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गुरुवार, 3 जुलाई 2025

पत्तियाँ चिनार की (अंतस् की चेतना)


बिखरी कड़ियों को समेटने की श्रृंखला में पत्तियाँ चिनार की (अंतस् की चेतना) मेरा तीसरा  पद्य-संग्रह ,जिसमें सौ-सौ की संख्या में क्षणिकाएँ,त्रिवेणी एवं हाइकु संग्रहित हैं प्रकाशित हुआ है । ब्लॉगिंग संसार के  विज्ञजनों के साथ मेरी बौद्धिक यात्रा का पथ सुखद और सार्थक रहा, इसके लिए  हृदय की असीम गहराइयों के साथ ब्लॉगिंग संसार के सभी साथियों का  आभार एवं धन्यवाद व्यक्त करती हूँ ।प्रकाशित पुस्तक पत्तियाँ चिनार की (अंतस् की चेतना) के कुछ 

अंश -

“क्षणिका”


तिहाई का शिखर छू कर बनना तो था

शतकवीर ..,

मगर  वक़्त का भरोसा कहाँ था ?

कठिन रहा यह सफ़र …,

“निन्यानवें के फेर में आकर चूक जाने की”

बातें बहुत सुनी थीं ।

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“त्रिवेणी”


अच्छा लगता है मुझे सागर तट पर देर तक बैठना

लहरों के शोर और सागर की गर्जन से तादात्म्य रखना.., 


 बाहर-भीतर की साम्यता मेरे भीतर तटस्थता भरती है ।

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“हाइकु”


गोधूलि बेला -

घोंसले में लौटता

पक्षी का जोड़ा ।

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“मीना भारद्वाज”


गुरुवार, 25 जनवरी 2018

"26 जनवरी” (गणतन्त्र दिवस)

हर्षोल्लास में डूबे स्वर……,आज से ग्राउण्ड में जाना है “26 जनवरी" की तैयारी के लिए‎ । और फिर वह चिरप्रतीक्षित दिन….., मुँह अंधेरे अपनी अपनी स्कूलों की तरफ लकदक करती यूनिफॉर्म पहने भागते बच्चे……,रंग-बिरंगे परिधानों से सजे लोगों की भीड़ से भरी गलियां । सभी का एक ही लक्ष्य ….,  समय रहते उस बड़े से ग्राउण्ड में एकत्र होना जहाँ गणतन्त्र दिवस के आयोजन को सम्पन्न‎ होना है।
                   लाउडस्पीकरों पर पुरानी फिल्मों के देशभक्ति गीत ---- (1)  मेरे देश की धरती………,
(2) अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन …………,
(3)   ए मेरे वतन के लोगों‎…………., ओस भरी सर्दियों में जोश और ओज बढ़ा कर रक्त‎ संचार‎ तीव्र कर देते थे । जब से होश संभाला इस राष्ट्रीय पर्व को इसी जोश और जुनून से जीया । एक ही ग्राउण्ड पर पहले एक छात्रा के रूप में और फिर एक माँ  के रुप में मनाने के गर्व की तो बात ही क्या, बैण्ड की मधुर स्वर लहरियों पर ध्वजारोहण पर बजता राष्ट्रगान, परेड करते स्कूली बच्चे और विभिन्न कार्य‎क्रम ..,
उत्सव के समापन के साथ सब छवियां आँखों‎ में भर कर जाती भीड़ अगले वर्ष की सर्दियों तक मानों प्रतीक्षा‎रत ही रहती ।
                            एक पीढ़ी का ही अन्तराल आया है ना जाने क्यों शिक्षा के उर्ध्वमुखी समाज में जीते हम लोग कई बार स्वतन्त्रता‎ दिवस और गणतन्त्र दिवस में भेद करना भूल‎ जाते हैं‎ ।  पन्द्रह‎ बीस वर्ष पूर्व  क्या‎ बच्चे और क्या बड़े ? साक्षर हो या निरक्षर हर व्यक्ति‎ को जुबानी याद था------
स्वतन्त्रता दिवस ----”देश को आजादी मिली थी इस दिन, अंग्रेज भारत छोड़ कर अपने देश चले गये थे ।”
गणतन्त्र दिवस------”ये भी नही पता…..,इस दिन हमारे देश का संविधान लागू हुआ था ।”
और  संविधान ?
संविधान------”लिखित और अलिखित परम्परा‎ओं और कानूनों का वह संकलन, जिससे किसी भी देश का राज-काज (शासन) चलता हो ।”
                         हम  हमारा 69 वां गणतन्त्र मना रहे हैं बड़े हर्ष और गर्व का विषय है यह हमारे लिए‎ , मगर  एक सवाल‎ उठता है मन में कि क्या अब भी पुराने लोगों की तरह जोश और जुनून के साथ हमारे नौनिहालों में हमारे राष्ट्रीय पर्वो के लिए‎  जिज्ञासा का भाव है ? अगर नही में उत्तर मिलता है तो कारण खोजने के साथ समस्या का समाधान‎ खोजने का दायित्व भी हम सब का है ।

