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गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

“संकल्प”

शोर-शराबा और किसी भी तरह की तेज आवाज़ें झुंझलाहट भरी हलचल भर देते थे उसके मन में ।दीपावली और होली के त्यौहार तो उसे बहुत पसंद थे मगर पटाखों का शोर उसे कभी नहीं भाया ।

वह सोचती- “पटाखे बजाने से ही ख़ुशियों का प्रदर्शन क्यों होता है ?” पटाखों के शोर से और बाद के धुएँ से निकली गंध से उसे बहुत चिढ़ थी ।


 उसकी यह आदत छुड़वाने के लिए घर पर होली-दीवाली पर पटाखे आते तो उसके लिए फुलझड़ियाँ आया करती ।उसे याद है वह वक्त जब पहली बार दीपावली पर फुलझड़ी थामी थी उसने , उसे जलाने से पहले वह निश्चित कर लेना चाहती थी कि बजेगी तो नहीं।कांपती अँगुलियों के बीच फुलझड़ी की पहली चिंगारी को देखते ही डर के मारे उसने फुलझड़ी को नीचे गिरा दिया था । 


घर की तरह वह स्कूल में भी शांत बच्चों की श्रेणी में आती रही थी रिक्त कालांश में उसे शैतानी करने से अधिक कक्षा-कक्ष की खिड़की से बाहर के हरे-भरे लॉन ,मौसमी फूलों की क्यारियाँ , गिलहरियाँ और वहाँ मँडराते पक्षियों को देखना बहुत पसन्द था । 


समय और प्रकृति परिवर्तनशील हैं और उनके सहचर मनुष्य की प्रकृति भी । आज की वैश्विक हलचल को अनुभव कर वह सोचती है - 

   “इस संसार के मुट्ठी भर मानव अपने प्रभुत्व की लिप्सा में कितनी ही निर्दोष और मासूम ज़िन्दगियों को नष्ट करते हुए सदियों से विकसित और पल्लवित सभ्यताओं को नष्ट करने की बात सोच भी कैसे सकते हैं ।”


बारुद के धुएँ और धमाकों के बीच जीती ज़िंदगियों के बारे में सोचते हुए उसकी आत्मा सिहर उठती है ।लेकिन आज वह छोटी नही है ,बचपन की एकांत प्रिय और कोलाहल से बचने वाली लड़की अब परिपक्व स्त्री बन चुकी है ।उसने तय किया है कि -

“इस वर्ष दीपावली पर वह निराश्रितों के बीच जाकर फुलझड़ियाँ और मिठाई बांट कर उनकी मुस्कराहट में जीवन की सार्थकता ढूँढेगी और शायद, यही उसका एक छोटा-सा प्रयास होगा  जहाँ खुशियाँ धमाकों से नहीं, उजालों से पहचानी जाएँ।”

***


शनिवार, 2 मई 2020

"थमी सी जिन्दगी"

समाचार सुनते हुए एक दिन न्यूज चैनल पर देखा-- "कोई बीमारी है 
जो चीन के वुहान प्रान्त में फैल रही है ।" हॉस्पिटलों की अफरा-तफरी देख दुख हुआ और बीमारी का कारण "वैट मार्केट" है यह जान
कर क्षोभ भी कि क्या जरूरी है कुछ भी खाना ।ऐसे में ही एक दिन जाना कि इस बीमारी ने विश्व के अन्य देशों के साथ-साथ भारत में 
भी दस्तक दे दी है ।
मेरी घूमने की आदत है बचपन से ही .. पहले घर की
लम्बी-चौड़ी छत पर शाम को बहन-भाइयों के साथ खेलते-खिलाते और बाद में दिन भर के कामों से फुर्सत पा कर अपने साथ जुड़े रहने 
की खातिर कब आदत जीवन का अविभाज्य बन गई पता ही नहीं 
चला । "अपार्टमेंट कल्चर" से जुड़ने के बाद छत की जगह बालकनी 
ने ले ली और घूमने की जगह बिल्डिंग के "पाथ-वे" ने । मार्च की शुरुआत में एक दिन आदतानुसार घूमने जा रही थी तो उसने कहा - "मत जाओ ! जब तक महामारी पर नियन्त्रण ना हो । बीमार लोगों को अतिरिक्त सावधानी की जरूरत है ..तुम्हारे लिए हम भी अपने लिए अतिरिक्त सावधानी बरतेंगे क्योंकि हमें तुम्हारी जरुरत है ।" उसकी आधी नींद भरी आँखों में अपने लिये चिन्ता देख घूमने का विचार छोड़ दिया और वापस मुड़ गई अपने कमरे की ओर…पर्दे खींचते हुए नीचे की तरफ देखा.. लोग घूम रहे थे । मुझे लगा मेरी जिन्दगी थम सी गई है । हफ्ते भर बाद लॉकडाउन की घोषणा और दिन पर दिन कोरोना
के पूरे विश्व में बढ़ते प्रकोप के बारे में जान कर लगने लगा मेरी नहीं सबकी जिन्दगी थम सी गई  है ।             
  परिवार के सदस्यों से मिलने अक्सर मुम्बई जाना
होता है ...वहाँ कई बार सुना है - "मुम्बई की रफ्तार धीमी नहीं होती कभी ।"  सोचती हूँ थम गई है शहरों की रफ्तार और मुम्बई की भी । लम्बी-चौड़ी सड़कें सूनी ही दिखती हैं न्यूज़ चैनल्स में । बस... खाली और उद्विग्न मन दौड़ता रहता है थमी हुई जिन्दगी में । हर दिन न्यूज देखते या नेट पर पढ़ते हुए एक उम्मीद दामन कस कर थामे रहती 
है -  
कुछ ठीक हुआ.. कोई दवा सफल हुई..और फिर वही उम्मीद दिलासा देती है--कोई बात नहीं जो आज थमा है वो कल फिर से चलेगा और दौड़ेगा भी ...बस दिल की धड़कनें चलती रहनी चाहिए ।
और धड़कनों के चलते रहने के लिए एहतियात बरतना बहुत जरूरी है ।

