शोर-शराबा और किसी भी तरह की तेज आवाज़ें झुंझलाहट भरी हलचल भर देते थे उसके मन में ।दीपावली और होली के त्यौहार तो उसे बहुत पसंद थे मगर पटाखों का शोर उसे कभी नहीं भाया ।
वह सोचती- “पटाखे बजाने से ही ख़ुशियों का प्रदर्शन क्यों होता है ?” पटाखों के शोर से और बाद के धुएँ से निकली गंध से उसे बहुत चिढ़ थी ।
उसकी यह आदत छुड़वाने के लिए घर पर होली-दीवाली पर पटाखे आते तो उसके लिए फुलझड़ियाँ आया करती ।उसे याद है वह वक्त जब पहली बार दीपावली पर फुलझड़ी थामी थी उसने , उसे जलाने से पहले वह निश्चित कर लेना चाहती थी कि बजेगी तो नहीं।कांपती अँगुलियों के बीच फुलझड़ी की पहली चिंगारी को देखते ही डर के मारे उसने फुलझड़ी को नीचे गिरा दिया था ।
घर की तरह वह स्कूल में भी शांत बच्चों की श्रेणी में आती रही थी रिक्त कालांश में उसे शैतानी करने से अधिक कक्षा-कक्ष की खिड़की से बाहर के हरे-भरे लॉन ,मौसमी फूलों की क्यारियाँ , गिलहरियाँ और वहाँ मँडराते पक्षियों को देखना बहुत पसन्द था ।
समय और प्रकृति परिवर्तनशील हैं और उनके सहचर मनुष्य की प्रकृति भी । आज की वैश्विक हलचल को अनुभव कर वह सोचती है -
“इस संसार के मुट्ठी भर मानव अपने प्रभुत्व की लिप्सा में कितनी ही निर्दोष और मासूम ज़िन्दगियों को नष्ट करते हुए सदियों से विकसित और पल्लवित सभ्यताओं को नष्ट करने की बात सोच भी कैसे सकते हैं ।”
बारुद के धुएँ और धमाकों के बीच जीती ज़िंदगियों के बारे में सोचते हुए उसकी आत्मा सिहर उठती है ।लेकिन आज वह छोटी नही है ,बचपन की एकांत प्रिय और कोलाहल से बचने वाली लड़की अब परिपक्व स्त्री बन चुकी है ।उसने तय किया है कि -
“इस वर्ष दीपावली पर वह निराश्रितों के बीच जाकर फुलझड़ियाँ और मिठाई बांट कर उनकी मुस्कराहट में जीवन की सार्थकता ढूँढेगी और शायद, यही उसका एक छोटा-सा प्रयास होगा जहाँ खुशियाँ धमाकों से नहीं, उजालों से पहचानी जाएँ।”
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यह संकल्प हमें भी लेना है मीना जी। बहुत प्रेरक रचना है यह आपकी। मैं इसके अक्षर-अक्षर से सहमत हूँ।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय जितेन्द्र जी 🙏
हटाएंप्रेरक पोस्ट
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद अनीता जी 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर सारगर्भित एवं प्रेरक सृजन
जवाब देंहटाएंकाश उन मुट्ठी भर मानवों के मन में भी कभी ऐसे भाव जगें ।
आपकी विचाराभिव्यक्ति हेतु हृदय से असीम आभार सुधा जी !
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