कुहूक
कोयल की
गूंजी प्रभाती सी
सूर्योदय के
संग...
नेह
डोर बंधन
सांसों में घुल
हिय बीच
बसा..
अनचीन्हे
संदली ख्वाब
सीप में मोती
जैसे पनपते
प्रतिपल...
अचल
पाषाण फोड़
वह बह निकली
करने मैदान
उर्वर….
★★★