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शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

तांका

शाश्वत आभा
मनस्वी नगपति
आदि सृष्टि सी
स्वर्णिम रश्मियां
सौन्दर्य स्थितप्रज्ञ

मानस-सर
अमृत सम अम्बु
निर्बन्ध मुक्त
सुषमा नैसर्गिक
दृग-मन विस्मित

पुष्प गुच्छ सी
सुवासित मधुरम्
विबुध धरा
हिमगिरि आंचल
प्रकृति अनुपम

★★★★★

रविवार, 17 नवंबर 2019

"क्षणिकाएं"

(1)
थके तन में बोझल मन
डूब रहा है यूं .....
जैसे..अतल जल में
पत्थर का टुकड़ा

(2)
स्नेहिल अंगुलियों की
छुवन मांगता है मन..
बन्द दृगों की ओट में
नींद नहीं..जलन भरी है

(3)
दिखावे से भरपूर
ढेर सारी गर्मजोशी
आजकल के
रिश्ते-नाते भी ..
हायब्रिड गुलाब 
जैसे लगते हैं

★★★

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

"फैसला"

उसकी दिनचर्या तारों भरी भोर से आरम्भ हो अर्द्धरात्रि में नीलाकाश की झिलमिल रोशनी के साथ ही समाप्त
होती थी । अक्सर काम करते करते वह प्रश्न सुनती - "तुम ही कहो ? कमाने वाला एक और खाने वाले दस..मेरे बच्चों का भविष्य मुझे अंधकारमय ही दिखता है ।" और वह सोचती रह जाती..,तीन माह पूर्व की नवविवाहिता के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था ।
 "सुनो ! मायके जा रही हो ? जब तक नहीं बुलायें वहीं
रहना । यहाँ टेंशन चल रही है । जैसे ही सब सही होगा
बुला लेंगे ।" आदेश पर उसने गर्दन हिला कर स्वीकृति
दे दी चलते-चलते ।
महिने भर बाद मायके में सुगबुगाहट - "कब जा रही हो ' लेने कब आ रहे हैं ?" फिर सवाल..लेकिन जवाब कहाँ थे उसके पास । लगभग तीन महिने बाद उसने निर्णय लिया सब सवालों के जवाब देने का । स्कूल- कॉलेज खुल गए थे
नये सत्र के साथ । वह कॉलेज गई.. एडमीशन की प्रक्रिया पूरी की..घर आ कर जैसे ही सब को अपने निर्णय से
अवगत कराया , कानाफूसी और आलोचनाओं के तेवर
तीखे हो गए  - "आजकल की लड़कियां..धैर्य और सहनशक्ति छू कर भी नहीं निकली इन्हें ।" वह जानती थी तेवर और तीखे होंगे और आलोचनाएँ भी मगर फैसला हो चुका था ।

★★★★★

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

"क्षणिकाएं"

(1)
बेसबब नंगे पाँव ...
भागती सी जिन्दगी
कट रही है बस यूं …
जैसे एक पखेरु 
लक्ष्यहीन उड़ान में...
समय के बटुए से
रेजगारी खर्च रहा हो …

(2)

नेह के धागों से 
बुनी थी वह  कमीज
वक्त के साथ...
नेह के तन्तु
सूखते गए और….
कमीज की सींवन दुर्बल
एक युग  के बाद
धूल अटी गठरी से ...
उस कमीज का टुकड़ा
घनघनाया…
फोन की घंटी के रुप में...

★★★

सोमवार, 4 नवंबर 2019

"जिन्दगी"


वक्त की शाख पर
ढेरों लम्हें उगे थे
झड़बेरियों मे लदे बेरों सरीखे
कुछ-कुछ खट्टे
कुछ -कुछ मीठे
लम्हा-लम्हा चुन लिया चिड़िया के चुग्गे सा
भर लिया दामन में
और बस..बन  गई
अनुभूत पलों में पगी खट्टी- मीठी जिन्दगी

★★★

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

"अक्सर"

अक्सर खामोश लम्हों में
किताबें भंग करती हैं
मेरे मन की चुप्पी…
खिड़की से आती हवा के साथ
पन्नों की सरसराहट
बनती है अभिन्न संगी…
पन्नों से झांकते शब्द
सुलझाते हैं मन की गुत्थियां
शब्द शब्द झरता है पन्नों से
हरसिंगार के फूल सा…
नीलगगन में चाँद
बादलों की ओट से झांकता
धूसर सा लगता है…
कशमकश के लम्हों में
एक खामोश सी नज़्म
साकार हो उठती है अहसासों में
बस उसी पल…
प्रभाकर की अनुपस्थिति में
पूर्णाभा के साथ
मन आंगन में..सात रंगों वाला…
इन्द्र धनुष खिल उठता है 