                                            ***
     

शनिवार, 1 फ़रवरी 2020

"संदूक"

बहुत दिनों के बाद आज समय मिला है ..आलमारी
ठीक करने का । कितनी ही अनर्गल चीजें रख
देती हूँ इसमें और फिर साफ करते करते सलीके से  ना
जाने कितना समय लग जाता है । कितनी स्मृतियाँ
जुड़ी होती है हर चीज के साथ ..और मन है कि डूबता
चला जाता है उन गलियारों में और जब काम
पूरा होता है तो सूर्यदेव अस्ताचलगामी हो
जाते हैं । ऐसे समय में  अक्सर बचपन का
घर और माँ का करीने से जँचा कमरा
घूम जाता है नज़रों के आगे । इस आकर्षण का कारण
माँ के सलीकेदार होने की प्रंशसा का होना मुख्य है जो घर
के सदस्यों के अतिरिक्त रिश्तेदारों से भी सुनने को
मिलती थी । माँ के कमरे में दीवारों में बनी
आलमारियों में एक आलमारी पर सदा ताला
लगा देखती थी हमेशा और उसकी चाबी का
गुच्छा माँ की साड़ी के छोर से बंधा हुआ…,
अगर पल्लू के छोर पर नहीं तो
पक्का रसोईघर के सामान के बीच रखा ,जिसे वे
प्रायः भूल जाया करती थीं काम करते हुए । और
उसे ढूंढने का श्रेय मेरे हिस्से में सबसे अधिक आता
था । माँ जब भी आलमारी खोलती सूटकेसों के साथ
करीने से रखी पुरानी बेडशीट पर लोहे की प्रिटेंड
संदूक को जरूर अपलक निहारती दिखती और मैं उनके
गले में हाथ डाल कर झूलती हुई पूछती --'तुम्हारी
तिजोरी है माँ ?'  स्नेह में डूबा लरजती आवाज में
उनका जवाब होता -- हाँ.. तेरी नानी की भेंट है यह ।
और मैं उलझा देती उन्हें बहुत सारे प्रश्नों में..जिनकी
उलझन से बचने के लिए वे सदा ही मुझे-- जा
पढ़ाई कर.. कह कर चुप करा देती ।
  अपने घर में जब भी फुर्सत से आलमारियां ठीक
करती हूँ ...माँ की आलमारी और प्रिटेंड सा
संदूक याद आ जाता है ।
माँ का संदूक को सावधानी से रखना , करीने से
खोलना ,  कपडों की तहों में चिट्ठियाँ रखना ...कुछ
ननिहाल से मिली भेंटों को अपलक तांकना ; बालमन
को तो समझ नहीं आता था पर अब समझ आता
है ।  संदूक का छोर पकड़ती माँ मानो हाथ
पकड़ती थी अपनी माँ का .., उसमें रखे सामान को
सहेजती माँ का बालमन भी अपने बचपन के
गलियारों में विचरण करता था । उनके एकान्तिक
अहसासों की एकाग्रता को भंग करती कभी मैं  तो
कभी भाई -बहन उनको उनके बचपन से बड़प्पन के
संसार में ले आया करते थे--- "तुम 'लाइट हाउस' हो
हमारा … कहाँ जा रही हो माँ?" आज माँ
नहीं हैं.. मैं आलमारी ठीक करते करते मन से
माँ की तरह भटक रही हूँ यादों की उन विथियों
में … जहाँ माँ का संदूक  है ..और अब है भी या
नहीं पता नही...जिसमें ना जाने कितने अनकहे
अहसास बंद थे माँ के करीने से सजाये हुए .. उन्हीं
को याद करती मैं वापस लौट आती हूँ अपनी
आलमारी में बिखरे यादों के संदूक के पास ।

