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गुरुवार, 20 अगस्त 2026

“खोज”

बादलों की ओट में
 लुप्त नहीं हुआ है चन्द्रमा,
वह  केवल दृष्टि से ओझल है
 जैसे सत्य
 अज्ञान के आवरण में
 कभी-कभी छिप जाता है ।

काली घटाएँ घिरती हैं आसमान में
और बरस जाती हैं धरा पर,
  मन का आँगन भी 
उनके साथ सावन-भादों सा
 भीगा-भीगा रहता है ।

 जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में
 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

 सुख और दुःख
 वास्तव में विरोधी नहीं,
 एक ही अनुभूति के
 दो किनारे हैं ।

पूनम की रात है,
 फिर भी नभ घनपूरित है
 चाँदनी को तरसती आँखें
 यह भूल जाती हैं
 कि चाँदनी बाहर  नहीं,
 मन के भीतर भी है  ।

बादल चन्द्रमा को
 कब तक ढक पाएँगे ?

आवरण बदलते हैं,
मगर आकाश वही रहता है ।
 दृश्य बदलते हैं,
लेकिन सत्य शाश्वत रहता है ।

मनुष्य भी…,
 अपने जीवन के बादलों में
 स्वयं को खोजता है
बस रूप बदलता रहता है

***


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- "मीना भारद्वाज"