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शनिवार, 4 जुलाई 2020

"वक्त"

एक मुद्दत के बाद
आईने की रेत हटा 
खुद के जैसा
खुद की नजर से
तुमको देखा

पहली बार लगा
वक्त गुजरा कहाँ हैं
वहीं थम गया है 
तुम्हारी पल्लू संभालती
अंगुलियों से लिपटा

उजली धूप सी हँसी के साथ
 मानो कह रहा हो..
गुजर जाऊँ मैं वो हस्ती नहीं
तह दर तह सिमटा युगों से
मैं तो यहीं- कहीं…

तुम्हारे ही आस-पास
सर्दियों की ढलती धूप में
गर्मी की तपती लूओं में
सावन की बौछारों से भीगा
विस्मृत स्मृति के गलियारों में

🍁🍁🍁

सोमवार, 29 जून 2020

"शब्द"

कुछ बातें ,कई बार
बन जाती हैं 
वजूद की अभिन्न 
कर्ण के ...
कवच-कुण्डल सरीखी
अलग होने के नाम पर
करती हैं तन और मन 
दोनों ही छलनी

सर्वविदित है
शब्दों की मार ...
इनको भी
 साधना पड़ता है
अश्व के समान

तुणीर से निकले 
बाण हैं शब्द 
जो लौटते नहीं..
जख़्म देते हैं 
या फिर…
मरहम बनते हैं

सीमाओं को तोड़ते
अहंकार के 
मद में डूबे शब्द
नहीं जानते कि
कब रख देंगे
किसी दिन
किसी…
महाभारत की नींव

★★★

सोमवार, 22 जून 2020

"क्षणिकाएँ"


झील किनारे...
बसी है बैया कॉलोनी,
सूखी शाखों पर ।
मेरे मन की सोचों जैसी...
थकान भरी और,
स्पन्दनहीन ।
🍁🍁🍁
सब कुछ तो है समय भी,  
और ...
समय की मांग भी ।
लेकिन...
मैं और केवल अपनी मैं के साथ,
दोनों...
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे ।
🍁🍁🍁
कछुआ सिमट जाये जैसे...
अपने ही खोल में
वैसे ही ...
खुद के खोल में डूबा मन
 बादलों में छिपे सूरज से...
अपने आंगन में
धूप का एक टुकड़ा मांगता है ...

🍁🍁🍁🍁

शनिवार, 20 जून 2020

।। दोहे ।।


पीड़ा मन की बांटती, मैं रजनी के संग ।
माँ जाई तू बहन सी, छाया जैसा संग ।।

यामा,निशा,विभावरी , कितने तेरे नाम ।
तेरी राह निहारती ,जब चाहूँ आराम ।
                         
सुन के सब की फिर गुने ,बोले मन की बात ।
अपनी मैं के फेर में , शह बन जाती मात  ।।

दर्पण में छवि  देख के , मनवा करे गरूर ।
हिय पलड़े गुण तौलिए, जीवन क्षण भंगुर ।।

तम के संग प्रकाश है ,भोर करे संकेत ।
शीत-घाम के साथ तू , मन कर निज से हेत ।।

*****

सोमवार, 15 जून 2020

"उलझा मांझा"

बेमुरव्वत सी इस दुनिया में ,
खुद को हम बहलाये कैसे ?
जीवन बगिया उलझा मांझा ,
 उलझन को सुलझाये कैसे ?

नहीं टूटती मन की चुप्पी ,
आस-पास में लोग बहुत है ।
फिरते लादे दिल पर बोझा ,
किस को सुनने की फुर्सत है ।

बीते जिस पर वो दिल जाने ,
खुद को वो समझाये कैसे ?
जीवन बगिया उलझा मांझा ,
उलझन को सुलझाये कैसे ?

अब कहते हैं हमने उसको ,
छिप- छिप अश्रु बहाते देखा ।
पीड़ा विगलित दुखी हृदय को ,
कैसे कर पाये अनदेखा ।

जड़ विहीन नकली दुनिया में ,
अपना नीड़ बसाये कैसे ?
जीवन बगिया उलझा मांझा ,
उलझन को सुलझाये कैसे ?

