रूई के फाहों जैसे ढक गए हैं
तुषार-कणों से देवदार ..,
धरती पर भी नमक सी बिखर गई है
बर्फ़…,
पास ही पहाड़ की बाहों में
लिपटे घर से
नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर
गूँज उठता है -
“लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,
हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,
मायें मेरिये, शिमले दी रावें,
चम्बा कितनी दूर…,
चम्बा कितनी दूर…!”
सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ
एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन
ढलकने लगती हैं
ना गीत को पता..,
ना गाने वाली आवाज़ को..,
बस..,
दर्द दरिया बन
दो अजनबियों के बीच बेआवाज़
बहने लगता हैं
संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख
वे सदियों से
यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं
***
जवाब देंहटाएंवाह!!!
लाजवाब शब्दचित्रण उन वर्फ से ढ़कघ वादियों का ...पढ़कर ही सुर मिठास मानस पटल पर तैर गई... उसी कसक के साथ...
सही कहा
संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख
वे सदियों से
यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं
हृदयतल से असीम आभार सुधा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छा सृजन किया है मीना जी आपने। जीवन एवं संसार दोनों ही का आधार संवेदनाएं ही तो हैं।
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार जितेन्द्र जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।
जवाब देंहटाएंसच में ये गीत कहीं से कहें ले जाता है ... भावों का बेहतरीन प्रवाह ...
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार नासवा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द सोमवार 02 फरवरी, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंसृजन को “पाँच लिंकों का आनन्द” की आज की प्रस्तुति में सम्मिलित करने हेतु हृदयतल से सादर आभार आदरणीय दिग्विजय जी !
जवाब देंहटाएंबेहद खूबसूरत सृजन
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार भारती जी !
हटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार सर !
हटाएंखूबसूरत भावाभिव्यक्ति सखी मीना जी!!
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार शुभा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।
हटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंहृदयतल से असीम आभार सर !
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