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सोमवार, 15 जून 2026

“भ्रम”

कुछ कहने -सुनने,समझने-समझाने
 की सारी बातें,
 यहीं छोड़ दें तो अच्छा है । 

दुनिया की उलझी हुई रस्में,
 रिश्तों और व्यवहारों का हिसाब-किताब
 इनसे किसी का कुछ 
 कभी अच्छा हुआ है भला।

व्यर्थ बातों में क्यों उलझना
सबके अपने-अपने स्वर्ग और नर्क हैं
 अपनी वैतरणी खुद ही
 पार करता है इन्सान ।

अक्सर हम दुनिया देखते हैं,
  उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं,
 सबके पीछे चलते हैं;
 और इसी अनुकरण की चक्की में
 धीरे-धीरे पिसते हैं।

शायद बेहतर हो कि
 हम एक-दूसरे से बात तो करें,
मगर अपने मन की भी सुने,
 और उस शोर से दूर रहें
 जो केवल भ्रम पैदा करता है ।

***


2 टिप्‍पणियां:

  1. मैं आपकी भावनाओं एवं विचारों से सहमत हूँ मीना जी। अंत में जो बात आपने कही है, वह आत्मसात करने योग्य है।

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  2. आपकी सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ । सादर नमस्कार सहित हार्दिक आभार जितेन्द्र जी !

    जवाब देंहटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"