★★★

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2019

"वर्ण पिरामिड"

(1)
है
द्वैत
अद्वैत
मतान्तर
निर्गुण ब्रह्म
घट घट व्याप्त
प्रसून सुवासित
(2) 
 है
सृष्टि
अनन्त
निराकार
परमतत्व
अनहद नाद
आवरण भूलोक
(3)
है
पर्व
अनूप
भाईदूज
रक्षाकवच
बहन का नेह
सर्वकामना पू्र्ति
(4)
है
विश्व
बन्धुत्व
अन्तर्भाव
मूल आधार
परराष्ट्र नीति
महनीय भारत

🌸🌸🌸




मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

"वर्ण पिरामिड'

ओ 
मेरे
दीपक 
हर तम 
सकल हिय
कर ज्योतिर्मय 
हो प्रफुल्लित मन
✳️ ✳️ ✳️ ✳️
माँ
तेरी
ममता
स्नेहाशीष
रक्षा कवच
मेरे जीवन का
तुझ से सम्पूर्णता
✳️ ✳️ ✳️ ✳️

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

"समय "



सांझ की चौखट पर
आ बैठी दोपहरी
कब दिन गुजरा
कुछ भान  नही...
नीड़ों में लौट पखेरु
डैनों में भर
उर्जित जीवन
उपक्रम करते सोने का
वे कब सोये 
फिर कब जागे
पौ फटने तक
अनुमान नही...
गुजरा हर दिन
एक युग जैसा
कितने युग गुजरे
बस यूंहीं
अवचेतन मन को
ज्ञान नही...

★★★★★

सोमवार, 14 अक्तूबर 2019

"शरद पूर्णिमा का चाँद"

"शरद पूर्णिमा का चाँद"
चाँदी जैसी आब लिए
धवल ज्योत्सना की
ऊँगली थाम...
बादलों पर कर सवारी
नीलाम्बर आंगन में
उतरा है अपनी 
पूरी ठसक भरी
सज-धज के साथ
शरद पूर्णिमा का चाँद
रात की सियाही में
कहीं भी..धरती पर उगे
अनगिनत दिपदिपाते
अपने सरीखे दिखते
भाई-बंधुओं के बीच
ठगा सा सोचता है
रूकूं या वापस जाऊँ..

★★★★★

शनिवार, 12 अक्तूबर 2019

"त्रिवेणी"

(1)

गहरे में उतरो तो ही मिलते हैं मोती ।
उथले में तो काई-गारा ही हाथ लगता है ।

उत्कृष्टता वक्त और हुनर मांगती है ।।

(2)

खिड़कियों का अस्तित्व ताजगी से जुड़ा है ।
व्यर्थ आगमन बहिर्गमन के लिए नही ।

अनावश्यक हस्तक्षेप से मर्यादाएं टूटती हैं ।।


                                  (3)

          चलते रहना है अनवरत गंतव्य तक ।
रूकना और मुड़ कर देखना कैसा ?

नदियों का स्वभाव लौटना नहीं होता ।।

★★★★★

रविवार, 6 अक्तूबर 2019

"अलविदा"

अलविदा कहने का वक्त आ ही गया आखिर.. मेरे साथ रह तुम भी खामोशी के आदी हो गए थे । अक्सर हवा की सरसराहट तो कभी गाड़ियों के हॉर्न
कम से कम मेरे को अहसास करवा देते कि दिन की गतिविधियां चल रहीं हैं कहीं । 'वीक-एण्ड' पर मैं अपने मौन का आवरण उतार फेंकती तो तुम भी मेरी ही तरह व्यस्त और मुखर दिखते ।
चलने का समय करीब आ रहा है । सामान की पैकिंग हो रही है सब चीजें सम्हालते हुए मैं एक एक सामान  सहेज रही हूँ । महत्वपूर्ण सामान में तुम से अपने से जुड़ी सब यादें भी स्मृति-मंजूषा में करीने से सजा ली हैं । फुर्सत के पलों में जब मन करेगा यादों की गठरी खोल कर बैठ जाऊँगी.. गाड़िया लुहारों की सी आदत हो गई थी मेरी आज यहाँ तो कल वहाँ । जो आज बेगाना है वह कल अपना सा लगेगा..मुझे भी..तुम्हे
 भी ।  मेरी यायावरी समाप्त हो रही है । ईंट-पत्थरों के जंगल में ढेर सारी बहुमंजिली इमारतों के बीच 'मनी प्लांट' सा मेरा घर प्रतीक्षा कर रहा मेरी..मेरी स्मृतियों में तुम खास रहोगे… सदा सर्वदा..।।

