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मंगलवार, 22 सितंबर 2020

"मन की वीथियां"

ब्रह्मपुत्र का सिन्दूरी जल

और..

भोर की पहली किरण 

पुल से गुजरते हुए

 एक तैल चित्र सा दृश्य

अक्सर दृग पटल पर

उभर आता है

निरभ्र गगन के कैनवास पर

 इन्द्रधनुष सा...

कुछ नाविक जाल लिए

कुछ मछली के ढेर लिए

घर से आते या घर जाते

ना जाने कौन से

 सम्मोहन में बंधे ..

 हिमालय श्रृंखला की गोद में

 बसे इस अँचल में

एक बार का गया कोई

वापस अपने देस नहीं लौटता..

भूला-भटका यदि कोई

लौट भी आता  है तो...

 मेरी तरह स्मृति के गलियारों में

भटकता फिरता है

कामरूप के 

काले जादू में बंधा

उस नाव और नाविक सा..

"जा रहा है कि आ रहा है" के

 भंवर जाल का बोध कराता

जिसमें...

उलझ कर रह जाता है मन

दृष्टिभ्रम सदृश .. 


***

 

बुधवार, 16 सितंबर 2020

"चिंतन"

                          
आत्म दर्शन के लिए
समय कहाँ है हमारे पास
बाहरी आवरण को ही
जाँच-परख कर
ऐंठे फिरते हैं गुरूर में
देख भाल के अभाव में 
अन्तर्मन रहता है 
सदा ही उपेक्षित 
देह के एक कोने में
मासूम बच्चे सा
उठाता है सिर कई बार
जोर लगा कर 
तो व्यस्त भाव से 
पूरी श्रद्धा और हक  से 
दबा देते हैं 
उसकी आवाज़
जैसे..
घर आए मेहमान के 
आतेथ्य भाव में मगन हम
अपने ही घर में
अपने ही बालक को 
भूखा सोने को मजबूर करते हैं

***

सोमवार, 14 सितंबर 2020

"बदलता मौसम"

सभी विद्वजनों को हिन्दी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाइयाँ 💐💐 🙏🙏💐💐
--
आज कल आपसी सौहार्द्र 
और विमर्श के बातें कम
और विवाद की बातें
अधिक होती हैं..

मन के आंगन की
चहक खो सी गई है कहीं
क्योंकि एक कप चाय में अब
पहले वाली ताजगी नहीं रही..

चाँद -सितारे और सूरज भी
समझदार हो गए हैं..
बदलती हवाओं के रूख के साथ
कम ही दर्शन देते हैं..

बारिश और ठंड ने मिल कर
शहर के बिसूरते से मूड पर
झक्कीपन  की चादर 
चँदोवे सी तान दी..

एक शंका सी है मन में..
बदली आबोहवा के साथ 
सामाजिक दूरियां
कहीं भावात्मक दूरी 
 में तब्दील न हो जाए...

***

बुधवार, 9 सितंबर 2020

'सांझ"

                              










सांध्य सुंदरी बन के अप्सरा
भू लोक पर आई
देख धरा का रूप सलोना
मन ही मन सकुचाई

हरित रंग की ओढ़े चूनर
सतरंगी फूलों के झूमर
मादक सी पछुआ बयार से
धान फसल हरषाई

इसकी भोर का क्या है कहना
ये तो आठ प्रहर में गहना
पंछी चहके अमराइयों में
सूर्य किरण इठलाई

गोवत्सों की कंठ घंटियाँ
गायों की स्नेहिल गलबहियाँ
 देख देख वसुधा का आंगन 
उसने सुधबुध बिसराई

सांध्य सुंदरी बन के अप्सरा
भू लोक पर आई
देख धरा का रूप सलोना
मन ही मन सकुचाई


🍁🍁🍁
【चित्र : गूगल से साभार】

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

"तुम तो नहीं हो"

तुम तो नहीं हो

मगर..

तुम्हारी यादों में 

आजकल

मन भटकता बहुत है 

कमरे की खिड़की से

निकल..

पहुँच जाता है सोने सी 

भूरी बालू के छोटे से

 ढूह पर...

पूछता है तुमसे

ये टीले पर धान कम 

और...

उस तलाई में ज्यादा क्यों ?

पलट कर तुम

 मुझे अन्तर समझाया करती थी 

अब तुम तो नहीं हो

बस...

यादें हैं तुम्हारी

मगर इस मन का क्या ?

 बौराया सा 

एक के बाद दूसरा..

