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सोमवार, 15 जून 2026

“भ्रम”

कुछ कहने -सुनने,समझने-समझाने
 की सारी बातें,
 यहीं छोड़ दें तो अच्छा है । 

दुनिया की उलझी हुई रस्में,
 रिश्तों और व्यवहारों का हिसाब-किताब
 इनसे किसी का कुछ 
 कभी अच्छा हुआ है भला।

व्यर्थ बातों में क्यों उलझना
सबके अपने-अपने स्वर्ग और नर्क हैं
 अपनी वैतरणी खुद ही
 पार करता है इन्सान ।

अक्सर हम दुनिया देखते हैं,
  उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं,
 सबके पीछे चलते हैं;
 और इसी अनुकरण की चक्की में
 धीरे-धीरे पिसते हैं।

शायद बेहतर हो कि
 हम एक-दूसरे से बात तो करें,
मगर अपने मन की भी सुने,
 और उस शोर से दूर रहें
 जो केवल भ्रम पैदा करता है ।

***


रविवार, 31 मई 2026

“अनुत्तरित प्रश्न ”


रात अपने अंतिम प्रहर में है,
 और तारे भी बुझने लगे हैं

इन्सान होने के नाते मेरी सोच 
 कहीं खो सी गई है
 जैसे भूसे के अथाह ढेर में
 एक छोटी सी सुई ।

 कई बार कुछ प्रश्न 
 बार-बार,
सामने आ खड़े  होते हैं लेकिन 
उनके उत्तर कहीं नहीं दिखते 

एक विचार कौंधता है मन में 
 क्या केवल जीवित रहना ही
 जीवन का होना है ?

सुबह से शाम तक
 समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
 और मनुष्य..,
 जेब में पड़े  सिक्कों की तरह
 धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को 
क्षीण होते देखता रहता है 

 छोटी-छोटी ज़रूरतों में
 उसके दिन बँट कर रह जाते हैं
 सपने..,
 जो कभी आसमान से
 विस्तृत हुआ करते थे ,
 जीवन के हिसाब-किताब के बीच
 दम तोड़ते दिखाई देते हैं ।

रात के धुँधलके में
 जब तारों की रोशनी भी थक हार कर बैठ जाती है,
 इस तरह के अनगिनत प्रश्न
 और अधिक स्पष्ट होकर सामने आ खड़े होते हैं 

 तब एक सोच उभरती है —

क्या जीवन केवल इसलिए जीवन है 
 कि एक दिन
 हम पूरी तरह खर्च हो जाएँ,
 और किसी को
 हमारी अनुपस्थिति का कोई फ़र्क़ भी न पड़े ।


***


गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

“संकल्प”

शोर-शराबा और किसी भी तरह की तेज आवाज़ें झुंझलाहट भरी हलचल भर देते थे उसके मन में ।दीपावली और होली के त्यौहार तो उसे बहुत पसंद थे मगर पटाखों का शोर उसे कभी नहीं भाया ।

वह सोचती- “पटाखे बजाने से ही ख़ुशियों का प्रदर्शन क्यों होता है ?” पटाखों के शोर से और बाद के धुएँ से निकली गंध से उसे बहुत चिढ़ थी ।


 उसकी यह आदत छुड़वाने के लिए घर पर होली-दीवाली पर पटाखे आते तो उसके लिए फुलझड़ियाँ आया करती ।उसे याद है वह वक्त जब पहली बार दीपावली पर फुलझड़ी थामी थी उसने , उसे जलाने से पहले वह निश्चित कर लेना चाहती थी कि बजेगी तो नहीं।कांपती अँगुलियों के बीच फुलझड़ी की पहली चिंगारी को देखते ही डर के मारे उसने फुलझड़ी को नीचे गिरा दिया था । 


घर की तरह वह स्कूल में भी शांत बच्चों की श्रेणी में आती रही थी रिक्त कालांश में उसे शैतानी करने से अधिक कक्षा-कक्ष की खिड़की से बाहर के हरे-भरे लॉन ,मौसमी फूलों की क्यारियाँ , गिलहरियाँ और वहाँ मँडराते पक्षियों को देखना बहुत पसन्द था । 


समय और प्रकृति परिवर्तनशील हैं और उनके सहचर मनुष्य की प्रकृति भी । आज की वैश्विक हलचल को अनुभव कर वह सोचती है - 

   “इस संसार के मुट्ठी भर मानव अपने प्रभुत्व की लिप्सा में कितनी ही निर्दोष और मासूम ज़िन्दगियों को नष्ट करते हुए सदियों से विकसित और पल्लवित सभ्यताओं को नष्ट करने की बात सोच भी कैसे सकते हैं ।”


बारुद के धुएँ और धमाकों के बीच जीती ज़िंदगियों के बारे में सोचते हुए उसकी आत्मा सिहर उठती है ।लेकिन आज वह छोटी नही है ,बचपन की एकांत प्रिय और कोलाहल से बचने वाली लड़की अब परिपक्व स्त्री बन चुकी है ।उसने तय किया है कि -

“इस वर्ष दीपावली पर वह निराश्रितों के बीच जाकर फुलझड़ियाँ और मिठाई बांट कर उनकी मुस्कराहट में जीवन की सार्थकता ढूँढेगी और शायद, यही उसका एक छोटा-सा प्रयास होगा  जहाँ खुशियाँ धमाकों से नहीं, उजालों से पहचानी जाएँ।”

***


सोमवार, 13 अप्रैल 2026

“बोनसाई”

एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की 

नर्म देह पर..

टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच


घुटनों के बल झुककर

मैंने तुम्हारा नाम लिखा था

अपनी तर्जनी की नोक से


शायद अपने साथ तुम्हारा अहसास 

महसूस करने के लिए 


फिर एक दिन,

अचानक मन में अपनी ही 

उस मासूमियत को टटोलने की

 अधूरी-सी इच्छा जागी—

तो पाया


भूरी, बेजान रेत के विस्तार पर

ईंट-पत्थरों का कठोर जंगल उगा है,


और जहाँ कभी

मेरे स्पर्श से तुम्हारा नाम 

सांस लिया करत था,


वहीं अब

 मनभावन मगर  सीमाओं में बंधा

बोन्साई का पेड खड़ा है


***


बुधवार, 11 मार्च 2026

“डोर”

खामोशी की डोर से 

बँध कर हम 

चले जा रहे हैं किनारे-किनारे 

और..,

 बीच में पसरा पड़ा है 

कभी न सिमटने वाला 

सन्नाटा.., 

फासला तो अधिक नहीं है 

हमारे बीच

मगर सोचों  की गहराई का 

छोर..,

दूर -दूर तक नहीं दीखता 


***


शुक्रवार, 30 जनवरी 2026

“संवेदनाएँ”

रूई के फाहों जैसे ढक गए हैं

तुषार-कणों से देवदार ..,

धरती पर भी नमक सी बिखर गई है

बर्फ़…, 


पास ही पहाड़ की बाहों में

लिपटे घर से

नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर 

गूँज उठता है -

लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,

हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,

मायें मेरिये, शिमले दी रावें,

चम्बा कितनी दूर…, 

चम्बा कितनी दूर…!”


सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ 

एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन 

ढलकने लगती हैं 

ना गीत को पता..,

ना गाने वाली आवाज़ को..,

बस..,

दर्द  दरिया बन 

 दो अजनबियों के बीच बेआवाज़

 बहने लगता हैं 


संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख

वे सदियों से 

यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं 


***