 *****


शुक्रवार, 12 जून 2020

"स्त्रियाँ"

स्त्रियाँ चाह रखती आई हैं
फूलों से व्यक्तित्व की और  
 रंग -बिरंगे पंखों के साथ 
भावनाओं के साँचे में ढले
लौह-स्तम्भ से  घर की...
जिसमें देखती हैं वे 
सदियों से सदियों तक 
अपनी ही  हुकूमत...

अनपढ़ हो या पढ़ी-लिखी
बड़ी भोली होती हैं स्त्रियाँ
गुड्डे-गुड़ियों के  खेल के साथ 
 बन जाती हैं माँ और दादी जैसी ...
 सीख लेती हैं संवारना 
अपना घर-संसार 
और...स्वेच्छा से सारा दिन 
बनी फिरती हैं चक्करघिन्नी ...

कभी घर तो कभी दफ्तर
जीवन समर में कमर कसे 
डटी रहती हैं स्त्रियाँ...
जीवन की सांध्य बेला में
रण-क्षेत्र से लौटे सिपाही सी
घर के आंगन के बीच
तुलसी-चौरे पर जलाती दीपक
झांकती हैं स्मृति कपाट की झिर्रियों से 
करती रहती हैं आकलन
खोने और पाने का…. 

***
【चित्र-गूगल से साभार】

मंगलवार, 9 जून 2020

"हाइकु"



भोर लालिमा~
कलरव की गूंज
पेड़ों से आई ।

गिलोय लता~
वैद्य की दुकान में 
खरल गूंज ।

जीर्ण पुस्तक~
अंगुलियों के बीच
पुराना ख़त ।

शरद चन्द्र~
कूलबंद तोड़ती
सिंधु लहरें ।

जेष्ठ मध्याह्न~
मलाई वाला बर्फ
गली में टेर ।

***

शुक्रवार, 5 जून 2020

"क्षणिकाएं"

(1)
मुझको समझने के लिए
काफी हैं  शब्दों के पुल
मेरी दुनिया शब्दों से परे
अधूरी सी है ….
(2)
सांसारिक व्यवहारिकता
अभेद्य दीवार सी है
मेरे लिए...
पारदर्शिता के अभाव में
घुटन महसूस होती है
(3)
अचानक …
टूट कर गिरा एक लम्हा
खुद की खुदगर्ज़ी भूल...
सीना ताने खड़ा है
लेने हिसाब
ज़िन्दगी भर का...

*****

शनिवार, 30 मई 2020

"मानवता"



स्वार्थ जब हो बड़े अपने 

मानवता- चर्चा कैसे हो ।

फूटते पाँवों के छाले ।

दर्द महसूस हो तो हो ।।


कहीं पर भोर है उजली ।

 कहीं चहुंओर अंधियारा ।।

बना पत्थर हृदय माली ।

 तिनके का कौन सहारा ।।


धरती पर आग बरसती है ।

मेघों का पानी भी सूखा ।।

चले जा रहे हैं जत्थों में ।

बेबसों का मन बल है ऊँचा ।।


अरे ओ पत्थर दिल वालों ।

कभी इनकी भी सुध तो लो ।।

छोड़ कर तूं- मैं  तुम अपनी ।

कभी तो जन-सेवा कर  लो ।।


संकट से उबरे सब निर्बल ।

दायित्व निबाहो अब मन से ।।

मत फेरो अपनी आँखे तुम ।

आपदा ग्रस्त जन रक्षण से ।।

            

 🍁🍁🍁


【 चित्र - गूगल से साभार 】

रविवार, 24 मई 2020

"इन्तज़ार"

 इन्तजार..और
प्यार करने का हक
उनका भी है 
तभी तो क्वींसलैंड
के नीले समुद्री छोर पर
पर्यटकों का
इन्तज़ार करती हैं 
डॉल्फिनस्...
लॉकडाउन उन्हें लगता है 
इन्सान की नाराजगी 
दबाये मुँह में ला रही हैं
सीप-शंख के साथ
लकड़ी के  टुकड़े ...
 मानो .. रूठे इन्सान को
मनाने की खातिर
उनकी तरफ से यह 
दुर्लभ भेंट हो ...
वे नहीं जानती
कोरोना का प्रकोप
 करती हैं 
 इन्तज़ार इन्सान का…
और..लौट जाती हैं 
फिर से आने के लिए ...
 इस उम्मीद के साथ
 कि.. मना लेंगी 
येन केन प्रकारेण 
एक दिन इन्सान को...
अद्भुत और अकल्पनीय है ।
उनका निश्छल स्नेह...
🍁🍁🍁
【चित्र-गूगल से साभार】