(  सभी साथियों‎ को गणतन्त्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभ‎कामनाएँ  )
जय हिन्द !!!  जय भारत !!!
  

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सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

“महक”

जब सूरज की तपिश तेज होती है और सूखी धरती पर 
बारिश की पहली बार बूँदें  टकराती है तो मिट्टी‎ के वजूद
से उठती गंध मुझे बड़ी भली लगती है। आजकल जमाना
 फ्रिज में रखी वाटर बॉटल्स वाला है मगर मेरे बचपन में 
मिट्टी‎ की सुराहियों और मटकों वाला था। मुझे याद है मैं 
सदा नया मटका धोने की जिद्द करती और इसी बहाने 
उस भीनी महक को महसूस करती रहती । माँ की
 आवाज से ही मेरी तन्द्रा टूटती । बारिश शुरु होते ही 
उस खुश्बू का आकर्षण‎ स्कूल के कड़े अनुशासन में 
मुझे नटखट बना देता और अध्यापिका की 
अनुपस्थिति में खिड़की‎ या 
कक्षा‎ कक्ष‎ के दरवाजे‎ तक आने को मजबूर कर
 देता।  एक दिन यूं ही कुछ‎ पढ़ते‎ पढ़ते पंजाब‎ की प्रसिद्ध‎ 
लोक कथा‎ ‘सोनी-महिवाल’ का प्रसंग पढ़ने को
 मिल गया ,कहानी से अनजान तो नही थी मगर
 उत्सुकतावश पढ़ने बैठ गई । 
कहानी का सार कुछ इस तरह था -------
                          “18 वीं शताब्दी‎ में चिनाब नदी के 
किनारे एक कुम्भकार के घर सुन्दर‎ सी लड़की का 
जन्म हुआ जिसका नाम “सोहनी” था । 
पिता के बनाए‎ मिट्टी‎ के बर्तनों
पर वह सुन्दर‎  सुन्दर‎ आकृतियाँ उकेरती । 
पिता-पुत्री के बनाए‎ मिट्टी‎ की बर्तन दूर  दूर‎ तक 
लोकप्रिय‎ थे । उस समय चिनाब नदी से अरब देशों‎ 
 और उत्तर भारत के मध्य व्यापार
 हुआ‎ करता था। बुखारा (उजबेकिस्तान) के अमीर 
व्यापारी का बेटा  व्यापार के सिलसिले में चिनाब 
के रास्ते‎ उस गाँव से होकर आया और सोहनी को देख 
मन्त्रमुग्ध हो उसी गाँव में टिक गया । आजीविका 
यापन के लिए उसी गाँव‎ की भैंसों को चराने का काम
 करने से वह महिवाल के नाम से जाना जाने लगा । 
सामाजिक‎ वर्जनाओं के चलते सोहनी मिट्टी‎ के घड़े 
की सहायता से चिनाब पार कर महिवाल से छिप
 कर मिलने जाती । राज उजागर होने पर उसी की
 रिश्तेदार ने मिट्टी‎ के पक्के घड़े को कच्चे घड़े मे
 बदल दिया । चिनाब की धारा के आगे कच्ची मिट्टी‎ 
के घड़े की क्या बिसात ?  घड़ा गल
 गया और  पानी में डूबती सोहनी को बचाते हुए‎ 
महिवाल भी जलमग्न हो गया ।"

