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शुक्रवार, 27 नवंबर 2020

"गोधूलि संग हुआ अंधेरा"

गोधूलि संग हुआ अंधेरा

तारों ने  जादू बिखेरा


चाँदनी को साथ ले कर

नभ मंडल में चंद्र चितेरा


विहग की टहकार मध्यम

टहनियों के मध्य बसेरा


नीड़ की रक्षा में व्याकुल

 आए ना कोई लुटेरा

 

रोज के चुग्गे की  चिन्ता

कब होगा सुख का सवेरा


***

【चित्र~गूगल से साभार】

मंगलवार, 17 नवंबर 2020

"राग-द्वेष"

                          

【 चित्र-गूगल से साभार 】


अनुबंध है प्रेम..

प्राण से प्राण के मध्य

ब्रह्माण्ड सा असीमित

बंधनमुक्त

मगर फिर भी..

बंधनों में ही पल्लवित

असंख्य परिभाषाओं से 

अंलकृत..

मगर समय के साथ 

लुप्त प्रजाति की

वस्तु जैसा हो गया है

असीम प्रगाढ़ता

 ही है गहरी कड़वाहट 

की नींव...

किसी राह चलते

 अजनबी को

प्यार और ईर्ष्या

की नज़र से देखना

मुमकिन नहीं

नामुमकिन सा है 


***

शनिवार, 14 नवंबर 2020

"हाइकु"

                               

【गूगल से साभार】

☀️

दिवाली पर्व~

हरे गहन तम

मृतिका दीप ।

☀️

अमा की रात~

जगमग करती

तम मे दीप्ति ।

☀️

कोरोना काल~

दीपक महोत्सव

सादगीपूर्ण ।

☀️

🙏दीपावली महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ 🙏       



शनिवार, 7 नवंबर 2020

"संवेदनाएँ"

                          

 नये अर्थ दे कर

दर्द...

जिंदगी को मांजता है

अंधेरों से डर कर

भागती जिंदगी की

अंगुली थाम..

ला खड़ा करता है

धूप-छाँव की 

आँख-मिचौली के

आँगन में...

वक्त के साथ

जड़ पड़ी

संवेदनाओं का कोई 

मोल नहीं होता

बस...

नीम बेहोशी में

अनीस्थिसिया सूंघे 

मरीज सी…

अभिव्यक्ति के 

नाम पर बेबस सी 

कसमसाती 

महसूस तो होती हैं

अभिव्यक्त ही

नहीं होती


***

रविवार, 1 नवंबर 2020

"उम्र भर की तलाश"

                              

उम्र भर की तलाश

अपना घर..

कितनी बार कहा-

ओ पागल!

यह तेरा अपना ही घर है

हक जताना तो सीख

समझती कहाँ है

समझ का दायरा बढ़ा

तभी से..

दादा का घर..नाना का घर..

उनकी जगह

पापा और मामा ने  ली

ब्याह के बाद

श्वसुर और पति ने..

अपना तो कभी 

कुछ हुआ नहीं

पहली बार जब उसने

 लाड़ से कहा-

यह तेरा अपना घर..

तेरी मेहनत का फल

 तब से किंकर्तव्यविमूढ़

 सी खड़ी है

अधिकार जताने की

किताब कभी पढ़ी नहीं

और न ही मिली कभी सीख 

बस एक जिद्द थी

मेरा क्यों नहीं..

पीढिय़ों से लड़ रही है

निजता की खातिर

आज यहाँ.. कल वहाँ

और अब..

अधिकार भाव

के शस्त्र को उसने

स्वेच्छा से रख दिया

एक कोने में...

गाड़िया लुहारों की मानिंद

***







सोमवार, 26 अक्तूबर 2020

"ज्योत्सना का रात पर पहरा लगा सा है"

                               

ज्योत्सना का रात पर , पहरा लगा सा है ।

आसमां का रंग भी , उजला-उजला सा है ।।


पत्तियों  में खेलता ,एक शिउली का फूल ।

डालियों के कान में ,कुछ कह रहा सा है ।।


हट गया  मुखौटा ,जो पहने हुए थे वो ।

तब से मन अपना भी ,कुछ भरा-भरा सा है ।।


दर्द बढ़ जाए जब ,सीमाओं से परे ।

लगता यही कि वक्त ,फिर ठहरा हुआ सा है ।।


हो थमी जिसके हाथों ,अपने समय की डोर ।

आने वाला उसी का कल ,खुशनुमा सा है ।।


***

रविवार, 18 अक्तूबर 2020

"क्षणिकाएं"


जागती आँखों ने

देखे हैं चंद ख्वाब

असामान्य सी 

सामान्य परिस्थितियों में

और मन उनको 

सहेजने की 

जुगत में लगा है

✴️

जिस मोड़ पर

तुम्हें  छोड़ा था

मेरे मुड़ने के बाद भी

जिद्द में...

तुम आज भी वहीं खड़े हो

चलो …

जो भी हुआ अच्छा हुआ

सार्थक हुआ अपना यूं 

बिछड़ना भी...

मुझे हराने की चाह ने

तुम्हे पर्वत बना दिया

और मुझे … 

बहता दरिया

✴️

खुद में खो कर 

खुद के करीब रहना 

अक्सर...

