Followers

Copyright

Copyright © 2020 "मंथन"(https://shubhrvastravita.blogspot.in/) .All rights reserved.

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

"आह्वान"

चाँद -सितारे करते बातें ,
रात भी बहुत उदास है ।
थका हुआ मन बैठ ये सोचे ,
कितनी निकृष्ट बात है ।।

ऐसी भी क्या भूख ,
कि कुछ भी खा गया कोई ।
किसी एक की मूर्खता पर ,
सम्पूर्ण मनु सृष्टि रोई ।।

अपने मद में डूबा ,
बन गया कोई रक्तबीज ।
बिखरी है पूरी दुनिया में ,
उसके अहंकार की छींट ।।

उस रक्तबीज की बूंदें अब ,
लील रही हैं जिन्दगियाँ ।
राह नजर आती नहीं ,
विषम हो गई परिस्थितियाँ ।।

नवरात्रि पर्व के दिन है ,
तेरा आह्वान करते हैं ।
सिंहवाहिनी ,कष्टहारिणी !
वन्दन बारम्बार करते हैं ।।

तेरे क्षुद्र जीव हैं हम सब ,
माँ हम पर उपकार करो ।
छाये हैं संकट के बादल ,
रक्षा करो माँ कष्ट हरो ।।

★★★★ 

सोमवार, 23 मार्च 2020

"मानवता"

पूरे दिन की नीरवता
और गोधूलि से पूर्व
मंदिरों की सांध्य आरती सी
घंटे ,शंख और थाली की 
गूंज….,
बालकॉनी रुपी आंगन और छत से
झांकते चेहरे हाथों में थामें
प्लेटेंं-चम्मच
और बजाते तालियां
अचानक ऊँची ऊँची इमारतें
बन गई गंगा घाट..
जहाँ सांध्य आरती में
आध्यात्म और भौतिक जगत
बिना किसी किन्तु- परन्तु
हो जाते हैं एकाकार
जल और गुड़ की तरह
विपदा की घड़ी में
कृतज्ञता ज्ञापित करते
सेवाभावियों के लिए
असीम सर्वोच्च शक्ति के लिए
जिसके हाथों में बंधी है
सृष्टि की…
समस्त जीवात्मा की डोर
और जिसके बल पर...
सिर ऊँचा किये खड़ी है
मानवता…

                              ★★★★★

मंगलवार, 17 मार्च 2020

"अधिकार"