*****
      
 कभी  कभी‎ लगता है माटी की देह में  कहीं सोहनी 
 तो कहीं  किसी और अनजान तरुणी का प्यार‎ बसा है  ।
 ना जाने कितनी ही अनदेखी और अनजान कहानियों‎
 को अपने आप में समेटे है यह।  तभी‎ तो मिट्टी‎ पानी
 की पहली बूँद के सम्पर्क‎ में आते ही सौंधी सी गमक
 से महका देती है सारे संसार‎ को ।

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शुक्रवार, 2 जून 2017

“प्रार्थना”

किसी भी देव-स्थल पर जाकर एक  सकारात्मकता  आती है। हमारे मन में, एक सुकून और असीम शान्ति का अहसास होता है।  मेरी नजर में इसका कारण वो असीम शक्ति है जिसे हम अपना आराध्य इष्ट  ईश्वर मानते हैं। हम इन्हीं देवत्व के गुणों से सम्पन्न देवी-देवता की पूजा स्थल पर शान्ति और सुकून पाने के लिए धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं जो अपने आप में स्वयंसिद्ध है।
                                 कहीं पढ़ा था कि शाब्दिक दृष्टि से धर्म का अर्थ ‘धारण करना’ होता है जो संस्कृत के ‘धृ’ धातु से बना। और धारण करने के लिए
वे अच्छे गुण जो ‘सर्वजन हिताय’ की भावना पर आधारित सम्पूर्ण‎ जीव जगत की भलाई ,कल्याण और परमार्थ के लिए हो। सुगमता की दृष्टि से मानव समुदाय‎ ने अपने आदर्श के रुप में अपने आराध्य चुने जिनकी प्रेरणा‎ से वे सन्मार्ग पर चल सके।
                                       आगे चलकर समाज में विचारों में मतभेद पैदा हुए कुछ विद्वानों‎ ने सगुण और कुछ ने निर्गुण उपासना पर बल दिया। सगुण उपासना में ईश प्रार्थना आसान हुई कि प्रत्यक्ष‎ रूप में आकार‎-प्रकार है अपने आराध्य का जिसको सर्वशक्तिमान मान वह पूजते हैं मगर निर्गुण उपासना आसान नही थी। ध्यान लगाना और आदर्शों का अनुसरण करना उस असीम शक्ति का जिसका कोई  आकार-प्रकार नही है वास्तव‎ में दुष्कर कार्य था। लेकिन मन्तव्य सभी‎ का एक था कि लौकिक विकास,उन्नति,परमार्थ और ‘सर्वजन हिताय,सर्वजन सुखाय’ हेतु  ईश आराधना
करनी है।
          भाग-दौड़ की जिन्दगी ,भौतिकतावादी दृष्टिकोण, 21वीं सदी के प्रतिस्पर्धात्मक जीवन शैली   में ये बातें शिक्षा के किसी पाठ्यक्रम‎ का हिस्सा‎ हो तो सकती हैं जो अगले सत्र में भुला दी जाती हैं। लेकिन  याद रखना ,इस बारे में सोचना युवा पीढ़ी को रूढ़िवादी लगता है। कुछ भी हो, व्यवहारिक जीवन की पटरी पर इन्सान जब चलना सीखता है तब दो पल के लिए सही, वह अपने  आराध्य की प्रार्थना‎ अवश्य  करता है।
                     प्रार्थना‎ में हम सदैव ईश्वर के असीम और श्रेष्ठ‎ रूप की सत्ता स्वीकार कर अपनी व अपने आत्मीयजनों  की समृद्धि और विकास तथा सुरक्षा हेतु वचन मांगते हैं कि हम सब आपके संरक्षण‎ में हैं और परिवार के मुखिया पिता अथवा माता के समान आपकी छत्र-छाया में स्वयं को सुरक्षित‎ महसूस करते हैं। एक से दो,दो से तीन……….,फिर यही श्रृंखला विशाल जन समुदाय‎ का रूप ले लेती है और सम्पूर्ण‎ समुदाय‎ द्वारा‎ अपने तथा अपने प्रियजनों के लिए मांगी गई‎ अभिलाषाएँ सर्वहित,सर्वकल्याण की भावना‎ का रूप ले देवस्थानों  में प्रवाहित सकारात्मक उर्जा का रूप ले लेती‎ है जिस के आवरण में प्रवेश कर हम देवस्थानों पर असीम शान्ति और सुख का अनुभव करते हैं।