★★★★★

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

"दृष्टिकोण"

अक्सर पढ़ती हूँ तीज-त्यौहारों के संबन्धित विषयों
के बारे में..अच्छा लगता है भिन्न- भिन्न प्रान्तों के
रीति-रिवाजों के बारे में जानना । इन्द्रधनुषी सांस्कृतिक विरासत है हमारी ..संस्कृति की यही तो खूबी है कि
वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है । निरन्तरता में नव-पुरातन
घुल-मिल जाता है मिश्री और पानी की तरह मगर
उसका मूल नष्ट नही होता । इसी संस्कृति से हमारे
आचार विचार पोषित होते हैं । मगर मन खट्टा हो
जाता है जब इस तरह के क्रिया - कलापों की
आलोचनाएँ पढ़ती हूँ । नारी का साज-श्रृंगार
उसकी सुन्दरता के साथ साथ उसकी सम्पन्नता का
प्रतीक है । यही नहीं प्राचीनकाल का इतिहास यदि
चित्रों के माध्यम से समझने और देखने का प्रयास
करें तो पुरूष वर्ग भी महिला वर्ग के समान आभूषणों
से सजा दिखाई देता है ।
बाहरी आक्रमणकारियों के आने के बाद 'सोने की चिड़िया' हमारे देश की स्वर्णिम व्यवस्था चरमराई और
फिर रही सही कमी ब्रिटिशसरस् ने पूरी कर दी । 
आधुनिकता के नाम पर पायल , कंगन और अन्य वस्त्राभूषण को गुलामी या परतंत्रता का प्रतीक मानना ,
व्रत- पूजा पाठ को दकियानूसी विचार मानना  मुझे तो किसी भी नजरिए से तर्क संगत नजर नहीं आता । केवल विरोध करना है तो करना है यह एक अलग पहलू है ।
आज की अधिकांश महिलाएं शिक्षित और परिपक्व सोच रखती हैं यह उनके स्वविवेक पर निर्भर करता है कि
उन्हें क्या करना है ।
व्रत , उपासना , पूजा-अर्चना करना या ना करना उनकी व्यक्तिगत भावना और आध्यात्म से जुड़ाव की भावना है । रीति-रिवाजों के लिए जबरन विचार थोपे जाएँ तो यह अवश्य गलत होगा और इस तरह की बातों का विरोध भी पुरजोर होना चाहिए मगर स्वेच्छा से किये गए सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कार्यों की आलोचना अनुचित है ।  हमारे विचार किसी दूसरे के विचारों से मेल खायें या नहीं खायें
यह अलग विषय है लेकिन हमें दूसरों के विचारों का सम्मान अवश्य करना चाहिए ।

★★★★★

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

"क्षणिकाएँँ"

(1)
मानो या ना मानो 
दिल की धडकनों जैसा
बेशुमार लगाव है तुम से
जेनेटिक प्रॉब्लम की सुनते ही
उसके लिए भी तो यूं ही 
बेहिसाब प्यार छलका था
जैसे तुम्हारे लिए छलकता है
प्रतिदिन… प्रतिपल...
(2)
अजीब सी 
हलचल होती है 
दूध के उबाल सी….
जब कहीं विनम्रता को
                         निर्बलता समझ
                            लिया जाता है
दादुर के वक्ता होने पर
कोयल का मौन
कोयल की कमजोरी नहीं
उसका अपना मूड है
(3)
 रिश्तों में गाढ़ापन हो तो
संबंधों में प्रगाढ़ता होती है 
ठहराव के साथ….,
फिर रक्त का गाढ़ापन
जिन्दगी के लिए
खतरनाक और उसके
ठहराव में बाधा कैसे….,
कला और विज्ञान में
यहीं मूलभूत फर्क है
तथ्यों को सत्यता की खातिर
दोनों के अपने अपने तर्क हैं

