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गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

"सायली छन्द"


कुहूक
कोयल की
गूंजी प्रभाती सी
सूर्योदय के
संग...

नेह
डोर बंधन
सांसों में घुल
हिय बीच
बसा..

अनचीन्हे 
संदली ख्वाब
सीप में मोती
जैसे पनपते
प्रतिपल...

अचल
पाषाण फोड़
वह बह निकली
करने मैदान
उर्वर….

★★★

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर मीना जी! सायली छंद का भाव पूर्ण सृजन ।

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  2. सुंदर,,,,, भावपूर्ण सृजन ,सादर नमन आपको

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत आभार कामिनी जी । सस्नेह वन्दे ।

      हटाएं
  3. अनचीन्हे
    संदली ख्वाब
    सीप में मोती
    जैसे पनपते
    प्रतिपल...बहुत खूब मीना जी

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी उत्साहवर्धित करती प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता मिली । बहुत बहुत आभार अलकनंदा जी । सादर वन्दे ।

      हटाएं
  4. लाजवाब सायली छन्द....
    वाह!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन हेतु हार्दिक आभार सुधा जी ।

      हटाएं
  5. वाह बहुत सुंदर आदरणीया मैम। सादर प्रणाम 🙏

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. स्वागत आँचल आपका🌹 सुन्दर सराहनीय प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार । सस्नेह...

      हटाएं
  6. नेह
    डोर बंधन
    सांसों में घुल
    हिय बीच
    बसा
    वाह !! भावों से भरा सुंदर सार्थक छंद !!!!

    जवाब देंहटाएं
  7. हृदयतल से हार्दिक आभार रेणु जी ! सस्नेह...

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"