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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

“खोज”

बादलों की ओट में
 लुप्त नहीं हुआ है चन्द्रमा,
वह  केवल दृष्टि से ओझल है
 जैसे सत्य
 अज्ञान के आवरण में
 कभी-कभी छिप जाता है ।

काली घटाएँ घिरती हैं आसमान में
और बरस जाती हैं धरा पर,
  मन का आँगन भी 
उनके साथ सावन-भादों सा
 भीगा-भीगा रहता है ।

 जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में
 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

 सुख और दुःख
 वास्तव में विरोधी नहीं,
 एक ही अनुभूति के
 दो किनारे हैं ।

पूनम की रात है,
 फिर भी नभ घनपूरित है
 चाँदनी को तरसती आँखें
 यह भूल जाती हैं
 कि चाँदनी बाहर  नहीं,
 मन के भीतर भी है  ।

बादल चन्द्रमा को
 कब तक ढक पाएँगे ?

आवरण बदलते हैं,
मगर आकाश वही रहता है ।
 दृश्य बदलते हैं,
लेकिन सत्य शाश्वत रहता है ।

मनुष्य भी…,
 अपने जीवन रूपी बादलों में
 स्वयं को खोजता है
बस ढंग बदलता रहता है

***


10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर सोमवार 24 अगस्त 2026 को लिंक की गयी है....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!


    !

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    1. पांच लिंकों का आनन्द में सृजन ’ को सम्मिलित करने के लिए असीम आभार सहित सादर नमस्कार !

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  2. जीवन का शाश्वत सत्य आपने कितनी सरल और सहज पंक्तियों में बता दिया है, सुंदर सृजन मीना जी!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्नेहिल नमस्कार सहित हार्दिक आभार अनीता जी !

      हटाएं
  3. सही कहा
    आवरण बदलते हैं,
    मगर आकाश वही रहता है ।
    दृश्य बदलते हैं,
    लेकिन सत्य शाश्वत रहता है ।
    बस असत्य के असीमित विस्तार में सत्य सीमित रह जाता है
    बहुत सुंदर चिंतनपरक सृजन
    वाह!!!!

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    उत्तर
    1. स्नेहिल नमस्कार सहित हार्दिक आभार सुधा जी !

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  4. बेहद सुंदर, सारगर्भित अभिव्यक्ति दी।
    बिंब भी बहुत मनमोहक है
    सस्नेह
    सादर।

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  5. स्नेहिल नमस्कार सहित हार्दिक आभार श्वेता जी !

    जवाब देंहटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"