रात अपने अंतिम प्रहर में है,
और तारे भी बुझने लगे हैं
इन्सान होने के नाते मेरी सोच
कहीं खो सी गई है
जैसे भूसे के अथाह ढेर में
एक छोटी सी सुई ।
कई बार कुछ प्रश्न
बार-बार,
सामने आ खड़े होते हैं लेकिन
उनके उत्तर कहीं नहीं दिखते
एक विचार कौंधता है मन में
क्या केवल जीवित रहना ही
जीवन का होना है ?
सुबह से शाम तक
समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
और मनुष्य..,
जेब में पड़े सिक्कों की तरह
धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को
क्षीण होते देखता रहता है
छोटी-छोटी ज़रूरतों में
उसके दिन बँट कर रह जाते हैं
सपने..,
जो कभी आसमान से
विस्तृत हुआ करते थे ,
जीवन के हिसाब-किताब के बीच
दम तोड़ते दिखाई देते हैं ।
रात के धुँधलके में
जब तारों की रोशनी भी थक हार कर बैठ जाती है,
इस तरह के अनगिनत प्रश्न
और अधिक स्पष्ट होकर सामने आ खड़े होते हैं
तब एक सोच उभरती है —
क्या जीवन केवल इसलिए जीवन है
कि एक दिन
हम पूरी तरह खर्च हो जाएँ,
और किसी को
हमारी अनुपस्थिति का कोई फ़र्क़ भी न पड़े ।
***
बहुत गहरे प्रश्न और बहुत ज़रूरी भी, इसके उत्तर में मिलेगा एक मौन, जो पहले पहल समझ में नहीं आता पर धीरे-धीरे हर सवाल का जवाब बन जाता है
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हृदय तल से असीम आभार अनीता जी ! सादर नमस्कार !
जवाब देंहटाएं‘पाँच लिंकों का आनन्द’ में रचना को सम्मिलित करने हेतु सादर आभार सहित बहुत-बहुत धन्यवाद ! सादर नमस्कार आदरणीय रवीन्द्र भाई जी !
जवाब देंहटाएंआपके द्वारा उठाया गया प्रश्न प्रत्येक व्यक्ति हेतु प्रासंगिक है मीना जी। उत्तर भी प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतस से ही मिलेगा।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हृदय तल से असीम आभार जितेन्द्र जी ! सादर नमस्कार !
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसुन्दर प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार हरीश कुमार जी !सादर नमस्कार!
जवाब देंहटाएंहमारी उपस्थिति या अनुपस्थिति का फर्क तो कई बार हमारे जीते जी भी मायने नहीं रखता .परंतु हाँ सोच तो उभरती ही है...प्रश्न भी वाजिब है.पर उत्तर कुछ नहीं...
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जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हृदय तल से असीम आभार सुधा जी ! सादर नमस्कार !
घरच हिना ही जीवन की नियति है ... समय भी तो खर्च हो रहा है ... काल भी ...
जवाब देंहटाएंसारगर्भित प्रतिक्रिया हेतु हृदय तल से असीम आभार नासवा जी ! सादर नमस्कार !
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