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रविवार, 2 मई 2021

।। क्षणिकाएं।।

                 

लबों को रहने दो खामोश

काफी है, 

आँखों की मुस्कुराहट ।

बर्फ ही तो है

इस आँच से ,

बह निकलेगी ।

**

हौंसला और जिजिविषा

 देन है तुम्हारी ।

 विश्वास की डोर का 

छोर भी ,

तुम्हीं से बंधा है ।

जानती हूँ 

रात के आँचल के छोर से,

यूं ही तो बंधी होती है ।

उजली भोर के,

सुनहरे आँचल की गाँठ ।

**

 कई बार

अनुभूत पलों का,

मुड़ा-तुड़ा कोई पन्ना ।

बाँचना चाहती हैं आँखें ,

मगर 

इज़ाज़त कहाँ देता है ,

जटिल बुनावट वाला विवेक ।

समझदारी के फेर में

कस कर मूंद  देता है ,

सुधियों भरा संदूक ।

**