शुक्रवार, 22 मई 2020

"मजदूर"

 विकास रथ की धुरी सहित
अर्थ व्यवस्था अट्टालिका के
नींव प्रस्तर...
तुम कमतर कैसे हो गए

दर दर की झेलते अवहेलना
अपने श्रम से खड़े करते
गगनचुंबी भवन…
अपने ही घर में प्रवासी कैसे हो गए

मूल्य समझो कभी तो निज मान का
बनते अंग सदा भीड़ तंत्र का
जनता जनार्दन हो तुम …..
विपद- बेला में दीन कैसे हो गए

उपेक्षा का गरल पीयोगे कब तक
चलना संभल सीखोगे कब तक
पर्वत जैसे धीरज वालों ...
तुम इतने अधीर कैसे हो  गए

तुम्हारे बल पर रोटियां सिकती 
सत्ता और शक्ति की गोट चलती 
कभी तो हो स्व हित में चिन्तन ….
सदा शोषित तुम ही कैसे हो गए

****

【चित्र-गूगल से साभार】








शनिवार, 16 मई 2020

"प्रतीक्षा" 【 माहिया】

नव पल्लव अंकुआये
किसलय पंक्ति देख
सूखे तरु हरषाये

गोकुल की सब गौरी
मिलने कृष्णा से
निकली चोरी-चोरी

महकी पाटल कलियाँ
वृष्टि हुई अब तो
मिल बात करें सखियाँ

मग देख रहे नैना
कब आओगे तुम
चितचोर जरा कहना

बेला - जूही महकी
छलिया है कान्हा
कहती चलती-चलती
🍁🍁🍁

【 चित्र-गूगल से साभार】

बुधवार, 13 मई 2020

"ख्वाब"

कस के मुट्ठी में बंद हैं वे
माँ से जिद्द कर लिए
सिक्के की तरह…
स्कूल से आते समय
खानी है टॉफी 
संतरे वाली..जीरे वाली…
उस वक्त...
वो सिक्का गुम गया
निकाल लिया किसी ने
पेन्सिल बॉक्स से...
या फिर
गिर गया कहीं
मेरी ही लापरवाही से… 
ख्वाब बस ख्वाब ही रहा
मगर याद रही नसीहत...
जो माँ ने दी-
सहेज कर रखो जो दुर्लभ है
तुम्हारी खातिर...
माँ की वो बात आज भी याद है
पूरी प्रगाढ़ता से
बाँध रखे हैं मुट्ठी में चंद ख्वाब...
जो मेरे वजूद के साथ मेरे अभिन्न हैं
वक्त के साथ वे ...
रिहाई मांगना भूल गए
और मैं मुट्ठी खोलना … ।।।
*****
【गूगल से साभार】

शनिवार, 9 मई 2020

"गुलमोहर"

गुलमोहर...
लाल-पीले फूलों की झब्बेदार 
टोकरी जैसे भरी धूप में 
किसी ने उलट के रख दी 
तने के सिर पर…
उस पेड़ को देख भान होता  है
जैसे.. कुदरत ने 
छतरी तान रखी हो...
मन्त्रमुग्ध सा करता है
अपनी मधुरिमा से
गुलमोहर...
बचपन में खेलते-पढ़ते
बंट जाता था ध्यान
जब कहीं  दूर से सुन जाता
 यह गीत...
'गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता…'
नहीं जानती लिखते वक्त
कौन बसा था ...
'सम्पूर्ण सिंह कालरा जी' के मन में
मगर जब भी जिक्र होता है 
गुलमोहर का..
मेरी स्मृति-मंजूषा से निकलती है
गुड़ की मिठास सी
 वात्सल्यमयी आवाज
 गुलमोहर…!!
🍁🍁🍁

【चित्र: गूगल से साभार】