 ★★★★★

रविवार, 6 अक्टूबर 2019

"अलविदा"

अलविदा कहने का वक्त आ ही गया आखिर.. मेरे साथ रह तुम भी खामोशी के आदी हो गए थे । अक्सर हवा की सरसराहट तो कभी गाड़ियों के हॉर्न
कम से कम मेरे को अहसास करवा देते कि दिन की गतिविधियां चल रहीं हैं कहीं । 'वीक-एण्ड' पर मैं अपने मौन का आवरण उतार फेंकती तो तुम भी मेरी ही तरह व्यस्त और मुखर दिखते ।
चलने का समय करीब आ रहा है । सामान की पैकिंग हो रही है सब चीजें सम्हालते हुए मैं एक एक सामान  सहेज रही हूँ । महत्वपूर्ण सामान में तुम से अपने से जुड़ी सब यादें भी स्मृति-मंजूषा में करीने से सजा ली हैं । फुर्सत के पलों में जब मन करेगा यादों की गठरी खोल कर बैठ जाऊँगी.. गाड़िया लुहारों की सी आदत हो गई थी मेरी आज यहाँ तो कल वहाँ । जो आज बेगाना है वह कल अपना सा लगेगा..मुझे भी..तुम्हे
 भी ।  मेरी यायावरी समाप्त हो रही है । ईंट-पत्थरों के जंगल में ढेर सारी बहुमंजिली इमारतों के बीच 'मनी प्लांट' सा मेरा घर प्रतीक्षा कर रहा मेरी..मेरी स्मृतियों में तुम खास रहोगे… सदा सर्वदा..।।

★★★★★

सोमवार, 8 जुलाई 2019

"हम कदम"

(This photo has been taken from Google)

अनवरत भाग-दौड़ कभी खुद के पैरों पर खड़े होने की
जद्दोजहद तो कभी सब की अंगुली थाम कारवाँ के साथ
चलने की मशक्कत …, जीवन बीता जा रहा रहा था
गाड़िया लुहारों जैसा.. आज यहाँ-कल वहाँ ।  मेरे साथ
मेरे हम कदम बन भागते दौड़ते तुम ….., कब
Oasis की पहचान करना खुद सीख गए और कब उनकी
उपयोगिता मुझे सीखाते चले गए भान ही नही हुआ ।
कभी किसी उपन्यास में खुद को डुबोये एक ख्वाब देखा था इन्द्रधनुषी तितली सा ...जो कल्पित होते हुए भी मेरी आँखों
में जीवन्त था अपनी पूरी सम्पूर्णता के साथ…, उस ख्वाब
को मैं भूल गई थी किसी उपन्यास के बीच दबाये  
नोट की तरह । कभी फुर्सत के पलों में वह ख्वाब मैने
तुम से साझा किया था … आज वही पुराना उपन्यास तुमने
मेरी खुली हथेली पर रख दिया है…और इन्द्रधनुषी तितली
पंख फैलाये मेरी आँखों के सामने साकार है अपनी
पूरी जीवन्तता के साथ । थैंक्स...थैंक्स अ लॉट !!!
तुम्हारे नेह की मैं ऋणी रहूँगी युगों… युगों तक ।

**********



 

सोमवार, 10 जून 2019

"वीनस"

गर्मियों में खुली छत पर रात में सोने से पहले खुले साफ आसमान में ताकते हुए तारों की चमक को निहारना, आकाशगंगा की आकृति की कल्पना करना और ध्रुव तारे को देखना आदत सी रही है । इस आदत को पंख मिले "सौर परिवार" पाठ पढ़ने के
बाद । हर चमकते तारे को मन मुताबिक ग्रह मान लेना और आकाश गंगा के साथ
ब्लैक होल की काल्पनिक तस्वीर उस जगह बना लेना जहाँ तारे दिखाई ना दे …  प्रिय शगल था मेरा जिसमें कई बार ना चाहते हुए भी पूरा परिवार शामिल हो जाता ।
बचपन के साथ धीरे धीरे यह आदत भी पीछे रह गई लेकिन सर्दियों में फुर्सत के समय यह बचपन फिर लौट आया "वीनस" के साथ ….खाली समय में छत के आंगन की सीढ़ी पर बैठ शाम के धुंधलके में एक चमकते तारे में "शुक्र" ग्रह की कल्पना करना जिसे सब से सुन्दर ग्रह के रूप में जाना जाता है स्वभाव सा बन गया मेरा जो आज भी बरकरार है । मेरी कल्पना में शुक्र ग्रह का अक्स कुछ यूं उभरता है ––-

लो रात भर जाग कर ,
फिर थका भोर का तारा ।
दिन भर सोने दो…. ,
सांझ को फिर आएगा  ।
टिमटिम करता... ,
निज पथ पर  बढ़ता ।
कहीं है मन का वीनस ,
कहीं सांझ का तारा ।

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