छवि को देख गुंजन को यकीन नहीं हुआ कि यह   वही छवि है जिसकी चंचलता और शरारतों से उन पाँच सखियों की मंडली गुलजार हो जाया करता थी । अगर एक दिन वह न आती तो दूसरे दिन उसकी जम कर क्लास लगती कि कल वह कहाँ थी ? कॉलेज से बी.ए.करने के बाद वह अपने पिताजी के ट्रांसफर के साथ ही परिवार सहित भोपाल शिफ्ट हो गई । उदयपुर में सभी से फोन सम्पर्क कुछ समय रहा लेकिन धीरे-धीरे सभी घर-गृहस्थी में रम गई । अल्हड़पन की जगह परिपक्वता सभी में आ गई थी । परिपक्वता का संबंध शायद बचपन के मैत्रीपूर्ण संबंधों से दूरी और खुद की गृहस्थी में रम जाने से है बाकी विचारों की परिपक्वता को समझ पाना हर किसी के बस की बात कहाँ होती है ?
 बरसों बाद अचानक मॉल में छवि गुंजन को देख कर पहचान नहीं पाई...कितना बदल गई थी वह..चेहरे पर हरदम रहने वाली मुस्कुराहट का स्थान उदासी और गंभीरता ने ले लिया था । पुणे में चार साल से रहती छवि को पहली बार पता चला कि उसकी प्रिय सखी की ससुराल यहीं पर है । आपस में पता और  फोन नंबर ले और फिर से मिलने का वचन लेकर उन्होंने विदा ली । मिलने का मौका भी बहुत जल्दी ही मिला..एक दिन गुंजन का फोन आया कि पति व घर के सभी सदस्य शादी में गए हैं वह अस्वस्थ होने के कारण घर पर ही है क्या वो उससे मिलने आ सकती है ? मोहित स्कूल से घर आ चुका था अतः ना का तो सवाल ही नहीं था , पति को फोन पर जाने की सूचना देकर  छवि के घर जाने के लिए दोनोंं माँ -बेटा ऑटो स्टैंड की ओर बढ़ गए ।
 घर पर छवि और उसकी बिटिया थीं । जो माँ के निर्देशानुसार मोहित को स्टडीरूम में ले गई । उसे याद आया उनके ग्रुप में छवि की सगाई बी.ए. फाइनल कम्पलीट होने से पहले ही हो गई थी , अक्सर वे सभी उसको कितना छेड़ा करती थी और दूध सी उजली छवि उनके हँसी-मजाक के चलते गुलाबी हो जाया करती थी । मगर अब वो छवि कहाँ थी...ये छवि तो अलग ही है मानों मूर्ति खड़ी हो  सामने । बस एक ही अन्तर था वह सजीव थी । बहुत पूछने की जरूरत ही नही पड़ी..बच्चों के हटते ही वह उसके कंधे पर सिर रख कर रो पड़ी । कुछ देर बाद सहज होने पर उसने बताया--- परम्पराओं में बंधे ससुराल में सब कुछ होने के साथ-साथ अपनी वर्जनाएं भी हैं । साधारण व्यक्तित्व के मालिक पतिदेव को उसका चंचल स्वभाव पसंद नहीं था , उसकी खिलखिला कर हँसने की आदत उनकी नजर में फूहड़ता थी तो सबसे घुलमिल कर बात करने का स्वभाव निहायत ही मूर्खतापूर्ण हरकत । मायके में सब की चहेती खूबसूरत सी छवि का सजना - संवरना भी उन्हें पसंद नहीं... अपने आपको भूल कर  पति के साँचे में ढलने के प्रयास में चंचल निर्झर से स्वभाव वाली छवि संगमरमरी प्रतिमा ही तो लग रही थी । अचानक गुंजन के रूप में अतीत को सामने देख वह अपने पर से नियंत्रण खो बैठी और व्यथा आँखों से बह निकली ।
मोहित और अनन्या के वापस आ जाने से दोनोंं की बातों
का सिलसिला वहीं थम गया और बातों का केन्द्र बिन्दु बच्चे
बन गए । अनन्या प्यारी सी बच्ची थी जो सेवन्थ स्टैंडर्ड में पढ़ रही थी । अपने घर के वातावरण के अनुसार बच्ची भी गंभीर स्वभाव की थी । सांझ होने से पहले फिर से मिलने का वादा ले और खुद का ख्याल रखने की हिदायत दे वह मोहित के साथ घर लौट आई ।
रात में सोने से पहले बच्चे ने होमवर्क पूरा किया कि नहीं  , यह जानने के लिए वह मोहित का बैग चेक कर रही थी तभी मोहित ने आज जो कुछ नया देखा और सीखा उसके लिए जिज्ञासु स्वभाव के अनुरूप प्रश्न पूछा  -- मम्मी मूल अधिकार -- समानता ... स्वतंत्रता .. और...और…,अनन्या दीदी पढ़ रही थी बुक में..बताओ ना क्या... और क्या होता है ? मैं तो भूल भी गया..,.गुंजन सोच रही थी --- "अधिकारों - कर्तव्यों की शिक्षा की पौध छोटी कक्षाओं से आरम्भ होकर 
 शिक्षा के उच्चतम स्तर तक पहुँचती हुई  वटवृक्ष सी बनती है…. मगर किताबों के पन्नों से व्यवहारिकता के धरातल पर उन्हें पाने के लिए कितने सागर..पर्वत और मरूस्थल
लांघने पड़ते हैं । महिलाओं के लिए नंगे पैरों का यह सफ़र कठिन ही नहीं दुसाध्य भी है । कितनी हैं ऐसी जो यह सफ़र तय कर लेती हैं और कितनी ही बीच राह ...हौसला छोड़
देती हैं ।" 
कंधे को हिलाता मोहित अपनी माँ की तंद्रा भंग करने की कोशिश कर रहा था ।

