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गुरुवार, 28 जनवरी 2021

"मन"

                       


अपने में खोया

कुछ जागा कुछ सोया

एकाकी मन

बंजारा बन...

ठौर अपना सा ढूँढे


अब जाए कहाँ

कहने को यहाँ

किसे समझे अपना

असमंजस में डूबा..

बावरा मन मुझसे पूछे


सांसारिक बंधन

नादान न समझे

अलबेला  मन

माया में उलझे


शावक सा भागे 

देखे ना आगे

रोकूँ इसको कैसे...

कोई राह नहीं सूझे


***

शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

"सागर की व्यथा"

                          

सागर तू आज कैसे है मौन ।

अंतस् भेद की गांठें खोल ।।

अचलता नहीं प्रकृति तेरी ।

चंचलता लहरों की चेरी ।।


सोने की थाली सा सूरज ।

तल की ओर सरकता है ।।

कुंकुम तेरे अंचल में घोल ।

देखो तो फिर दिन ढलता है ।।


चाँदी सा झिलमिल वस्त्र ओढ़ ।

रजनी पकड़े घूंघट का छोर ।।

कहीं विहग बोलते हैं मध्यम ।

कहीं मलय चले गाती सरगम ।।


छाया चहुंदिशि में मधुमास ।

ऐसे तुम हो क्यों उदास ।।

धीरे से उसने गर्जना की ।

मनु संतति की भर्त्सना की ।।


प्रकृति को समरस करता हूँ ।

बन मेघ धरा पर बहता हूँ ।।

सब जीवन मुझसे पाते हैं ।

और खारा मुझे बताते हैं ।।

 

***





शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

"ख़्वाहिश"

एक अहसास..

सर्द सी छुवन लिये

स्वेटर के रेशों को चीर

 समा गया रूह में

सिहरन सी भर कर

न्यूज़ में..

 अभी-अभी पढ़ा-

पहाड़ों पर बर्फ़ गिरी है

तभी मैं कहूँ ...

अंगुलियाँ और नाक

यूं सुन्न से क्यों है...

छत पर हवाओं में

घुली ठंडी धूप में 

नजर पसारी

 तो पाया

गेहूँ की बालियों पर

 भी आज…

बरफ की परत जमी है

और सरसों का

 मुख मंडल ज़र्द

मगर..

धुला-धुला सा है

लगता तो यहीं है

 इस बार के बसंत ने

दस्तक दे दी है

शीत के दरवाजे पर

अचानक ...

एक सूर्य किरण सी

हूक जागी मन में

एक ख़्वाहिश

कि...

कुदरत की 

बर्फ़ीली परतों सी

अंतस् में जमी परतें भी 

इस बार..

पिघल ही जायें

***


रविवार, 10 जनवरी 2021

"उलझन"

               

रेशम के धागों सा

मन उलझा

उलझन की गांठ पकड़

अपना बन 

सुलझा दे कोई..


जीवन  की हलचल में

उठती नित नई तरंगों में 

कभी हाथ पकड़ 

जीने की राह

दिखला दे  कोई...


सीलन से भरी 

मन की देहरी 

स्वर्णिम सूरज से

भर धूप की मुट्ठी

मन के आंगन में

बिखरा दे कोई...


***















रविवार, 3 जनवरी 2021

"हाइकु"


पेड़ों की शाखें ~

शुक वृन्द चोंच में 

अनार दाने ।

🔸

कानन पथ~

अहेरी के जाल में

मृग शावक ।

🔸

नदी का तट~

मांझी की झोपड़ी से

मछली गंध ।

🔸

पेड़ की डाल ~

गिलाई के पंजें में

मीठी निबौरी ।

🔸

सर्दी में वर्षा~

इलायची महकी

चाय प्याली में ।

🔸

भोर उजास~

आंगन में बिखरे

निहार कण ।

🔸

सर्दी की धूप~

छत मुंडेर पर

गोरैया जोड़ा ।

🔸

सागर तट~

लहरों को देखता

नव युगल ।

🔸

कानन पथ~

झरने के समीप

गज शावक ।

🔸

झील के पार  ~

पनपी शाखों पर

बैया कॉलोनी ।

🔸

शीत मध्याह्न~

लड़की के हाथों में

ऊन-सिलाई ।

                                  🔸

हिमस्खलन~

चट्टान की ओट में

पर्वतारोही ।

🔸

जल प्रपात~

पत्थर से फिसला

युवक पाँव ।

🔸

बर्फानी रात ~

सरहद की रक्षा

फौजी के हाथ ।


***