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शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

"त्रिवेणी"

माटी की देह से उठती  मादक गंध ,
सूर्योदय के साथ दे रही है संदेशा ।

प्रकृति की देहरी पर पावस ने पांव रख दिये हैं ।।
🍁🍁🍁


घंटे दिन में और दिन बदल रहे हैं महिनों में ,
मन के साथ घरों के दरवाजे भी बंद है ।

आरजू यही है महिने साल में न बदलें ।।
🍁🍁🍁

वसन्त ,ग्रीष्म कब आई, कब गई,भान नहीं ,
खिड़की के शीशे पर ठहरी हैं पानी की बूदें ।

ओह ! बारिशों का मौसम भी आ गया ।।
🍁🍁🍁


लेखनी और डायरी बंद है कई महिनों से ,
किताबें भी नाराज नाराज लगती हैं ।

कभी-कभी अंगुलियां ही फिसलती हैं 'की-बोर्ड'
 पर ।।
🍁🍁🍁


रोज का अपडेट कितने आए.., हैं..,और गए ,
सुप्रभात.. शुभरात्रि सा लगने लगा है ।

घर पर रहें..सुरक्षित रहें..यहीं प्रार्थना है ।।
🍁🍁🍁




मंगलवार, 21 जुलाई 2020

लघु कविताएं

विरासत में मिले
 मृदुल तेवर..
समय की तपती धूप खा कर 
कंटीले हो गए और .....
स्वभाव का बढ़ता खारापन
 सागर जल जैसा...
 वक्त लगता है समझने में
खारापन इतना बुरा भी नहीं
जितना माना जाता है 
🍁
निरभ्र नील गगन में
 घिर आती हैं रोज घटाएँ...
उमड़-घुमड़ कर अपनी
 गागर उंडेल रीत जाती हैं
 धरा के आंगन पर...
मरकती हो गया 
वसुधा का रंग भी...
और आसमान इन्द्रधनुषी
बस...एक मन का आंगन है 
जिसके छोर से सांझ सी
अबोली उकताहट..
कस कर लिपटी है
जो हटने का नाम नहीं लेती
🍁

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

प्रार्थना ।।दुर्मिल सवैया।।

सुन लो विनती अब नाथ हरे , भव के दुख संकट दूर
करो ।
सिर जूट- जटा जल धार धरे ,गल शोभित माल भुजंग
प्रभो ।।
वसुधा निखरे बरखा बरसे ,ऋतु पावन सावन मास 
सुनो ।
भवसागर से तब नाव तरे ,मन पावन हो  शिव नाम 
जपो ।।
🍁🍁🍁
रथ हांक चले मथुरा नगरी , बरसें दृग ज्यों बरसी 
बदरी । 
वृषभानु सुता चुपचाप रही,मग द्वार खड़ी सखियां
सगरी ।।
जमुना तट  की छवि सून भई, घर आंगन बीच पड़ी
गगरी ।।
मुरलीधर को नित ढूंढ रही,अकुलाय रही ब्रज की 
नगरी ।
🍁🍁🍁


सोमवार, 13 जुलाई 2020

"हाइकु"

गंगा का तट ~
बम भोले की गूंज
कावड़ यात्रा
🍁
सावन मास~
शिव की आराधना
भक्ति में शक्ति ।
🍁
सांझ की बेला~
वर्षा फुहार संग
गरम चाय ।
🍁
श्रावणी तीज~
नवोढ़ा के हाथों में
मेंहदी रंग ।
🍁
वर्षा फुहार~
तप्त वसुधा पर
ठंडी बयार ।
🍁
काली बदली~
रिमझिम बरसी
माटी महकी ।
🍁
सावन-झड़ी~
बाबुल का आंगन
थाती हिय की ।
🍁

शनिवार, 11 जुलाई 2020

"प्रश्न"


कल बादल का एक 
छोटा सा टुकड़ा
बहती हवाओं के साथ
पतझड़ में राह भटके
 सूखे पत्ते की मानिन्द
आ गिरा मेरी छत पर
छुआ तो हल्का ..नरम
मन को गीला करता
रूह का सा अहसास लिए
रूह इसलिए….., 
क्योंकि वह भी दिखती कहाँ है ?
बस होने का अहसास भर देती है
सुनो……. !
तुम्हारी दुनियाँ में भी 
क्या पतझड़ होता है ?
सुख-दुख ,जीवन-मरण 
और पतझड...
ये सब तो जीवन के साझी हैं
तुम……… ,
तुम भी नश्वर हो 
हमारी ही तरह...
फिर ये आदत कहाँ से ले आए ?
अजर-अमर होने की …?

🍁🍁🍁
【चित्र -गूगल से साभार】

शनिवार, 4 जुलाई 2020

"वक्त"

एक मुद्दत के बाद
आईने की रेत हटा 
खुद के जैसा
खुद की नजर से
तुमको देखा

पहली बार लगा
वक्त गुजरा कहाँ हैं
वहीं थम गया है 
तुम्हारी पल्लू संभालती
अंगुलियों से लिपटा

उजली धूप सी हँसी के साथ
 मानो कह रहा हो..
गुजर जाऊँ मैं वो हस्ती नहीं
तह दर तह सिमटा युगों से
मैं तो यहीं- कहीं…

तुम्हारे ही आस-पास
सर्दियों की ढलती धूप में
गर्मी की तपती लूओं में
सावन की बौछारों से भीगा
विस्मृत स्मृति के गलियारों में

🍁🍁🍁