★★★★★

बुधवार, 11 मार्च 2020

"हाइकु"

हिमानी पथ~
सैनिकों की टुकड़ी
कतारबद्ध ।

ऊषा लालिमा~
ब्रह्मपुत्र में जाल
डालता मांझी ।

कानन पथ~
अहेरी के कंधे पे
अन्न व जाल ।

गोधूलि बेला~
निज नीड़ लौटता 
गौरेया जोड़ा

शुभ्र गगन ~
परवाजे भरता
श्वेत कपोत ।

सागर तट~
बचपन की यादें
सीप में मोती  ।

श्रावण मास~
निशिथ में गूंजता
दादुर स्वर ।

★★★★★

शुक्रवार, 6 मार्च 2020

"घर-आंगन"

मेरे घर का आंगन ,भूरी सैकत वाला ।
वर्षा की बूँदों संग ,सौंधी खुशबू वाला ।।

गीली मिट्टी के ढेरी ,चल  घर बनाते हैं ।         
ये तेरी है वो मेरी ,कुछ फूल उगाते हैं ।।

आंगन का हिस्सा मेरा ,वो बगिया वाला तेरा ।
आंगन में नीम लगेगा ,डाली पर झूला होगा ।।

सर्दी वाले मौसम में ,हम सब धूप सेकते थे ।
सारे मिल के आपस में ,बस कुछ भी खेलते थे ।।

तारों की छांव तले ,जाने कितने किस्से ।
भूली वो सब बातें ,बचपन की सौगातें ।।

बहुमंजिल बनी इमारत ,बोनसई सी दिखती है ।।
घर-आंगन वाली बात ,अब सपने सी लगती हैं ।

★★★★★







मंगलवार, 3 मार्च 2020

"व्यथा"


मैं अपने बहुत करीब हूँ ,
या फिर खुद से दूर हूँ ।
व्यथित हूँ मन से बहुत ,
चुप रहने को मजबूर हूँ ।।

अर्पित कर दिया तुझे ,
स्व भी स्वाभिमान भी ।
रिक्त मन के कोष मेरे ,
मांगे उर्जित प्राण भी ।।

शब्द भी नाराज मुझसे ,
पहले सी रवानी मांगें ।
निश्छल सरल हृदय से ,
नेह पगी निशानी मांगें ।।

तिमिर में डूबे जहां को ,
रोशनी की आस है ।
स्वाति नक्षत्र  बूंद की ज्यों ,
चातक को प्यास है ।।

★★★★★

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

"लहरें"

पूर्णिमा की रात
सागर का क्रोध
 पूरे चरम पर था
और...
लहरों की चंचलता
सीमाओं से बाहर...
वह बाँधना चाहता था
लहरों को … 
मगर अनियन्त्रित लहरें
कहाँ और कब.. 
किसी की सुनती हैं
अपनी ही मौज में रहती हैं 
जब होना चाहती हैं  निर्बन्ध
 तो करती हुई वर्जनाओं को
दर किनार….
बस आ ही जाती है 
इस पार ...।

★★★★★

मंगलवार, 18 फ़रवरी 2020

"लकीरें"

मत बनाओ
लकीरों के दायरे
जानते तो हो…
लीक पर चलना
हर किसी को 
कब और कहाँ आता है
सीधी लकीरें भी
कहाँ बन पाती हैं
 इन्सान से…
लकीर खींचने का प्रयास
तो सदा सीधी का होता है
मगर रुप अक्सर 
वर्तुल ही बनता है
स्वतंत्रता कई बार
परतंत्रता बन जाती है
खुद की खातिर …
समझाइश के लिए
शब्दों का जाल भी
लगभग लकीरों सरीखा
ही लगता है और जाल…
उनमें कैद व्यक्तित्व
निखरते कब हैं ?
बस जड़ हो जाते है

★★★★★

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

"हाइकु"