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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

"संस्कार‎"

( 1 )
सुबह और शाम खुली हवा में घूमना बचपन से ही बहुत प्रिय रहा है मुझे । इसका कारण शायद पहले खुले आंगन‎ और खुली‎ छत वाले घर में रहना रहा होगा । शहर में आ कर अपना यह शौक  मैं‎ अपने घर के पास बने पार्क में घूम‎ कर पूरा कर लेती हूँ । शाम के समय अक्सर‎ बच्चे‎ बास्केट बॉल या फुट‎बॉल खेलते मिल जाते हैैं । एक दिन बच्चों‎ के ग्रुप के बीच एक औरत खड़ी मोबाइल पर कुछ करती दिखाई‎ दी,  दो राउंड पूरे होने के बाद भी उसे वहीं‎ खड़े देखकर कुछ अजीब‎ सा लगा कि क्यों बच्चों‎ का रास्ता‎ रोके खड़ी है दूर‎ खड़ी होकर भी बात कर ही सकती है मगर सार्वजनिक‎ जगह जो ठहरी  । उसका उपयोग करने का सब का समान हक है यहाँ‎ वर्जना अस्वीकार्य है ।

( 2 )
कुछ ही देर में माहौल अन्त्याक्षरी जैसा हो गया बच्चों‎ का झुण्ड एक तरफ और महिला दूसरी तरफ मगर जो कानों ने सुना वह अप्रत्याशित था , बच्चे‎ ---  “But aunty , we are  seniors .और महिला बराबर टक्कर दे रही ही थी----  O…, excellent . listen me you are also kids. गर्मा गर्म बहस सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुँची  कि महिला का बेटा जो उन बच्चों‎ से बेहद छोटा था बास्केट बॉल खेलना चाह रहा था  जिसके चलते  बड़े बच्चों‎ को परेशानी हो रही थी‎ और समस्या यह थी कि दोनों पक्षों‎ में से पीछे हटने के कोई तैयार नही था ।

( 3 )
घर की तरफ लौटती मैं सोच रही थी कि संस्कार कहाँ कम थे और अधिकार भाव के लिए सजगता कहाँ अधिक‎ थी । Morality के मानदण्ड पर तो दोनों पक्ष ही गलत थे ऐसे में रहीम जी का दोहा ----छमा बड़ेन को चाहिए ,छोटन को उत्पात ………….।। याद आते ही बच्चों‎ का पलड़ा भारी हो गया ।

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शनिवार, 11 मार्च 2017

"स्वभाव"