और न जाने कितने ही

प्रश्न करता था

 तुम से...

कितने ही ऐसे सवाल

जिनके जवाब 

तुम्हारे आँचल के 

छोर से बँधे थे

कितने ही वैसे  सवाल

जो उलझा कर तुम्हें

तुम में 

झुंझलाहट भर देते थे

पता है...कल मैंने

कच्चे आम की

सब्जी बनाई थी

और...

इतने बरसों के बाद भी

उसमें स्वाद 

तुम्हारे हाथों वाला ही था

लगता है ...

मेरे हाथ भी अब

तुम्हारे ख्यालों की

 महक से

महकने लगे हैं


🍁🍁🍁

शनिवार, 29 अगस्त 2020

"क्षणिकाएं"

कड़वे घूंट सा आवेश
 तो पी लिया
मगर...
गहरी सांसों में मौन भरे
 पलकों की चिलमन में
एक क़तरा...
अटका रह गया वह
अभी तक वहीं ठहरा है
खारे सागर सा..
🍁

हर दिन 
एक वादा..
कभी न तोड़ने के लिए
और…,
अगले ही दिन
एक विमर्श..
उसे तोड़ने के लिए
🍁

चलो !!
आज यूं भी कर लें
हवाओं में घुली आशाएं
सांसों में भर लें
उड़ा दें एक फूंक में
सारी चिंताएं..
दूर करें मन के क्लेश
पंछी से गुनगुनाएं
निखरी-धुली फिज़ाओं के
स्वागत में ...
खुले हृदय से बाहें फैलाएं
🍁

शनिवार, 22 अगस्त 2020

"नीरवता"

नीरवता के दौरान…
काम-काज की खटपट के साथ
किसी पेड़ से 
पक्षी की टहकार
एकांत का ...
वाद्ययन्त्र लगता है
क्योंकि इससे जीवन राग  
 जो गूंजता है…
 एज्यूकेशन एंड वर्क फ्रॉम होम ने
अवधारणा पुष्ट की है...
 सामाजिक और वैश्विक दूरियों में
 ग्लोबल विलेज के अस्तित्व की
कोरोना आपदा काल ने
बहुत कुछ बदला है...
इन्सान के जीने का ढंग
सोचने समझने का नजरिया
अनुकूल पर्यावरण और
प्रतिकूल भुगतान संतुलन
साथ ही सीखा दी है...
विकट परिस्थितियों से
उबरने की अद्भुत ताकत

***

बुधवार, 19 अगस्त 2020

"जीवन"

मानव जीवन में लगभग तीन-चार वर्ष की उम्र से
भाग-दौड़ का क्रम शुरू होता है जो जीवनपर्यंत चलता
रहता है । समय की रेखा शैशवावस्था से बढ़नी शुरू होती  है जो नश्वरता के छोर पर खत्म होती है लेकिन काम 
और आगे के प्लान अपने लिए सोचने का समय ही नहीं
देते । इन्हीं ख्यालों को रूप देने की एक कोशिश-

कभी कुछ कहना बाकी है ,
कभी कुछ सुनना बाकी है ।
यूं ही कट गई उम्र सारी ,
न जाने क्या-क्या बाकी है ।।

कभी यह भी करना है ,
और फिर वह भी करना है ।
वक्त नहीं बस खुद के खातिर ,
न जाने क्या-क्या करना है ।।

बिन पहियों वाली है ,
ये जीवन की गाड़ी है ।
हर दिन की आपाधापी में ,
एक दिन थम जानी है ।।

🍁🍁🍁

रविवार, 16 अगस्त 2020

"त्रिवेणी"

खामोशी की जुबान गंभीर होती है ।
जब बोलती है तो उसकी गूंज ,

 बेआवाज़ ही ,दूर तक सुनाई देती है  ।।

🍁🍁🍁

अपनी जगह देख 'डोंट डिस्टर्ब' का टैग  ।
बिना बताये चुपचाप लौट जाती है ,

नींद का भी अपना स्वाभिमान है  ।।

🍁🍁🍁

पूनम का चाँद ठिठुरा सा लगता है ।
चाँदनी की पैरहन में भी नमी भरी है ,

कई दिनों से सूरज दूज का चाँद जो हो गया है ।।

🍁🍁🍁







शनिवार, 8 अगस्त 2020

"बंद दरवाज़े"

