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सोमवार, 22 जून 2026

“उस पार”

उस पार बँधी खड़ी है
 एक सांसारिक बंधन युक्त नाव,
 किन्तु  उसका खिवैया कौन है 
 यह प्रश्न ..,
 तम की चादर में लिपटा पड़ा है ।

रात के घने आवरण को चीर
 मन उस पार जाना चाहता है,
 जहाँ अनकहे रहस्यों की गांठें खुलें,
 और मौन अपने भीतर छिपे अर्थों का
 भेद स्वयं प्रकट करे ।

आँखों में थकान उतर आई है,
 जैसे अनगिनत यात्राओं की धूल
 पलकों पर जम गई हो ।
 बहुत दिन बीत गए
 चैन की गोद में सिर रखे हुए,
 बहुत समय हुआ
 स्वप्नों के निर्भार जल में डूबे हुए ।

अब मन चाहता है
 नींद के उस अथाह सागर में उतर जाना,
 जहाँ स्मृतियाँ शांत हों,
 जहाँ समय का शोर थम जाए,
 और आँखें..,
 अपनी सारी व्याकुलता छोड़कर
 गहरे विश्राम में खो जाएँ ।

शायद उस पार
 जहाँ सांसारिक बन्धन रूपी नाव तो है 
 मगर खिवैया अब भी अदृश्य है,
 वहीं कहीं अनंत में कोई शांतिपूर्ण तट भी होगा
जहाँ पहुँच कर सभी प्रश्न स्वतः मौन हो जाएँगे ।

***


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- "मीना भारद्वाज"