उड़ती रेत पर मंजिल का ठिकाना
ढूँढता रहा बटोही
मरु -लहरियों में गुम
मंजिल का ठिकाना तो नहीं मिला
मगर मिली
रेत के दरिया में सिमटी असंख्य कहानियाँ ।
*
घर के स्टोर-रूम में संभाल कर रखती हैं
गृहणियाँ अपने सामान की
पोटली …,
जिसमें बँधा होता है उनका अपना
ग़ैरज़रूरी..,
लेकिन बहुत ज़रूरी सामान ।
*
(पुस्तक :-पत्तियाँ चिनार की -अंतस् की चेतना )
उड़ती रेत और भटके बटोही के ज़रिये जीवन की तलाश दिखाई देती है, जहाँ मंज़िल भले न मिले, लेकिन अनुभवों की कहानियाँ हाथ लग जाती हैं।
जवाब देंहटाएंसारपूर्ण प्रतिक्रिया हेतु आभारी हूँ आदरणीय !आपका हृदय तल से हार्दिक धन्यवाद 🙏
हटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंसुन्दर सराहना के लिए हार्दिक धन्यवाद सर !
हटाएंवाह...सुंदर रचना...नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें मीना जी
जवाब देंहटाएंहृदय तल हार्दिक आभार अलकनन्दा जी ! आपको भी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏
जवाब देंहटाएंउड़ती रेत पर ............. ढूँढता रहा बटोही
जवाब देंहटाएंगुम मंजिल का ठिकाना....................
लाजबाब
सराहनीय प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक धन्यवाद अनुज मनोज जी !
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