कुछ किस्से , कहानियाँ  और बातें कालजयी होती हैं और वे हर generation के साथ परिस्थितियों के अनुसार सटीक बैठती हैं । अक्सर सुना है generation gap के कारण बहुत सारी चीजें बदल.जाया करती हैं जैसे फैशन और विचार , सोचने -समझने की पद्धति । कई बार भारी परिवर्तन के कारण सांस्कृतिक परिवर्तन भी दिखाई देते हैं मगर संस्कृति की अपनी विशेषता है यह  नए बदलावों  को आत्मसात करती निरन्तर गतिमान रहती है । बेहतर बातें कालजयी और सामयिक बातें समय के साथ समाप्त हो जाती हैं ।
                आज मैं एक छोटी सी कहानी आप सब से साझा करना चाहूँगी जिसकी ‘सीख’ आजकल की बोल-चाल भाषा में  "moral of the story" मेरे मन.को बहुत बार कठिन परिस्थितियों मे भटकने से रोकता  है ।
.                           एक व्यक्ति प्रतिदिन प्रातःकाल नदी में स्नान करने जाता था एक दिन उसने देखा , एक बिच्छू नदी के जल में डूब रहा है । उस व्यक्ति ने तुरन्त बिच्छू को बचाने के लिए अपनी हथेली उसके नीचे कर दी और बिच्छू को किनारे पर छोड़ने के लिए जैसे ही हथेली को ऊपर किया हथेली की सतह पर उसने डंक मार दिया ।दर्द से तड़प कर व्यक्ति ने जैसे ही हाथ झटका कि बिच्छू पुनः पानी में डुबकी खा गया । उस आदमी ने अपने दर्द को भूलकर अब की बार दूसरे हाथ से उसे बचाने का प्रयास जारी रखा । एक भला मानस नदी किनारे बैठा सम्पूर्ण घटनाक्रम को देख रहा था उस से रहा नही गया ,वह बोला - “ मूर्ख इन्सान ! एक बार के डंक से जी नही भरा कि दूसरा हाथ आगे कर दिया। “

                                   डूबते -उतराते बिच्छू से दूसरी हथेली में डंक खाने के बाद उसको निकालने के लिए प्रयास करते आदमी ने मासूमियत से उत्तर दिया -  “ जब यह संकट की घड़ी  में अपने स्वभाव और गुण को नही भूल पा रहा तो मैं इन्सान होकर अपने गुण और स्वभाव का परित्याग कैसे करुं। “

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बुधवार, 1 मार्च 2017

"अपनी बात"


“होली” चन्द दिनों के बाद है .बसन्त-पंचमी से पीले रंगों की शुरुआत की छटा की छवि का चरमोत्कर्ष होली के त्यौहार पर होता है।  देश के सुदूर दक्षिण में स्थित प्रान्तों में यद्यपि होली अब अजनबी त्यौहार नही रहा ।  नीले - पीले रंगों से रंगे चेहरे याद दिला देते हैं कि परम्परा अब भी कायम है लेकिन ना जाने क्यों मुझे  सब कुछ सतही और ऊपर से ओढ़ा हुआ सा लगता है । मैं खो जाती हूँ उन यादों में जब हल्की सी सर्दी  में चंग की थाप के साथ होली के गीतों के साथ निकलती टोलियाँ और मोहल्ले के चौक में रात के समय नंगाड़े की लय से लय मिलाती डांडियों की गूंज और “गीन्दड़” देखने की उत्सुकता। जिसकीे प्रतीक्षा पूरे वर्ष में फाल्गुन महिने की याद दिलाया करती थी और उसी के साथ आरम्भ हो जाता था  परीक्षाओं का मौसम ।  मौहल्ले में गिनती रहती थी किस घर से कौन सा बच्चा  बोर्ड की ( दसवीं व बारहवीं) परीक्षा में बैठ रहा है । “तैयारी कैसी है ? नाम रोशन करना है अपने मोहल्ले का ..।” इस जुमले के साथ चौपाल पर बैठक लगाने वाले भी परीक्षाओं की तैयारी त्यौहारों की तैयारी के समान आरम्भ कर देते थे । कोई भी बच्चा परीक्षा के दिनों में कम से कम गली में खेलता-कूदता नजर आने पर इन लोगों की लताड़ से अपने आप को नही बचा पाता था। हम बीसवीं से इक्कीसवीं सदी में आ गए , पुरातन आवरण उतार फेंका  और नया  पहन कर वैश्ववीकरण (globalization) के दौर में शामिल गए । हमारे पास वक्त का अभाव हो गया  ,  प्रतिस्पर्धा भाव  (competition)  मुख्य हो गया और अपनापन कहीं खो सा गया । मगर  फिर भी रंगों की बहुरंगी आभा  खींचती रही अपनी ओर ….., वासन्ती और लाल-गुलाबी रंगों की कशिश जो ठहरी । सोचती हूँ अब हमारे गाँव भी cashless हो गए हैं  और demonetization भी हो गया है।  शहरों की हवाएँ गाँवों की तरफ बहने लगी है  कहीं जमीन से जुड़े अपनेपन को शहरों की हवा ना लग जाए ।

