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शनिवार, 19 मार्च 2022

“मुक्तक”


अपनी करनी अपनी भरनी अपने हाथ में ,

दोषारोपण क्यों करना किसी पर बेबात में ॥

संसार में सर्वगुण परिपूर्ण कोई भी कहाँ है ,

फिर क्यों लीक पीटना किसी भी हालात में ॥

🍁


मंद तारों की ज्योत ढलती रात की मानिंद ,

सोच गुम है भूसे के ढेर में सुई की मानिंद ॥

ऐसे जीवन का भी होना क्या होना जो ,

 खर्च हो रहा जेब के सिक्कों की मानिंद ॥

🍁


नकारने से हम नाकाबिल नहीं हो जाते ,

बिना श्रम के लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते ॥

क्यों नहीं रख पाते सकारात्मक सोच और ,

जीत  की स्पर्धा में शामिल  नहीं हो जाते ॥

🍁


 स्व को मिटा जब किसी और के हो जाओगे ,

मिलेगी ख़ुशी जो किसी मासूम को हँसाओगे ॥

जीत का हर्ष क्या ? हार का दर्द क्या ?

खो कर खुद को खुद के करीब आ पाओगे ॥


🍁


***








शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

'मुक्तक"

चले जब हाथ थामे फिर संग छोड़ना क्यों है ।

मिले कैसी भी दुश्वारी अब मुँह मोड़ना क्यों हैं ।।

बने जन्मों के साथी हैं  सब सुख-दुख में साझी ।

इरादे नेक  हैं अपने तो  बंधन तोड़ना क्यों है ।।


यादों की गलियों में मैं  बचपन को ढूंढती हूँ ।

पल-पल घटते जीवन में अमन को ढूंढती हूँ ।।

मेघों को देख  दृगों में उतर आती है करूणा ।

इन्द्रधनुषी सुमनों से खिले उपवन को ढूंढती हूँ ।।


थोड़ा भरोसा है खुद पर बहुत ज्यादा नही है ।

सीमित रहेगी सदा वह  यह भी तो वादा नहीं है ।।

न तो मोह की सीमा न चाहतों पर बंधन ।

रुक जाए गंतव्य से पहले धारा का इरादा नहीं है ।।


 🍁🍁🍁🍁


रविवार, 24 नवंबर 2019

।। मुक्तक ।।

(1)
वृक्षों के जैसा कोई उपकारी नही है
नष्ट करना इनको समझदारी नही है।
पोषित इन के दम पर पूरा पर्यावरण
वन रक्षण क्या सबकी जिम्मेदारी नहीं है
( 2 )
स्व को कर परमार्जित हम आगे बढ़ते हैं ।
अपनी 'मैं' को भूल कर सबकी सुनते हैं ।।
हो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का भाव ।
करे उन्नति सम्पूर्ण राष्ट्र ,यही स्वप्न देखते हैं ।।
(3)
ऐसे भी नौनिहाल हैं जो काँटों में पलते हैं ।
श्रम की भट्टी में वो लौह खण्ड से ढलते हैं ।।
दो अवसर उनको भी तो स्व उन्नयन का ।
नन्ही आशा के दीप उन नैनों में भी जलते हैं ।।
(4)
सकारात्मकता का भाव हृदय में संचित करेंगे ।
सर्वांगीण शिक्षा के कीर्तिमान अर्जित करेंगे ।।
नहीं रहे समाज में वर्गभेद और निरक्षर कोना ।
कैसे फिर विकास और उत्थान  से वंचित रहेंगे ।।

★★★★★

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

"मुक्तक"

"मुक्तक"
( 1 )
मानव की यह आदत पुरानी है नई नहीं है ।।
सीखा नहीं कल से कुछ क्या ये सही है ।।
दिवास्वप्नों में खोया यह भी नही जानता ।
आने वाले कल की नींव आज पर धरी है ।।
(2)
तीखे तंज सहन करना सीख लोगे ।
समझो आधी दुनियां जीत लोगे ।।
वक्त सीखा देता है जीने का ढंग ।
मार्ग के कंटक भी स्वयं बीन लोगे ।।
(3)
सज़दे में झुकता सिर ऐसे शूरवीरों के आगे
कर देते तन-मन न्यौछावर मातृभूमि आगे
जन्म-मृत्यु के चक्र में बंधा हुआ हर कोई
मृत्यु भी नमन करती ऐसे वीरों के आगे
★★★

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

।। मुक्तक ।।

(1)

