खामोशी की डोर से
बँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
और..,
बीच में पसरा पड़ा है
कभी न सिमटने वाला
सन्नाटा..,
फासला तो अधिक नहीं है
हमारे बीच
मगर सोचों की गहराई का
छोर..,
दूर -दूर तक नहीं दीखता
***
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 12 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
पांच लिंकों का आनन्द” में सृजन को सम्मिलित करने हेतु आपका हृदय तल से सादर आभार
इसी सन्नाटे की गहराई में छिपा है एक अटूट अपनापन, जिसे कोई भी दूरी मिटा नहीं सकती
हृदय तल से असीम आभार अनीता जी !
गहराई जरूरी है
हृदय तल से असीम आभार सर !
सुन्दर
खामोशी की डोर से बँध कर हम चले जा रहे हैं किनारे-किनारे.............लाजबाब............
हृदय तल से असीम आभार मनोज भाई जी !
मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏 - "मीना भारद्वाज"
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में गुरुवार 12 मार्च, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंपांच लिंकों का आनन्द” में सृजन को सम्मिलित करने हेतु आपका हृदय तल से सादर आभार
जवाब देंहटाएंइसी सन्नाटे की गहराई में छिपा है एक अटूट अपनापन, जिसे कोई भी दूरी मिटा नहीं सकती
जवाब देंहटाएंहृदय तल से असीम आभार अनीता जी !
हटाएंगहराई जरूरी है
जवाब देंहटाएंहृदय तल से असीम आभार सर !
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंहृदय तल से असीम आभार सर !
हटाएंखामोशी की डोर से
जवाब देंहटाएंबँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
.............लाजबाब............
जवाब देंहटाएंहृदय तल से असीम आभार मनोज भाई जी !