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रविवार, 25 अगस्त 2019

"पहाड़ों की एक सांझ"


पहाड़ों की एक सांझ
गीले गीले से बादल
मोती सी झरती बूँदें
खाली बोझिल सा मन

ऐसे में चाय की प्याली
मन को स्पन्दित करती
प्राणों में उर्जा भरती
चिन्तन को प्रेरित करती

पंचभूत की है प्रधानता
जड़ चेतन मे सारे
यूं ही भागे फिरते हैं हम
मोह-माया के मारे

 बूँद उठी सागर से
सागर में मिल जानी है
जीना जल की बूँद के जैसा
अपनी यही कहानी है

★★★★★




















शनिवार, 17 अगस्त 2019

"चोका"

( 1 )

पहाड़ों पर 
कई दिनों के बाद 
धूप खिली है 
ओक भर धूप पी 
तुहिन कण 
रूपा सा रूप लिए 
बिखर गए 
यत्र-तत्र सर्वत्र 
गिरि गोद में 
मोती से चमकते 
आकर्षित करते

( 2 )

उतर आया 
झील की सतह में 
पूनो का चाँद 
चन्द्रिका और तारे 
संग संग में 
जल के आंगन में 
दूर गगन
मन्त्रमुग्ध तकता
होता विस्मित
नीरव झील तट
मूक गवाह 
अनुपम दृश्य के 
वसुधा -नभ 
मोहित हो हँसते 
मैत्री वेला के 
मौन पहरेदार 
देवदार, चिनार 

★★★

बुधवार, 14 अगस्त 2019

"रक्षा बंधन"


बचपन से 
मेरे साथ में
हर काम में
हर बात में
मेरी फ़िक्र में
मेरे साथ रहना

भाई ! मुझे
इतना है कहना
मेरे लिए एक
काम करना
दिल में सहेज 
साथ  रखना 
बचपन की उन
यादों का गहना

बाँधू मैं तुझको
रेशम के धागे
मांगू  मैं मन्नत
रब के आगे
खुशियों भरा
हो संसार तेरा
आँचल के अपने
छोर से
मैने बाँध रखा
नेह तेरा

★★★★★
















शनिवार, 10 अगस्त 2019

"मंथन"


बहुत कोशिशों 
के बाद भी
अपने आप से
बेजारी है कि
जाने का नाम 
ही नही लेती..

कभी ये नही तो
कभी वो नही
ऐसा है तो
ऐसा क्यों है
यदि नही है तो
क्यों नहीं है..

ढेर सारे
किन्तु-परन्तु
और जवाब...
उलझनों का ढेर

लम्बी खामोशी 
उसके बाद
कुछ भी न कर
पाने की लाचारी
अपने आप में
रिक्तता भरती है

 कभी कभी
अपने आप पर
भरोसा करने की 
आदत किसी सैलाब
के आने पर
टूटी दीवार सी 
ढहती है

और फिर...
खुद को  
खुद ही
समझाता है 
..मन..
गुलाब की सी
बगीची है 
..जिन्दगी..
महक है…
खूबसूरती है..

और हैं ..
असंख्य काँटें 
हर इन्सान
अपने आप में
पूरा माली
कहाँ होता है..

पाने की कोशिश
करता है पूरा
... गुलाब..
और...
उलझ काँटों में
बस अपना 
चैन-सुकून ही
खोता है 

★★★★★

सोमवार, 5 अगस्त 2019

"सेदोका"

आस किरण
लिए अपनी आब
सुनहली आशाएँ
सजी दृगों में
बन के हसीं ख्वाब
जगाती नेह राग

मुस्कुराहट
छलकी अनायास 
सूर्य आभा के साथ
निर्विघ्न खुले
मन की देहरी के
सांकल चढ़े द्वार

मन का दीया
मन की देहरी पे
प्रज्वलित हो कर 
कितनी बार
जाकर जलता है
गत के उस पार

गुरुवार, 1 अगस्त 2019

"आह्वान"

साधारण कहलाना मंजूर नही
और असाधारण होना मांगता है
कठिन श्रम साध्य लक्ष्य साधना

चाहिए गर आसमान से पूरा चाँद
तो दोषारोपण करना गलत होगा
वक्त कब थमा किसी की खातिर
उसे पकड़़ने के लिए श्रम करना होगा

लकीरों को छोड़ नव जागरण ला
तू नहीं किसी से कम पहले स्वयं को समझा
छोड़ व्यर्थ प्रलाप , व्यर्थ रोना छोड़ दे 
दुनिया उसी की है जो वक्त की धारा मोड़ दे

पहन चोला कर्मयोग का खुद में परिवर्तन ला
कीमत अपनी खुद समझ फिर औरों को समझा

★★★★★