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शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

"खामोशी"


सहज कहाँ है

 इसको साधना

देख कर भी

करना पड़ता है अनदेखा 

सहने पड़ते हैं

विष बुझे तीर..

गरल  सा

पीना पड़ता है

न चाहते हुए भी

अपमान का घूंट

 कभी कभी विवेक 

दे कर.., 

स्वाभिमान का ताना

फूटना चाहता है

आक्रोश बन लावे सा

तब..

बुद्धि समझदारी की

चादर ओढ़ कर

बन जाती है माँ…

 लोरी सी थपकी 

के साथ

 अन्तस् में उठता 

एक ही भाव….

बड़ी दुर्लभ है यह

किलो या ग्राम में

कहाँ मिलती है

दुनिया के बाजारों में 

कितनी ही ..

आत्म-पराजयों के बाद

खुद की जय से 

सधती है खामोशी ….


★★★

शनिवार, 24 जुलाई 2021

सुनहरी धूप का टुकड़ा...

 



कई दिनों से

 लगातार..

 बरस रहे हैं

 काले बादल

तुम्हारी तरफ से

आने वाली 

पछुआ के साथ

अंजुरी भर धूप की

 एक गठरी भेज दो

उन्हीं  के छोर से

मैं भी बांध दूंगी

थोड़ी सी नमी 

धूसर बादल के साथ

पता है.. जब,

धरती पर उतरते

 बादलों के संग

पानी की बौछारें 

बरसती हैं 

धुआं सी तो,

 दृग पटल भी

थक कर 

धुंधलाये से लगते हैं

कब निकलेगा

 बादलों की ओट से

सुनहरी धूप का टुकड़ा

बस…,

उसी की राह तकते हैं


★★★


सोमवार, 19 जुलाई 2021

प्राकृतिक सुषमा【ताँका】

भोर की वेला

सुरभित कुसुम

मृदु समीर

हिमाद्रि आंगन में

नैसर्गिक सुषमा


सावन भोर

धरती के पाहुन

धूसर घन

उतरे अम्बर से

छम छम बरसे


मध्याह्न वेला

बाँस के झुरमुट

मंद बयार

बौराई सी चलती

सरगम बजती


सिंदूरी जल

कर में पतवार

नैया में मांझी

लहरों का गर्जन

बड़ी दूर किनारा


★★★




गुरुवार, 15 जुलाई 2021

जब नित्य लगे सांझ घिरने...,

जब नित्य लगे सांझ घिरने,

घर- आंगन में गौरेया सी।

आ जाती हैं मन के द्वारे,

ये सुधियां भी अवचेतन सी।।


जो बीत गया जीवित करती,

दृग पट पर नव सृष्टि रचती।

गिरने से पूर्व संभलने का,

करती संकेत सीखने का।।


खुद का अस्तित्व बचाने में,

बस जीवन बीता जाता है।

सौ झंझट हैं तो हुआ करे,

बस कर्मयोग से नाता है।।


तारों के झिलमिल आंगन में,

लो ! संध्या डूबी जाती है।

आने में हो जाती अबेर,

यह सोच निशा पछताती है।।


आलोक रश्मियां धुंधली सी,

मेरे अन्तस् का तम हरतीं ।

निर्बल क्षण में संबल बनती,

मुझ में विलीन ये मुझ जैसी।।


***

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

ख़्वाब

 

सूखी रेत के

 ढूह पर…,

तुम्हारा मन है कि

तुम बनाओ

एक घरौंदा

तो बनाओ ना…,

रोका किसने है

छागल में अभी भी

 बाकी है 

पानी की बूँदें,

एक घरौंदे की 

 गीली रेत जितनी

आज...

समय और फुर्सत से

कर लो अपना

 ख़्वाब पूरा

तुझमें  - मुझमें

बाकी है अभी

 इतना हौसला कि

पहुँच जाएंगे कुएँ के पास

 या फिर …,

खोद लेंगे एक कुँआ

अपनी छोटी सी

प्यास की खातिर 

***

【चित्र : गूगल से साभार】