सरसों फूल
तितली पंख पर
पराग कण

शीत पूर्वाह्न
पुष्प मकरंद पे
भ्रमर दल

ऊषा लालिमा
अधखिला कमल 
तड़ाग मध्य

चाँदनी रात 
धरा पर बिखरे 
हरसिंगार 

ऊषा लालिमा
वैद्य की पोटली में 
ढाक प्रसून


★★★★★

सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

"गंगा"

स्कूल से आते समय एक दिन गली में दो  गोल -मटोल  अपरिचित बच्चों को खेलते देख कर सोचा कि पड़ोस में किसी की रिश्तेदारी में‎ कोई परिवार आया होगा जिनके 
साथ ये बच्चे हैं । बच्चे सभी मासूम होते हैं मगर उन के
चेहरे पर एक अलग सी आत्मीयता भरी मुस्कान थी जो बरबस मन को छू गई । रात को खाना खाने के बाद
छत पर टहलने गई तो गली में सामने वाली खण्डहरनुमा हवेली के आंगन में रोशनी दिखाई दी ।  बरसों पुरानी हवेलियाँ कस्बों में देखभाल के अभाव में खण्डहरों में
तब्दील हो जाती हैं जिनको कभी इनके मालिकों ने बड़े अरमानों से बनवाया होगा । दूर-दराज क्षेत्रों से व्यापार
में धन कमा कर  यहाँ के निवासियों ने अपने लोगों के बीच रुतबे का प्रदर्शन करने का शायद यही तरीका अपनाया
हुआ था क्योंकि रहने के लिए तो वे इनमें कभी कभार और न के बराबर ही आते थे । आजीविका और व्यवसायिक निर्भरता के कारण  इन हवेलियों के वंशजों का झुकाव भी शहरों की ओर ही रहा । धीरे-धीरे वे घर लौटने का रास्ता शायद भूलते चले गए। परिणाम स्वरूप समय के साथ ये शानदार हवेलियाँ रख - रखाव के अभाव में वीरान और 
खंडहर होती गई । कभी-कभार ही कोई भटका मुसाफिर मोह में बँध कर लौटता है तो हैरानी ही होती है। कुछ देर
घूमने के बाद छत से नीचे‎ उतर कर मैंने अम्मा‎ से पूछा -- "अम्मा सामने की हवेली में कौन आया है । " 'गंगा आई है अपने दो बच्चों के साथ । पति नशा करता है  कभी काम करता है कभी नही करता इसलिए ये  किसी के यहाँ खाना बनाने काम करती है उन्हीं लोगों ने हवेली का एक कमरा
खुलवा दिया है ।'  एक दिन गली में दिखी वह  अपने बच्चों‎ के साथ । बच्चों के जैसी ही उजली वैसी ही निश्च्छल और जीवन से भरपूर आत्मीय मुस्कुराहट   के साथ । उसकी
और उसके बच्चों की मुस्कुराहट  को मैं नज़रअन्दाज नही कर पाई और पूछ बैठी --
“ गंगा आप कहाँ से ---  वाक्य पूरा होने से पहले
 ही खनकती आवाज़‎ कानों में गूंजी ---- दीदी 
पहाड़ से ।” घर में घुसते स्मित मुस्कान के साथ मैं सोच
रही थी - गंगा  पहाड़ से …., वास्तव में गंगा हिमालय‎ में अपने उद्गम गंगोत्री से निकल कर 
निचले मैदानी भूभागों में उतरती है  और यह गंगा 
भी उत्तरांचल से है अभावों में भी हँसती मुस्कुराती गंगा शादी-ब्याह के दिनों में अधिक व्यस्त हो जाती और उसके मासूम और समझदार बच्चे हवेली के चबूतरे पर बैठे माँ की राह तकते। कई बार वहाँ‎ से निकलते उनकी प्रतीक्षा ‎रत उदास‎ आँखें‎ देखती तो कभी माँ के साथ खिलखिलाने की खनक सुनती । रोज के आने-जाने के रास्ते में वह हवेली 
होने के कारण  मेरा उनसे एक अलग सा रिश्ता हो गया था …. मुस्कुराहट भरा  । गंगा को देख कर कई बार सोचती कि निश्च्छलता और सौम्यता की  यह अनुकृति कहाँ आ पहुँची पहाड़ों का सरल जीवन छोड़ कर । पति के साथ छोटे से प्रकृति के गोद में बसे गाँव को छोड़ते हुए कितने सपने होंगे इसकी आँखों में । और कल्पना कर बैठती गंगोत्री से
निकल कर कल कल करती इठलाती गुनगुनाती 
हरिद्वार से मैदानी इलाकों में प्रवेश करती गंगा नदी
की...., जो वहाँ से निचले भूभागों में आ कर अपना
आरम्भिक स्वरूप खो देती है ।
एक दिन बच्चों की अंगुली थामे गंगा मेरे सामने आ
खड़ी हुई-
"दीदी मैं जा रही हूँ‎।”  कहाँ ? मैंने पूछा‎ ।
 “पहाड़ पर दीदी ! वहाँ अपने लोग हैं बच्चों का
 ख्याल रखने को । मजदूरी ही करनी है ना .. तो‎
वहीं कर लूंगी इनको पढ़ाना लिखाना जरूरी  है ना….,मोटा खा-पहन कर काम चला लेंगे । यहाँ
 सब कुछ महंगा …,  दम घुटता है यहाँ ।” 
 मैंने बोझिल मन से विदा दी उसे । एक अनजाना सा 
मोह का धागा उससे और उसके बच्चों से जो जुड़ गया था मेरा । तभी अन्दर से अम्मा‎ की आवाज आई- “कौन है?" 
 --  "गंगा है अम्मा‎ , विदा लेने आई थी ।”  
 -- कहाँ जा रही है ? बाहर निकलते  हुए उन्होंने पूछा।
-- वापस पहाड़ पर अम्मा‎ ! 
--क्यों ….?
--यहाँ उसका अस्तित्व खो रहा है अम्मा । मैंने उदास सा जवाब दिया ।

