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रविवार, 26 सितंबर 2021

अभी-अभी...

                     


अभी-अभी तो राह मिली थी

एक-दूजे को जानें कितना

एक जन्म छोटा लगता है

 नेह गहरा सागर के जितना


अनुमानों की राह पकड़ के

पर्वत पार करेंगे कैसे

चंद दिनों के संग साथ से

हमराही हम होंगे कैसे


घर- आंगन के हर कोने से 

स्मृतियों के तो तार जुड़े है

कौन तार गठरी में बाँधू

सब के सब अपने लगते हैं


इसमें अलग बात कौन सी

दुनिया की यह रीत पुरानी

कठिन लगी होगी यह मुझको

पर जीवन की यही कहानी


***

शनिवार, 18 सितंबर 2021

"चाँद"

                    

 कभी गाढ़ी नहीं छनी

इन आँखों की नींद से

बहाना होता है 

इनके पास जागने का

कभी थकान का 

तो कभी काम का

खुली छत पर..

तब भी तुम आया करते थे

हॉस्टल के अनुशासित

 वार्डन सरीखे

और आज भी..

बिलकुल नहीं बदले तुम

मगर वक्त के साथ

कितना बदल गई मैं


***



मंगलवार, 7 सितंबर 2021

"रिक्तता"

                      

 ताकती परवाज़े भरती

 चील को..

बोझिल,तन्द्रिल दृग पटल मूंद

लेटकर…, 

धूप खाती रजाईयों पर

 शून्य की गहराईयों में

 उतरना  चाहती हूँ


लिख छोड़ी है

 एक पाती तुम्हारे नाम 

 पढ़ ही लोगे 

मेरे मन की बात

जे़हन में ताजा है मेरी

कितनी याद..

तुम्हारी आँखों में

उस बेलिखी इब़ारत को

देखना चाहती हूँ


ख़फा हूँ खुद से ही

ना जाने क्यों..

नाराजगी की वजह

कुछ तो रही होगी

फुर्सत मिलेगी तो

वहीं 'वजह' 

ढूंढना चाहती हूँ


***

【चित्र :- गूगल से साभार】




शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

बिन बुलाए मेहमान सी...,

                   

बिन बुलाए मेहमान सी

चली आती हो सात तालों में बंद

 मेरे मन के दरवाजे पर..

कभी अनुराग बन

तो कभी विराग बन

तुम्हारी अंगुली थामें

चंचल हिरण सा... 

मेरा मन थिरकता है

खुले दरवाजे की दहलीज पर

मेरा मौन मुखर हो विहंसता है

अचानक कहीं से विहग की

टहकार आती है

बेसुध सी चेतना 

वर्तमान के आंगन में 

आज की महत्ता का

मंथन कराती है

मौन की गहराइयों में 

मन डूबता-उतराता है

और इसी के साथ

एक-एक बंद ताले 

साकार और सजीव हो ...

मांग उठते हैं हिसाब

अपनी-अपनी गुमशुदा कुंजी का…


***

【चित्र :- गूगल से साभार】