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शनिवार, 14 दिसंबर 2019

"विचार"


वे …,
चले आ रहे हैं 
सदियों से…
आज इसके साथ
तो कल उसके

आँखें बन्द करने से
जो हैं वे
बदलते कहाँ हैं ?
चल रहें हैं 
जल , थल ,अग्नि ,
वायु और आकाश जैसे
पंचभूत बन
प्राणों के साथ …,

जब होते हैं
मन मुताबिक तो
देते हैं …,
असीम आनन्द
तो कभी चाबुक से बरस
दुख भी देते हैं

सुनो…,
हम दोनों मे से
किसे मारना चाहते  थे ?
मुझे…,या फिर 
उन्हें …,

★★★


13 टिप्‍पणियां:

  1. "आँखें बन्द करने से
    जो हैं वे
    बदलते कहाँ हैं"

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति मीना जी ,सादर नमन

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार कामिनी जी । सस्नेहाभिवादन 🙏

      हटाएं
  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(१५ -१२ -२०१९ ) को "जलने लगे अलाव "(चर्चा अंक-३५५०) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चर्चा मंच पर रचना को मान देने के लिए असीम आभार अनीता जी ।

      हटाएं
  4. सुनो…,
    हम दोनों मे से
    किसे मारना चाहते थे ?
    मुझे…,या फिर
    उन्हें …,
    अंतिम पंक्तियों का भावपक्ष अत्यंत प्रबल एवं विशिष्ट दिशानिर्देशक है। बहुत ख़ूब। सादर नमन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया हेतु हार्दिक आभार अमित जी .

      हटाएं
  5. जन्म के साथ उत्पत्ति है विचार की ... एक को मारे बिना दुसरे का संहार नहीं हो सकता ... हाँ कई बार हम खुद मार देते हैं विचार ...
    गहरी सोच ...

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सारगर्भित अनमोल प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार नासवा जी ।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"