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शनिवार, 1 अगस्त 2026

“संवाद“

झील-सा धीर-गंभीर
 दिखने में निश्चल 

लेकिन…,
 भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित 

मन का आँगन भी
बड़ा  विचित्र है 

सागर के ज्वार-सा
अपनी ही निस्तब्धता से
बार-बार संवाद करता है 


***