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सोमवार, 13 अप्रैल 2026

“बोनसाई”

एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की 

नर्म देह पर..

टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच


घुटनों के बल झुककर

मैंने तुम्हारा नाम लिखा था

अपनी तर्जनी की नोक से


शायद अपने साथ तुम्हारा अहसास 

महसूस करने के लिए 


फिर एक दिन,

अचानक मन में अपनी ही 

उस मासूमियत को टटोलने की

 अधूरी-सी इच्छा जागी—

तो पाया


भूरी, बेजान रेत के विस्तार पर

ईंट-पत्थरों का कठोर जंगल उगा है,


और जहाँ कभी

मेरे स्पर्श से तुम्हारा नाम 

सांस लिया करत था,


वहीं अब

 मनभावन मगर  सीमाओं में बंधा

बोन्साई का पेड खड़ा है


***


10 टिप्‍पणियां:

  1. दिल को छू गई आपकी भावाभिव्यक्ति मीना जी।

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    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार जितेन्द्र जी !सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ॥

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  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" बुधवार 15 अप्रैल 2026 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
    अथ स्वागतम शुभ स्वागतम।

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  3. "पांच लिंकों का आनन्द" में रचना सम्मिलित करने के लिए सादर आभार पम्मी सिंह जी !

    जवाब देंहटाएं
  4. हृदय तल से बहुत बहुत धन्यवाद नुपूरं जी !

    जवाब देंहटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"