सुकून ही देता है

 सुना है बाहर

अंधेरों की दुनियां 

उजालों पर भारी हैं

✴️✴️✴️

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

"साथी"

                  


जीवन नहीं मधुमास साथी ।  

कठिन बहुत अभ्यास साथी ।।


सुख-दुख  दोनों जीवन पहलू ।

अब तक का इतिहास साथी ।।


छम-छम बरसें बूंदें घन से ।

मन में फिर भी प्यास साथी ।।


होती नहीं हर चाहत पूरी ।

मत बन इनका दास साथी ।।


गांव बसा यादों का मन में ।

उसमें अपना वास साथी ।।


***

【 चित्र - गूगल से साभार 】



एक बार तरही ग़ज़ल के बारे में पढ़ते हुए राहत इन्दौरी जी की कलम से निसृत - तू शब्दों का दास रे जोगी..पढ़ी जो बाद में -जोग कठिन अभ्यास रे जोगी..में ढलती चली गई . एक अकिंचन प्रयास मेरी ओर से ।

      

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

"जी चाहता है"

जी चाहता है...

अपनी तूलिका में

लेकर सातों रंग 

रंग दूं कोरे कैनवास

भर दूं..

शब्दों की गागर से

भावशून्य सागर

खोज लूं..

सृष्टि- रहस्य 

हो जाऊँ…

अपरिचित से परिचित

निर्बल से सबल

मगर..

जानती हूँ 

मैं भी इतना

आसान कहाँ ..

लक्ष्य भेदना

अर्जुन नहीं 

मैं ...

कर्ण जैसा कुशल धनुर्धर 

बनना चाहती हूँ

अपनी राह में आए कंटक

बस...

खुद हटाना चाहती हूँ

***

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

"क्षणिकाएं"

✴️

अनकही व्यथा मन में दबाये

धूसर मेघ …

बिना नागा चले आते हैं

सांझ की अगवानी में

और न जाने क्यों...

ढुलक जाते हैं अश्रु बूँद से

धरा के आँचल में..

✴️

खड़ी रहने दो

अपरिचय की दीवार

कुछ भरम..

मुस्कुराहटों में सजे 

बड़े भले लगते हैं

✴️

राख के तले

दब सोयी है चिंगारी

अपने आप में 

सुलगती सी..

मत मारो फूंक !

सुनते  हैं..एक फूंक से

वह दावानल भी

बन जाया करती है

✴️✴️✴️

सोमवार, 28 सितंबर 2020

"सीख"

अन्तर्मन से एक

 आवाज़ आई

कुछ कहना है...

चुप !!

विवेक ने तुरन्त 

कस दी नकेल

और...

 दे डाली एक सीख

जब प्रकृति ने 

संरचना में दिये

सुनने को दो कान..

देखने को दो आँख…

और

बोलने को एक जीभ 

तो कुछ तो देख 

समझ के सीख

 सत्य वचन..

दाँतों की लाडली

यह तो..

बोल कर निकल लेती है

चंचल जो ठहरी

और..उसके बाद बेचारा मन

 झेलता है..

झाड़ू की सींक से

बातों के चाबुक

जो पड़ते दिखते तो नही

बस..

अपने निशां छोड़ जाते हैं

---

 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

'मुक्तक"

चले जब हाथ थामे फिर संग छोड़ना क्यों है ।

मिले कैसी भी दुश्वारी अब मुँह मोड़ना क्यों हैं ।।

बने जन्मों के साथी हैं  सब सुख-दुख में साझी ।

इरादे नेक  हैं अपने तो  बंधन तोड़ना क्यों है ।।


यादों की गलियों में मैं  बचपन को ढूंढती हूँ ।

पल-पल घटते जीवन में अमन को ढूंढती हूँ ।।

मेघों को देख  दृगों में उतर आती है करूणा ।

इन्द्रधनुषी सुमनों से खिले उपवन को ढूंढती हूँ ।।


थोड़ा भरोसा है खुद पर बहुत ज्यादा नही है ।

सीमित रहेगी सदा वह  यह भी तो वादा नहीं है ।।

न तो मोह की सीमा न चाहतों पर बंधन ।

रुक जाए गंतव्य से पहले धारा का इरादा नहीं है ।।


 🍁🍁🍁🍁


मंगलवार, 22 सितंबर 2020

"मन की वीथियां"

ब्रह्मपुत्र का सिन्दूरी जल

और..

भोर की पहली किरण 

पुल से गुजरते हुए

 एक तैल चित्र सा दृश्य

अक्सर दृग पटल पर

उभर आता है

निरभ्र गगन के कैनवास पर

 इन्द्रधनुष सा...

कुछ नाविक जाल लिए

कुछ मछली के ढेर लिए

घर से आते या घर जाते

ना जाने कौन से

 सम्मोहन में बंधे ..

 हिमालय श्रृंखला की गोद में

 बसे इस अँचल में

एक बार का गया कोई

वापस अपने देस नहीं लौटता..

भूला-भटका यदि कोई

लौट भी आता  है तो...

 मेरी तरह स्मृति के गलियारों में

भटकता फिरता है

कामरूप के 

काले जादू में बंधा

उस नाव और नाविक सा..

"जा रहा है कि आ रहा है" के

 भंवर जाल का बोध कराता

जिसमें...

उलझ कर रह जाता है मन

दृष्टिभ्रम सदृश .. 


***

 

बुधवार, 16 सितंबर 2020

"चिंतन"

                          
आत्म दर्शन के लिए
समय कहाँ है हमारे पास
बाहरी आवरण को ही
जाँच-परख कर
ऐंठे फिरते हैं गुरूर में
देख भाल के अभाव में 
अन्तर्मन रहता है 
सदा ही उपेक्षित 
देह के एक कोने में
मासूम बच्चे सा
उठाता है सिर कई बार
जोर लगा कर 
तो व्यस्त भाव से 
पूरी श्रद्धा और हक  से 
दबा देते हैं 
उसकी आवाज़
जैसे..
घर आए मेहमान के 
आतेथ्य भाव में मगन हम
अपने ही घर में
अपने ही बालक को 
भूखा सोने को मजबूर करते हैं

***