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शनिवार, 5 नवंबर 2016

"अन्तर"

बचपन में स्कूल से आकर अपना बैग पटकते हुए मैनें शिकायती लहज़े में माँ से कहा - “तुम मुझ में और भाई में भेद-भाव रखती हो , उसको शाम तक भी घर से बाहर आने-जाने की छूट और मुझे नही.” माँ ने निर्लिप्त भाव से मेरी ओर देखते हुए पूछा-”आज यह सब कहाँ से भर लाई है कूड़ा-कबाड़ दिमाग में।’
             “स्कूल में “समाज में लिंगभेद’ पर स्पीच थी , उसमें यह बात भी थी कि लड़कियों को लड़को से कम समझा जाता है । लड़कों को ज्यादा सुविधाएँ मिलती हैं।” और यह बात सच भी है मुझे बाहर कहाँ खेलने जाने देती हो तुम.
                                                     माँ ने बड़ी सहजता से कहा-”भाई के हर महिने बाल कटाती हूँ , तेरे बाल लम्बे हैं ,भरी दोपहरी या शाम को गलियाँ सुनसान होती हैं ऐसे समय-कुसमय बुरी आत्माएँ घूमती हैं इसलिए लड़कियों को बाहर जाने से रोका जाता है ।“ बाकी तू जानती है मैनें खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने में कभी भेद नही किया तुम दोनों में। बाल-सुलभ जिद्द वही की वही रुक गई क्योंकि मुझे भूत-प्रेतों के नाम से ही डर लगता था यूं भी लाईट जाते ही मैं उल्टा-सीधा जैसा भी याद था
हनुमान-चालीसा बुदबुदाना शुरु कर देती थी।
                                   माँ की बात सही भी थी माँ को मैनें मेरे परीक्षा-परिणाम पर सदा खुश होते ही देखा। छोटे भाई और बहन को बड़े भइया की बजाय अच्छे से मैं रखूंगी इस बात का विश्वास था उन्हें। कई बार वाद-विवाद तो कई बार निबन्ध प्रतियोगिताओं में दहेज-प्रथा और लड़के-लड़की के मध्य असमानता जैसे विषय उठ जाया करते थे । नारी जाति के प्रति उपेक्षित व्यवहार की चर्चा कक्षा-कक्षों में भी होती थी और मैं स्कूल से आते ही राम चरित मानस या गीता-पाठ करती माँ के पास अपना रोष व्यक्त करने पहुँच जाती मानो मेरी जिद्द थी कि मैं माँ को साबित कर दिखाऊँ कि अन्तर है समाज में नारी और पुरुष वर्ग में ।
                     माँ शान्ति से मेरी बात सुनती और समझाती कि अवसर की समानता लड़कियों पर भी निर्भर है।वैदिक काल में मैत्रेयी,अपाला, गार्गी और विश्ववारा जैसी विदुषियाँ ऋषियों के समकक्ष थीं। माँ दुर्गा,लक्ष्मी और सरस्वती भी स्त्रियाँ ही हैं ना….,और तू ये गाती फिरती है -”खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” यह भी तो लड़की ही थी ना । मैं कई बार उनके सामने हथियार डाल देती और कई बार अपनी बुध्दि
अनुसार नए तर्क खोजने लगती।
                                                   आज मैं बड़ी हो गई हूँ , माँ भी नही रही। घर-परिवार में  भी लड़कियाँ हैं , कुछ बड़ी हैं और कुछ बड़ी हो रही हैं मगर सवाल आज भी वही हैं। जिद्द भी वही है कि समाज में लिंगभेद असमानता है । लड़कियों के लिए विकास के अवसर कम है वगैरा-वगैरा । कई अवसर होते है ऐसे जब माँ के समझाने का ढंग याद आता है। असमय निर्जन स्थानों पर होने वाली महिलाओं के साथ दुर्घटनाएँ..  ,अक्सर माँ के बाहर जाने से रोकने के तर्क की याद  दिलाती है।अवसर की समानता के लिए वैदिक युग की विदुषियों के उदाहरण , सम्मान और सशक्तिकरण के लिए त्रिशक्ति और आवश्यकता पड़ने पर रानी लक्ष्मी बाई।
                                            आज की भागती-दौड़ती दुनियाँ में शायद वक्त ही नही है किसी के पास बालमन की जिज्ञासाओं को शान्त करने का।
                                        “Don’t argue . चुप्प कर , ये कौन सा project है ?अपनी tuition-teacher.से पूछ लेना “ जैसे जुमले सुनने को मिल जाते हैं। सवाल आज भी वही हैं बस जवाब देने के ढंग में अन्तर आ गया है शायद ।

