अपनी करनी अपनी भरनी अपने हाथ में ,
दोषारोपण क्यों करना किसी पर बेबात में ॥
संसार में सर्वगुण परिपूर्ण कोई भी कहाँ है ,
फिर क्यों लीक पीटना किसी भी हालात में ॥
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मंद तारों की ज्योत ढलती रात की मानिंद ,
सोच गुम है भूसे के ढेर में सुई की मानिंद ॥
ऐसे जीवन का भी होना क्या होना जो ,
खर्च हो रहा जेब के सिक्कों की मानिंद ॥
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नकारने से हम नाकाबिल नहीं हो जाते ,
बिना श्रम के लक्ष्य हासिल नहीं हो जाते ॥
क्यों नहीं रख पाते सकारात्मक सोच और ,
जीत की स्पर्धा में शामिल नहीं हो जाते ॥
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स्व को मिटा जब किसी और के हो जाओगे ,
मिलेगी ख़ुशी जो किसी मासूम को हँसाओगे ॥
जीत का हर्ष क्या ? हार का दर्द क्या ?
खो कर खुद को खुद के करीब आ पाओगे ॥
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