनी बात नहीं रख सकते तो आप वहां से विदा ले सकते है।

      हटाएं
    5. हैरानी है जितना बड़ा लेख नही उस से बड़ी प्रतिक्रियाएँँ...
      मैने न तो लेख में किसी पुरुष समुदाय पर और न ही किसी महिला वर्ग आक्षेप किया है कि आप इतने विचलित हो गए...अपना दृष्टिकोण ही तो रखा था आप क्यों खफा है ..अगर भाई - चाचा बन कर आप किसी की पैरवी कर रहे है तो भी माफ कीजिएगा मैने किसी महिला पर भी अंगुली नही उठायी । व्यक्तिगत रंजिश आपकी मेरी है नही .. फिर ये हंगामा क्यों ??? राहुल जी हृदय से आभार आपने नैतिकता के आधार पर मेरे नजरियों को समझने का प्रयास किया ।

      हटाएं
    6. मैं इस सम्वाद को पूर्णविराम देना चाह रहा था, पर आपकी एक और उनकी एक-दो गलतफहमी दूर कर दूँ .. लगा मुझे ।आपको ग़लतफ़हमी हुई है कि मैंने उनके लिए आपके चाचा या भाई की बात की थी। दरअसल सामने वाली की आयु का अंदाजा नहीं लगा पा रहा था तो अपने लिए अगले के चाचा या भाई होने की बात कही थी। शायद मेरी बात से आपकी या उनकी ग़लतफ़हमी दूर हो जाए तो अच्छा है।
      रही बात व्याकरण सम्बन्धित गलतियों और स्वघोषित साहित्यकार वाली बात तो , यह सर्वविदित है कि मैं कोई साहित्यकार ना हूँ , ना कहलाना पसंद करता हूँ। ना ही कोई दूसरी लालसा है। बस मनोरंजन के लिए लिखता हूँ। बस और बस मन की बात लिखता हूँ मनोरंजन के लिए।
      ऐसे में मेरे लिए अशुद्धि कोई बड़ी बात नहीं है। यह सर्वविदित है कि मेरा कभी नुक़्ता रह जाता है, कभी आकार तो , कभी लिंग की गलती रह जाती है।
      ज्ञानवर्द्धन करने के लिए आभारी।
      रही बात हंगामा की तो ... मैंने इस पोस्ट ओअर लिखने के अलावा किसी को कहने नहीं गया, क्यों कि इस दुनिया में व्यक्तिगत रूप से किसी को नहीं जानता। पर आप की ओर से तो ....
      विराम दीजिए इस सम्वाद को , क्योंकि आप भी शायद बस यूँ ही लिखतीं हैं, ऐसा प्रतीत होता है। ठीक मेरी तरह।
      फिर इस विवाद को संवाद में परिवर्तित कर विराम दीजिए।
      आपको जो भी मानसिक प्रताड़ना की अनूभूति हुई हो , उसके लिए क्षमप्राथी हूँ।
      अगर इस लेखन में भी कोई अशुद्धि रह गई हो तो ध्यान मत दीजिएगा, क्योंकि मैं कोई साहित्यकार नहीं हूँ । ""बस यूँ ही"" लिखता हूँ। आप बड़े लोग हैं।
      पुनः क्षमाप्रार्थी हूँ।

      हटाएं


  8. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (0५ -१०-२०१९ ) को "क़ुदरत की कहानी "(चर्चा अंक- ३४७४) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार अनीता जी लेखन को मान देने के
      लिए ।

      हटाएं
  9. सुबोध जी मैने ये लेख भी पढ़ा और आपकी प्रतिक्रियाएं भी । मुझे ये समझ नहीं आया कि किसी का अगर कुछ पढ़ कर मन खट्टा हो गया तो वह किसी की विचार धारा का असम्मान करना कैसे हुआ। हम बहुत कुछ पढ़ते है और बहुत सी चीजे हमारे दिल को छू जाती है और कुछ चीज़े हमारे दिल को नहीं भाती। जो मीना जी ने लिखा वो उनका एक विचार था ना ही किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर कमेंट । तो उस पर यू विचलित होना किसी खुले दिमाग के व्यक्ति को शोभा नहीं देता।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. हृदय की असीम गहराइयों से आभार आपका । सस्नेह...

      हटाएं
  10. बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कामिनी हृदय से आभार मनोबल बढ़ाने के लिए । सस्नेह..

      हटाएं
  11. आज सोसल मीडिया पर सरेआम परंम्पराओं और उन से संबंधित गतिविधियों पर लांछन लगाए जा रहे हैं और हंसी भी उड़ाई जा रही है,उसी संदर्भ में मीना जी ने मन खट्टा होने की बात कही है ,उस में क्या ग़लत था मुझे समझ नहीं आया ।

    मैं स्वयं बहुत सी प्रथाओं को उचित नही मानती पर इस लिए ये तो नहीं कि मैं किसी का भी मजाक उड़ाऊं सामने वाले के पास भी अपनी आस्था अपने कारण अपनी परिस्थितियां हो सकती है ।

    कुछ रिती-रिवाज और प्रथाएं अगर सचमुच सामाज ,परिवार या व्यक्तिक तौर पर हानि कारक है तो ,और कोई सचमुच समाज में सुधार लाना चाहते हो तो , संगठित तौर पर उसका पक्ष-विपक्ष रख कर समुदाय और लोगों को समझाएं, उनके दिमाग में स्थापित डर और अंधविश्वास को निकालें,नये प्रतिमान स्थापित करें ।