खोलना चाहती थी
मन की वीथियों के
बंद दरवाजे ...
नेह में डूबे
फुर्सत के लम्हों में
मगर…
कुंडी-तालों पर
जंग लगा था
दुनियादारी का…
नेह का तेल
पानी सा हो गया
या फिर…
चाबी खो गई
वक्त के दरिया में
जल्दबाजी में…
मेरी स्मृति ही ,
धूमिल हो गई थी कहीं

🍁🍁🍁

सोमवार, 3 अगस्त 2020

"चिट्ठी"

मेरी बातें तुम तक पहुँचे, 
एक ऐसा पैगाम लिखूं ।
फिर सोचा एक बार यह  ,
कि चिट्ठी तेरे नाम लिखूं ।।

कितने पन्ने लिख लिख फाड़े ,
मन भावन कुछ लिखा नहीं ।
भा जाये  तुम को जो बातें ,
लिखना ऐसा हुआ नहीं ।।

दिन-दिन होती भारी कंबली ,
भोर लिखूं या सांझ लिखूं ।।
फिर सोचा एक बार यह  ,
कि चिट्ठी तेरे नाम लिखूं ।।

पलता रहता उर में संशय ,
रिक्त-रिक्त जीवन लगता ।
शून्य जगत तुम बिन जैसे ,
खारे सागर सा बहता ।।

चक्रव्यूह सी फेरी मन की ,
अटल कौन से भाव लिखूं ।
 फिर सोचा एक बार यह  ,
कि चिट्ठी तेरे नाम लिखूं ।।

🍁🍁🍁

【चित्र : गूगल से साभार】







शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

"त्रिवेणी"

माटी की देह से उठती  मादक गंध ,
सूर्योदय के साथ दे रही है संदेशा ।

प्रकृति की देहरी पर पावस ने पांव रख दिये हैं ।।
🍁🍁🍁


घंटे दिन में और दिन बदल रहे हैं महिनों में ,
मन के साथ घरों के दरवाजे भी बंद है ।

आरजू यही है महिने साल में न बदलें ।।
🍁🍁🍁

वसन्त ,ग्रीष्म कब आई, कब गई,भान नहीं ,
खिड़की के शीशे पर ठहरी हैं पानी की बूदें ।

ओह ! बारिशों का मौसम भी आ गया ।।
🍁🍁🍁


लेखनी और डायरी बंद है कई महिनों से ,
किताबें भी नाराज नाराज लगती हैं ।

कभी-कभी अंगुलियां ही फिसलती हैं 'की-बोर्ड'
 पर ।।
🍁🍁🍁


रोज का अपडेट कितने आए.., हैं..,और गए ,
सुप्रभात.. शुभरात्रि सा लगने लगा है ।

घर पर रहें..सुरक्षित रहें..यहीं प्रार्थना है ।।
🍁🍁🍁




मंगलवार, 21 जुलाई 2020

लघु कविताएं

विरासत में मिले
 मृदुल तेवर..
समय की तपती धूप खा कर 
कंटीले हो गए और .....
स्वभाव का बढ़ता खारापन
 सागर जल जैसा...
 वक्त लगता है समझने में
खारापन इतना बुरा भी नहीं
जितना माना जाता है 
🍁
निरभ्र नील गगन में
 घिर आती हैं रोज घटाएँ...
उमड़-घुमड़ कर अपनी
 गागर उंडेल रीत जाती हैं
 धरा के आंगन पर...
मरकती हो गया 
वसुधा का रंग भी...
और आसमान इन्द्रधनुषी
बस...एक मन का आंगन है 
जिसके छोर से सांझ सी
अबोली उकताहट..
कस कर लिपटी है
जो हटने का नाम नहीं लेती
🍁

शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

प्रार्थना ।।दुर्मिल सवैया।।

सुन लो विनती अब नाथ हरे , भव के दुख संकट दूर
करो ।
सिर जूट- जटा जल धार धरे ,गल शोभित माल भुजंग
प्रभो ।।
वसुधा निखरे बरखा बरसे ,ऋतु पावन सावन मास 
सुनो ।
भवसागर से तब नाव तरे ,मन पावन हो  शिव नाम 
जपो ।।
🍁🍁🍁
रथ हांक चले मथुरा नगरी , बरसें दृग ज्यों बरसी 
बदरी । 
वृषभानु सुता चुपचाप रही,मग द्वार खड़ी सखियां
सगरी ।।
जमुना तट  की छवि सून भई, घर आंगन बीच पड़ी
गगरी ।।
मुरलीधर को नित ढूंढ रही,अकुलाय रही ब्रज की 
नगरी ।
🍁🍁🍁