★★★★★                   

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

"सायली छन्द"


कुहूक
कोयल की
गूंजी प्रभाती सी
सूर्योदय के
संग...

नेह
डोर बंधन
सांसों में घुल
हिय बीच
बसा..

अनचीन्हे 
संदली ख्वाब
सीप में मोती
जैसे पनपते
प्रतिपल...

अचल
पाषाण फोड़
वह बह निकली
करने मैदान
उर्वर….

★★★

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

"संदूक"

बहुत दिनों के बाद आज समय मिला है ..आलमारी
ठीक करने का । कितनी ही अनर्गल चीजें रख
देती हूँ इसमें और फिर साफ करते करते सलीके से  ना
जाने कितना समय लग जाता है । कितनी स्मृतियाँ
जुड़ी होती है हर चीज के साथ ..और मन है कि डूबता
चला जाता है उन गलियारों में और जब काम
पूरा होता है तो सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो
जाते हैं । ऐसे समय में  अक्सर बचपन का
घर और माँ का करीने से जँचा कमरा
घूम जाता है नज़रों के आगे । इस आकर्षण का कारण
माँ के सलीकेदार होने की प्रंशसा का होना मुख्य है जो घर
के सदस्यों के अतिरिक्त रिश्तेदारों से भी सुनने को
मिलती थी । माँ के कमरे में दीवारों में बनी
आलमारियों में एक आलमारी पर सदा ताला
लगा देखती थी हमेशा और उसकी चाबी का
गुच्छा माँ की साड़ी के छोर से बंधा हुआ…,
अगर पल्लू के छोर पर नहीं तो
पक्का रसोईघर के सामान के बीच रखा ,जिसे वे
प्रायः भूल जाया करती थीं काम करते हुए । और
उसे ढूंढने का श्रेय मेरे हिस्से में सबसे अधिक आता
था । माँ जब भी आलमारी खोलती सूटकेसों के साथ
करीने से रखी पुरानी बेडशीट पर लोहे की प्रिटेंड
संदूक को जरूर अपलक निहारती दिखती और मैं उनके
गले में हाथ डाल कर झूलती हुई पूछती --'तुम्हारी
तिजोरी है माँ ?'  स्नेह में डूबा लरजती आवाज में
उनका जवाब होता -- हाँ.. तेरी नानी की भेंट है यह ।
और मैं उलझा देती उन्हें बहुत सारे प्रश्नों में..जिनकी
उलझन से बचने के लिए वे सदा ही मुझे-- जा
पढ़ाई कर.. कह कर चुप करा देती ।
  अपने घर में जब भी फुर्सत से आलमारियां ठीक
करती हूँ ...माँ की आलमारी और प्रिटेंड सा
संदूक याद आ जाता है ।
माँ का संदूक को सावधानी से रखना , करीने से
खोलना ,  कपडों की तहों में चिट्ठियाँ रखना ...कुछ
