झील-सा धीर-गंभीर दिखने में निश्चल
लेकिन…, भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार तरंगों के जाल में गुम्फित
मन का आँगन भी बड़ा विचित्र है
सागर के ज्वार-सा अपनी ही निस्तब्धता से बार-बार संवाद करता है
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मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏 - "मीना भारद्वाज"
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- "मीना भारद्वाज"