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शनिवार, 17 अगस्त 2019

"चोका"

( 1 )

पहाड़ों पर 
कई दिनों के बाद 
धूप खिली है 
ओक भर धूप पी 
तुहिन कण 
रूपा सा रूप लिए 
बिखर गए 
यत्र-तत्र सर्वत्र 
गिरि गोद में 
मोती से चमकते 
आकर्षित करते

( 2 )

उतर आया 
झील की सतह में 
पूनो का चाँद 
चन्द्रिका और तारे 
संग संग में 
जल के आंगन में 
दूर गगन
मन्त्रमुग्ध तकता
होता विस्मित
नीरव झील तट
मूक गवाह 
अनुपम दृश्य के 
वसुधा -नभ 
मोहित हो हँसते 
मैत्री वेला के 
मौन पहरेदार 
देवदार, चिनार 

★★★

16 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !बेहतरीन सृजन दी
    सादर

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  2. अद्भुत!! सुंदर शब्दों का चयन, सुंदर मन भावन उपमाएं,लघु विधा का सुंदरतम अलंकारी प्रयोग।
    अभिनव रचना मीना जी ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. उत्साहवर्धन के लिए तहे दिल से आभार कुसुम जी ।

      हटाएं
  3. सस्नेह आभार सुजाता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  4. पहाड़ों की धुप उतरती है झरनों के साथ मोती बन के फ़ैल जाती है सतह पर ... प्राकृति के इस नैसर्गिक रूप को इन सबदों की महक में उतार दिया ... सुन्दर दोनों भाव ...

    जवाब देंहटाएं
  5. उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार नासवा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  6. सुंदरता से मन के भावों को व्यक्त किया है...बहुत खूब

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद संजय जी ।

      हटाएं
  7. यत्र-तत्र सर्वत्र


    sach to he....har jghaan hi to ...ye rchnaaye jo door draaj bethe logon ko jodhti hain...yahaan wahaan har jghaa


    ache lekhn ke liye bdhaayi

    जवाब देंहटाएं
  8. वाह बेहद खूबसूरत प्रस्तुति

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  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  10. भावनाओं से भरा मनोरम चोका प्रिय मीना जी | मैं इन सब विधाओं से अनभिग्य हूँ |

    जवाब देंहटाएं

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“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"