भला-बुरा सब भूल कर ,आगे की सोचते हैं ।
कुछ अपनी कहते हैं , कुछ औरों की सुनते हैं ।।
खुद को खुश रखने का ,कोई अवसर ढूंढते हैं ।
सबकी उम्मीदें हों पूरी , यही ख्वाब देखते हैं ।।


 ( 2 )                           

क्यों भागते हो हर दम थोड़ा रुक जाओ ।
 दो पल निकाल अपनों संग वक्त बिताओ ।।
बात फख़त इतनी सी है कि हम भी हैं तुम्हारे ।
करते हैं मनुहार..., रूको ! मान भी जाओ

(3)

सुकून की तलाश में फिरता आदमी ।
प्यासे हिरन सा भटकता आदमी ।।
मरू लहरों में फंस नहीं मिलता सुख ।
खुद से यह नहीं समझता आदमी ।।

( 4 )

यादों के दरीचे खुल से गए ।
 जज्बात यूं ही बिखर से गए ।।
खुद को संभालना था मुश्किल ।
बूँद बन सागर में सिमट से गए ।।



       XXXXX

शुक्रवार, 9 नवंबर 2018

।। मुक्तक ।।

  ( 1 )


तेरे सारे ख़त मैंने कल जला दिए ।
यादों के निशां दिल से मिटा दिए ।।
आज आकर फिर यूं  सामने मेरे ।
गुजरे पल फिर क्यों दोहरा दिए ।।
     
                 ( 2 )

मैं तुझ पे यकीन करूं कैसे ।
तुम्हारे मन को मैं जानूं कैसे ।।
वक्त चाहिए खुलने में गिरहें ।
है सब कुछ ठीक मानूं कैसे ।।


( 3 )

हम तुम्हारा यकीन कर लेते हैं ।
ख्वाब बंद आँखों में भर लेते हैं ।।
मत देना उम्र से लम्बा इन्तजार ।
हम भी दोस्ती का दम भर लेते हैं ।।

                 ( 4 )

रूठे हैं जो उन्हें मना के दिखाओ ।
हुनर अपनी समझ का दिखाओ।।
आसान नहीं कोई भी मंजिल ।
अर्जमंदी से मंजिलें पा के दिखाओ ।।

            XXXXX


गुरुवार, 28 जून 2018

।। मुक्तक ।।

आप अपने मन की सुना कीजिए ।
और सच के मोती चुना कीजिए ।।
क्यों उलझते हैं तेरे मेरे के फेर में ।
बहते दरिया की तरह से बहा कीजिए

हम.मिलते तो कभी कभी हैं ।
मगर लगता दिल से यही है ।।
साथ है हमारा कई जन्मों से ।
सच है ये कोई दिल्लगी नही है ।।

जीने का शऊर आ गया तेरे बिन
तूने भी.सीख लिया जीना  मेरे बिन
जरूरी है आनी दुनियादारी भी
जिन्दगी काटनी मुश्किल इस के बिन

गिरना संभलना , संभल कर चलना
रोज नये हुनर सिखाती जिन्दगी ।
नित नई भूलों से , नित नये  पाठ
समय के साथ सिखाती जिन्दगी ।।
XXXXXXX

बुधवार, 13 जून 2018

।। मुक्तक ।।

                       (1)

कुछ तुम कहो कुछ मैं कहूँ , बाकी सब बातें जाओ भूल ।
बेकार की है दुनियादारी , नही होते इस से कुछ दुख दूर ।।
औरों की बात करो मत तुम , सब अपनी अपनी करते हैं ।
इस देखा देखी के चक्की में , बस हम जैसे ही पिसते हैं ।।

                          (2)

कल तक जो थे मेरे अपने , अब बेगानों सी बातें करते हैं ।
अपना अपना हम करते हैं , ये अपने ही छल करते हैं ।।
मुठ्ठी में बंद मखमली ख्वाब , तितलियों की तरह मचलते हैं ।।
पा कर खुद को आवरण बद्ध , मुक्ति के लिए तरसते हैं ।।

                         XXXXX

रविवार, 20 मई 2018

।।मुक्तक।।

( 1 )
सहमति  हो किसी बात के लिए भी ।
संभव नहीं ये किसी के लिए भी ।।
कई बार मौन भी ओढ़ना पड़ता है ।
सब के अमन-चैन के लिए भी ।।
                 
                ( 2 )

निहारना चांद को भला सा लगता है ।
सौंदर्य का रसपान भी अच्छा सा लगता है ।।
खूबसूरती की कमी तो सूरज में भी नहीं ।
बस नजरे चार करना ही टेढ़ी खीर सा लगता है ।।

XXXXX