ननिहाल से मिली भेंटों को अपलक तांकना ; बालमन
को तो समझ नहीं आता था पर अब समझ आता
है ।  संदूक का छोर पकड़ती माँ मानो हाथ
पकड़ती थी अपनी माँ का .., उसमें रखे सामान को
सहेजती माँ का बालमन भी अपने बचपन के
गलियारों में विचरण करता था । उनके एकान्तिक
अहसासों की एकाग्रता को भंग करती कभी मैं  तो
कभी भाई -बहन उनको उनके बचपन से बड़प्पन के
संसार में ले आया करते थे--- "तुम 'लाइट हाउस' हो
हमारा … कहाँ जा रही हो माँ?" आज माँ
नहीं हैं.. मैं आलमारी ठीक करते करते मन से
माँ की तरह भटक रही हूँ यादों की उन विथियों
में … जहाँ माँ का संदूक  है ..और अब है भी या
नहीं पता नही...जिसमें ना जाने कितने अनकहे
अहसास बंद थे माँ के करीने से सजाये हुए .. उन्हीं
को याद करती मैं वापस लौट आती हूँ अपनी
आलमारी में बिखरे यादों के संदूक के पास ।

 ★★★★★

बुधवार, 29 जनवरी 2020

"मधुमास'

बासंती बयार का चलना
कानन बीच पलाश का खिलना
वनाग्नि से वसुन्धरा ने
ताम्र वितान सजाया
मधुमास धरा पे छाया….

आम्रवृक्ष बौरों से लद गए
मलयानिल से प्रकृति महके
सरसों के पीले फूलों पे
भ्रमर झुंड इठलाया
मधुमास धरा पे छाया….

अमराइयों में कोयल कुहुके
उपवन सज गए पुष्प गुच्छ से
चंग थाप से गूंजी गलियां
रंगोत्सव आया 
मधुमास धरा पे छाया….

★★★★★

रविवार, 26 जनवरी 2020

"हाइकु"


🇮🇳
शुभ्र गगन~
गूंजे जयहिंद से
धरा अखंड ।..

पुनीत पर्व~
जन गण मन में
भारतवर्ष ।..


सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँँ
एवं बधाई 🙏🙏 

सोमवार, 20 जनवरी 2020

"लघु कविताएं" (आज)

(1)

क्षितिज पर
उगी हैं काली घटाएं
लगता है …,
झूम के मेह बरसेगा 
लम्बी प्रतीक्षा के 
बाद वसुन्धरा भी
आज खिल उठेगी
नवेली दुल्हन सी 

 (2)

एक अर्से के बाद
 मिले हैं...
यादों की संदूकची से
आज ...
बेशकीमती लम्हें
निकलेंगें….,
उन अहसासों को
छूने के बाद ...
आँखों से मोती
छलकना..तो बनता है  

(3)

धूसर सांझ में
दिन भर के श्रम से
थक हार अपने
लाव लश्कर के साथ 
घर लौटता है किसान
जहाँ हुलसते बच्चे
प्रतीक्षा करते हैं
अपने स्वजनों की..
शहर हो या गांव
अपनों के नेह से 
आज को जीना
और ....
कल का इन्तजार
आसान हो जाता है

★★★★★