                           ✴️✴️✴️









शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

"मुक्तक"

"मुक्तक"
( 1 )
मानव की यह आदत पुरानी है नई नहीं है ।।
सीखा नहीं कल से कुछ क्या ये सही है ।।
दिवास्वप्नों में खोया यह भी नही जानता ।
आने वाले कल की नींव आज पर धरी है ।।
(2)
तीखे तंज सहन करना सीख लोगे ।
समझो आधी दुनियां जीत लोगे ।।
वक्त सीखा देता है जीने का ढंग ।
मार्ग के कंटक भी स्वयं बीन लोगे ।।
(3)
सज़दे में झुकता सिर ऐसे शूरवीरों के आगे
कर देते तन-मन न्यौछावर मातृभूमि आगे
जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा हुआ हर कोई
मृत्यु भी नमन करती ऐसे वीरों के आगे
★★★

रविवार, 22 सितंबर 2019

"खुशी"

अपना वजूद भी इस दुनिया का एक हिस्सा है उस पल को महसूस करने की खुशी , आसमान को आंचल से बाँध लेने
का  हौंसला , आँखों में झिलमिल - झिलमिलाते  सपने और आकंठ हर्ष आपूरित आवाज़ -
                                        “ मुझे नौकरी मिल गई है , कल join करना है वैसे कुछ दिनों में exam भी हैं……, पर
मैं सब संभाल लूंगी।” कहते- कहते उसकी आवाज
शून्य में खो सी गई । मुझे खामोश देख
वो फिर चहकी - “ मुझे पता है आप
अक्सर मुझे लेकर चिन्तित होती हो , मैंंने सोचा सब से
पहले आप से खुशी बाँटू। “
                  मैं सोच रही थी अधूरी पढ़ाई , गोद में बच्चा , घर की जिम्मेदारी और ढेर सारे सामाजिक दायित्व । ये भी नारी का एक रुप है कभी बेटी , कभी पत्नि तो कभी जननी । हर रूप में अनथक परिश्रम करती है और अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अवसर की तलाश में रहती है ।अवसर मिलते ही पल्लवित होती है अपनी  पूर्ण सम्पूर्णता के साथ।
                   दमकते चेहरे और उसके बुलन्द हौंसलों को देखकर मुझे बेहद खुशी हुई और यकीन हो गया कि एक दिन फिर वह निश्चित रूप सेे इस से भी बड़ी खुशी मुझसे बाँट कर मुझे चौंका देगी ।

XXXXX

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

"ठौर"

 
तिनका तिनका जोड़ 
तरु शाखाओं के बीच
बड़े जतन से उन्होंने
बनाया अपना घर

सांझ ढलते ही पखेरू
अपना घर ढूंढ़ते हैं
 यान्त्रिक मशीन ने
कर दी उनकी बस्ती नष्ट
टूटे पेड़ों को देख कर
विहग दुखित हो सोचते हैं

उनके घर की नींव पर
बहुमंजिल भवन बनेंगे
हर शाख घरों से पटी होगी
कंक्रीट के जंगल में
हर जगह मनु के घर होंगे

विकलता पर कर नियन्त्रण
पंछी दल चिन्तन करता है
सामर्थ्य हीन मानव
अपने दम पर कब पलता है
हम ढूंढे ठौर कोई
यह वही कदम धरता है 

सामर्थ्य सबल है अपना
हम और कहीं रह लेंगे
रहने दो इसे यहीं पर
हम नई ठौर कर लेंगे

★★★★★














               





                 














शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

"खामोशी"

खामोशी का मतलब
बेज़ारी नही होता
और मूर्खता तो कभी नही
कुदरत ने  हमें बख़्शी है
बोलने के लिए एक जुबान
और सुनने को  दो कान

सुनना और सुन कर गुनना
अहम् अंश हैं जीवन के
नीरवता में फूटता संगीत
देता सीख व्यवहार की
और फूंकता है प्राण
सुप्तप्राय: नीरस मन में

एकांत की शांति में
 द्रुम-लताओं के बीच से
बहता मंद समीर
कानों में रस घोलता
पखेरुओं का मीठा कलरव
मोती सदृश बरखा की बूँदें
धरा पर जब
मद्धिम मद्धिम गिरती हैं
बस खामोशियाँ 
गुनगुनाने लगती हैं

★★★★★
(चित्र-गूगल से साभार)