कुछ कहने -सुनने,समझने-समझाने
की सारी बातें,
यहीं छोड़ दें तो अच्छा है ।
दुनिया की उलझी हुई रस्में,
रिश्तों और व्यवहारों का हिसाब-किताब
इनसे किसी का कुछ
कभी अच्छा हुआ है भला।
व्यर्थ बातों में क्यों उलझना
सबके अपने-अपने स्वर्ग और नर्क हैं
अपनी वैतरणी खुद ही
पार करता है इन्सान ।
अक्सर हम दुनिया देखते हैं,
उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं,
सबके पीछे चलते हैं;
और इसी अनुकरण की चक्की में
धीरे-धीरे पिसते हैं।
शायद बेहतर हो कि
हम एक-दूसरे से बात तो करें,
मगर अपने मन की भी सुने,
और उस शोर से दूर रहें
जो केवल भ्रम पैदा करता है ।
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