झील-सा धीर-गंभीर
दिखने में निश्चल
लेकिन…,
भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित
मन का आँगन भी
बड़ा विचित्र है
सागर के ज्वार-सा
अपनी ही निस्तब्धता से
बार-बार संवाद करता है
***
झील-सा धीर-गंभीर
दिखने में निश्चल
लेकिन…,
भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित
मन का आँगन भी
बड़ा विचित्र है
सागर के ज्वार-सा
अपनी ही निस्तब्धता से
बार-बार संवाद करता है
***
लम्बी खामोशी के बाद
एक दिन जानी-पहचानी आवाज़
कानों में गूंजी —
"फिर से शुरुआत करें सुख-दुख साझा करने की"
तीर सी सिहरन
समूचे वजूद को सिहरा गई
कुछ देर की चुप्पी
और फिर …
अन्तस् से एक आवाज उभरी
ऐसा है -
“वक्त गुजर गया”
अब भी बहुत काम बाकी हैं जो कभी
हमारे साझी थे
कुछ मेरे और कुछ तुम्हारे
देखो…,
मेरे पास काम बहुत हैं
और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत
मेरी मानो तो ..,,
खाली वक्त में थोड़ा
आत्ममंथन करना
अगले जन्म में मेरे और तुम्हारे काम
ईमानदारी से
बराबर -बराबर रखना
अगर ऊपर वाले की मेहर हुई तो
एक बार और सही—
फिर से शुरुआत कर ही लेंगे
अपने सुख-दुःख
साझा करने की
***
***
तब एक सोच उभरती है —
***
एक मुद्दत पहले,गीली मिट्टी की
नर्म देह पर..
टूटी सीपियों और बिखरे शंखों के बीच
घुटनों के बल झुककर
मैंने तुम्हारा नाम लिखा था
अपनी तर्जनी की नोक से
शायद अपने साथ तुम्हारा अहसास
महसूस करने के लिए
फिर एक दिन,
अचानक मन में अपनी ही
उस मासूमियत को टटोलने की
अधूरी-सी इच्छा जागी—
तो पाया
भूरी, बेजान रेत के विस्तार पर
ईंट-पत्थरों का कठोर जंगल उगा है,
और जहाँ कभी
मेरे स्पर्श से तुम्हारा नाम
सांस लिया करत था,
वहीं अब
मनभावन मगर सीमाओं में बंधा
बोन्साई का पेड खड़ा है
***
खामोशी की डोर से
बँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
और..,
बीच में पसरा पड़ा है
कभी न सिमटने वाला
सन्नाटा..,
फासला तो अधिक नहीं है
हमारे बीच
मगर सोचों की गहराई का
छोर..,
दूर -दूर तक नहीं दीखता
***
रूई के फाहों जैसे ढक गए हैं
तुषार-कणों से देवदार ..,
धरती पर भी नमक सी बिखर गई है
बर्फ़…,
पास ही पहाड़ की बाहों में
लिपटे घर से
नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर
गूँज उठता है -
“लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,
हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,
मायें मेरिये, शिमले दी रावें,
चम्बा कितनी दूर…,
चम्बा कितनी दूर…!”
सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ
एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन
ढलकने लगती हैं
ना गीत को पता..,
ना गाने वाली आवाज़ को..,
बस..,
दर्द दरिया बन
दो अजनबियों के बीच बेआवाज़
बहने लगता हैं
संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख
वे सदियों से
यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं
***
समय निर्बाध
तय करता रहा अपनी यात्रा
और..,
जीवन आकंठ डूबा रहा अपनी आपाधापी में
जी लेंगे अपनी जिन्दगी भी
फुर्सत मिलने पर…,
जैसे जीवन साल भर की
कतर-ब्योंत का बजट हो
आम आदमी की सोच यही तो रहती है
लेकिन…
समय की गति कहाँ रूकती है सोचों के मुताबिक़
वक्त मिलने तक ..,
वक्त के दरिया में बह जाता है
न जाने कितना ही पानी
सांसारिकता कब समझ पाती है
सृष्टि के नियम
सिक्के के पहलुओं की तरह बँधे हैं
समय और जीवन
समय पर न साधने पर फिसल जाते हैं
रेत के कणों जैसे बन्द मुट्ठी से ।
***