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बुधवार, 11 मार्च 2015

"बचपन"

बचपन अपने आप मे एक सम्पूर्ण जीवन है. अनोखी कल्पनाएँ-बड़े होकर दुनिया का सब से बड़ा इन्सान बनने का सपना,ऐसे संसार की कल्पना जहाँ सारी कायनात केवल अपनी मुट्ठी मे कर लेने की कुव्वत,कुछ सोचना दूसरे ही पल उसे पाने का उल्लास बचपन का यथार्थ है बड़प्पन मे ये खुशियाँ कहीं खो जाती है.

         बालपन में माँ की साड़ी का पल्लू पकड़ कर बाजार

जाना,कपड़ों की दुकान मे अपने पसन्दीदा रंग के कपड़ों की तरफ अंगुली करना और उसे पा लेने पर खुशी से झूम उठना अक्सर याद आता है.अपनी कलाई की पहली घड़ी और दिल की धड़कनों के साथ घड़ी की टिक-टिक का  मखमली अहसास आज भी ना जाने कितने दिलों में सिहरन पैदा करता होगा  मगर ये सब बातें ,अहसास 70के दशक से 21वीं सदी की शुरुआत की बातें हैं. आज के दौर में ये बातें बेमानी हैं .पैसे की कीमत दिनोंदिन महत्वहीन हुई है. जो चीजें होश संभालने के बाद की बातें थी ; क़क्षा में अव्वल आने की खुशी की थी वे सब आज स्टेटस सिम्बल बन गई हैं . घड़ी पहनने के लिये कक्षा मे अव्वल आना अनिवार्य नही रह गया है. कपड़ों की रंगीन झिलमिलाहट का मखमली अहसास, माँ के हाथों से बने खिलौनों की चमक वक़्त के साथ कहीं खो सी गई  मैं यह नही कहती कि सब कुछ गलत है और आज की तरक्की, तरक्की नही है. मेरा मानना है कि बरगद,पीपल की छाँव अब कहीं खो सी गयी है. बोनसई वृक्षों की भरमार हो गई है जो मूल का ही रुप भी हैं और पहले से अधिक कहीं खूबसूरत भी  मगर नींव के साथ जुड़कर समाज को सुख देने के स्थान पर बेशकीमती सामानों से सजे मॉल्स और बड़े-बड़े बंगलों के स्वागत-कक्षों की शोभा बढाने मे ज्यादा सफल हैं .जिन्हे देख कर मेरे जैसे लोग कह उठते हैं-"बिलकुल वैसा ही है जैसा अपने गाँव मे स्कूल से आते रास्ते मे पड़ता

 था ; पता है स्कूल से आते बारिश और धूप मे हम इनके नीचे खड़े हो जाते थे.” और बात पूरी होने से पहले ही अचानक घूरने के अहसास से बगल में खड़े व्यक्ति की अजीब सी नजरों से बचते हुए मैं खामोशी की चादर ओढ़ कर आगे बढ़ जाया करती हूँ.