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रविवार, 28 दिसंबर 2025

“क्षणिकाएँ”

उड़ती रेत पर मंजिल का ठिकाना 

ढूँढता रहा बटोही

मरु -लहरियों  में गुम 

मंजिल का ठिकाना तो नहीं मिला 

मगर मिली

रेत के दरिया में सिमटी असंख्य कहानियाँ । 


*


घर के स्टोर-रूम में संभाल कर रखती हैं 

गृहणियाँ  अपने सामान की

 पोटली …,

जिसमें बँधा होता है उनका अपना

ग़ैरज़रूरी..,

लेकिन बहुत ज़रूरी सामान ।


*


(पुस्तक :-पत्तियाँ चिनार की -अंतस् की चेतना )

8 टिप्‍पणियां:

  1. उड़ती रेत और भटके बटोही के ज़रिये जीवन की तलाश दिखाई देती है, जहाँ मंज़िल भले न मिले, लेकिन अनुभवों की कहानियाँ हाथ लग जाती हैं।

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    1. सारपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ आदरणीय !आपका हृदय तल से हार्दिक धन्यवाद 🙏

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  2. उत्तर
    1. सुन्दर सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद सर !

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  3. वाह...सुंदर रचना...नववर्ष की हार्द‍िक शुभकामनायें मीना जी

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  4. हृदय तल हार्दिक आभार अलकनन्दा जी ! आपको भी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏

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  5. उड़ती रेत पर ............. ढूँढता रहा बटोही
    गुम मंजिल का ठिकाना....................

    लाजबाब

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    1. सराहनीय प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद अनुज मनोज जी !

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मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"