    राजा राम मोहन राय ,ईश्वर चंद्र विद्यासागर,या कोई भी समाज सुधारक सचमुच की कुरितियां का दुष्प्रभाव देख कर व्यथित थे, कुछ करना चाहते थे, और बहुत कुछ किया भी ।,

    आज भी ऐसी कई परमपराएं है जो बहुत संघातिक है जैसे मृत्यु भोज आदि कुछ करना है तो ऐसी प्रथाओं का औचित्य अनोचित्य समझा कर उनके लिए समर्पित होकर कार्य करें ,शक्ति सामर्थ्य भी काम आयेगा और समाज का भला भी होगा ,बस लिखने को कुछ भी लिखने से राम मोहन राय नही बनते।

    मीना जी ने एक लेख लिखा जिनको पसंद आया तो सहमति में कुछ लिख दिया जिन्हें पसंद नही आया वो तटस्थ बैठे हैं ,
    कोई भी ज्यादा से ज्यादा अपनी अहसमति जता सकते हैं ,
    आरोप नही लगा सकते किसी रचनाकार पर ।

    रचना विमर्श पर हो तो सचमुच वाद विवाद की गूंजाइश रहती है ,खुला मंच हो तो भी ,पर साधारण तौर पर पोस्ट कि गई किसी रचना पर आक्षेप वाली अभिव्यक्ति का मुझे कोई औचित्य नज़र नहीं आता।

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    उत्तर
    1. आभार कुसुम जी मनोबल संवर्द्धन के लिए.. इससे अधिक शब्द ही नही हैं आभार प्रकट करने के लिए 🙏🙏

      हटाएं
    2. वैसे जब इस विषय पर विराम लगा चुका हूँ फिर भी बात को खींचने का औचित्य क्या है भला !?
      कल शाम से ही आज दिन भर हंगामा मचा कर भी अभी बात शांत नहीं हुई क्या !? मैंने तो कोई हंगामा नहीं मचाया।
      आक्षेप अगर मेरी प्रतिक्रिया में दिखी आपको तो इस लेख में क्या था फिर !?
      अगर यह विचार की अभिव्यक्ति भर थी तो, हमने भी भी वही किया था ना !??

      हटाएं
  12. दृष्टिकोण सबका अपना-अपना होता है. इस लेख में मीना जी ने प्रगतिशील विचारों पर सवाल उठाते हुए इंगित किया है कि ऐसे विचारों का भी स्वागत है जो मर्यादित भाव के साथ समाजोपयोगी हों.
    इस लघु आलेख पर सुबोध सिन्हा जी द्वारा शुरू की गयी बहस अनावश्यक रूप से तीखी हो गयी है और साहित्यिक टिप्पणियों की मर्यादा लाँघती सुबोध जी की टिप्पणियाँ ब्लॉगिंग क्षेत्र में एक प्रकार का अशोभनीय भाषा का प्रयोग जिसे ट्रोलिंग कहा जाता है,को आमंत्रित करना है. बेहतर होगा ऐसे अनावश्यक विवादों से बचा जाय.
    इस बहस में पाठकों / टिप्पणीकारों की सहानुभूति के साथ जाती है और उनका वैचारिक पक्ष मज़बूत करती है.
    सुबोध जी के तर्कशील विचारों को प्राथमिकता मिलेगी, समय लगेगा अपने विचारों की श्रेष्ठता सिद्ध करने में.
    बहरहाल सुबोध जी ने बहस को क्षमा के साथ रोक दिया है.

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    उत्तर
    1. पाठकों / टिप्पणीकारों की सहानुभूति मीना जी के साथ जाती है और उनका वैचारिक पक्ष मज़बूत करती है.

      हटाएं
  13. बहुत बहुत आभार रविन्द्र जी 🙏 ब्लॉग जगत में यह मेरा कटु अनुभव है . मन की एक बात जिस पर मैं अब भी वैचारिक दृष्टिकोण से कायम हूं कि --- विचारों में भिन्नता तो हो सकती है हमें सम्मान करना चाहिए आज की नारी शिक्षित है वह अपनी पूजा-पाठ, व्रत उपासना करे या ना करें उनकी व्यक्तिगत निजता है । इस पर व्यर्थ लांछन , महान विभूतियों के नाम पर खुद को सत्य साबित करने का प्रयास क्या साबित करता है यह मैं भली-भांति समझती हूँ । सुकरात की बात करते हैं पिछले दो दिन निरन्तर अपमान का जहर कौन पिला रहा है?? इसका निर्णय आप सब के विवेक पर निर्भर करता । मैनें सुबोध जी की हर बात का उत्तर सभ्य व शालीन भाषा में दिया है और उन्होंने निहायत ही असभ्य भाषा में । यदि यही बुद्धिजीवी समाज की चिन्तनशीलता है तो मैं अपने पुरातन विचारों और देश की महान संस्कृति की पक्षधर ही भली ,🙏 सुबोध जी द्वारा मेरा हुआ अपमान मुझे सदैव याद रहेगा 🙏 मेरी तरफ से इस कटु वाद-विवाद और व्यर्थ बहस का अन्त है । सादर..

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“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"