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शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

“संवेदनाएँ”

रूई के फाहों जैसे ढक गए हैं

तुषार-कणों से देवदार ..,

धरती पर भी नमक सी बिखर गई है

बर्फ़…, 


पास ही पहाड़ की बाहों में

लिपटे घर से

नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर 

गूँज उठता है -

लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,

हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,

मायें मेरिये, शिमले दी रावें,

चम्बा कितनी दूर…, 

चम्बा कितनी दूर…!”


सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ 

एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन 

ढलकने लगती हैं 

ना गीत को पता..,

ना गाने वाली आवाज़ को..,

बस..,

दर्द  दरिया बन 

 दो अजनबियों के बीच बेआवाज़

 बहने लगता हैं 


संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख

वे सदियों से 

यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं 


***


16 टिप्‍पणियां:


  1. वाह!!!
    लाजवाब शब्दचित्रण उन वर्फ से ढ़कघ वादियों का ...पढ़कर ही सुर मिठास मानस पटल पर तैर गई... उसी कसक के साथ...
    सही कहा
    संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख
    वे सदियों से
    यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं

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  2. हृदयतल से असीम आभार सुधा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।

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  3. बहुत अच्छा सृजन किया है मीना जी आपने। जीवन एवं संसार दोनों ही का आधार संवेदनाएं ही तो हैं।

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  4. हृदयतल से असीम आभार जितेन्द्र जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।

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  5. सच में ये गीत कहीं से कहें ले जाता है ... भावों का बेहतरीन प्रवाह ...

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    1. हृदयतल से असीम आभार नासवा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।

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  6. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द सोमवार 02 फरवरी, 2026 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!

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  7. सृजन को “पाँच लिंकों का आनन्द” की आज की प्रस्तुति में सम्मिलित करने हेतु हृदयतल से सादर आभार आदरणीय दिग्विजय जी !

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  8. खूबसूरत भावाभिव्यक्ति सखी मीना जी!!

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    1. हृदयतल से असीम आभार शुभा जी ! आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखनी को मान मिला ।

      हटाएं

मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार 🙏

- "मीना भारद्वाज"