Followers

Copyright

Copyright © 2020 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

बुधवार, 26 जून 2019

"कब तक"

खामोशी से सहना कब तक
बेमर्जी चुप रहना कब तक

निर्झर जैसी प्रकृति है तब
गैर पात्र मेंं ढलना कब तक

दोस्त लगे जब बेगाने से
हाथ पकड़ कर चलना कब तक

चातक जैसी  तृष्णा ले कर
बूंदों से घट भरना कब तक

बढ़ आगे हक अपना पा ले
छुईमुई सा बनना कब तक

********


सोमवार, 17 जून 2019

"चक्रव्यूह"

स्मृति के
गलियारों में
डूब कर मन
बस डूबता
चला जाता है

कभी रेशम की
उलझी सी
वीथियों में
तो कभी काँच की
किर्चों सी बिखरी
अंतहीन गलियों में

सारहीन
और व्यर्थ सी
बातों के
चक्रव्यूह
में मन
सिमट कर
रह जाता है

भ्रमित सा
चाहता है
भूलभुलैया
से निकलना
मगर चाह कर
भी निकल
नही पाता है
 xxxxx

शनिवार, 15 जून 2019

"क्षणिकाएँ"

कुछ यादें
फाउंटेन पेन से
कागज पर उकेरी
इबारत सी होती हैं
भीग भले ही जाए
मगर अपना अक्स
नही खोती  है

खुशी से लबरेज़
चंद अल्फाज़ और
खनकती आवाज
देते हैं गवाही
इस बात की.., कि
नेह के धागे
बड़े मजबूत हैं

अविरल प्रवाह
बहता खारापन
बना उसकी पहचान
अपने या बेगाने
कितने ही अश्रु
भरे उर में…,
सिन्धु रहा गतिमान
xxxxx

सोमवार, 10 जून 2019

"वीनस"

गर्मियों में खुली छत पर रात में सोने से पहले खुले साफ आसमान में ताकते हुए तारों की चमक को निहारना, आकाशगंगा की आकृति की कल्पना करना और ध्रुव तारे को देखना आदत सी रही है । इस आदत को पंख मिले "सौर परिवार" पाठ पढ़ने के
बाद । हर चमकते तारे को मन मुताबिक ग्रह मान लेना और आकाश गंगा के साथ
ब्लैक होल की काल्पनिक तस्वीर उस जगह बना लेना जहाँ तारे दिखाई ना दे …  प्रिय शगल था मेरा जिसमें कई बार ना चाहते हुए भी पूरा परिवार शामिल हो जाता ।
बचपन के साथ धीरे धीरे यह आदत भी पीछे रह गई लेकिन सर्दियों में फुर्सत के समय यह बचपन फिर लौट आया "वीनस" के साथ ….खाली समय में छत के आंगन की सीढ़ी पर बैठ शाम के धुंधलके में एक चमकते तारे में "शुक्र" ग्रह की कल्पना करना जिसे सब से सुन्दर ग्रह के रूप में जाना जाता है स्वभाव सा बन गया मेरा जो आज भी बरकरार है । मेरी कल्पना में शुक्र ग्रह का अक्स कुछ यूं उभरता है ––-

लो रात भर जाग कर ,
फिर थका भोर का तारा ।
दिन भर सोने दो…. ,
सांझ को फिर आएगा  ।
टिमटिम करता... ,
निज पथ पर  बढ़ता ।
कहीं है मन का वीनस ,
कहीं सांझ का तारा ।

***********                           

शनिवार, 8 जून 2019

"क्षणिकाएँँ"





(1)

 सांध्य आरती में,
जलती धूप सी ।
कुछ अनुभूत यादें,
जब भी आती हैं ।
मन के भूले-भटके,
छोर महकने लगते हैं ।

(2)

स्मृतियों का वितान
संकरा सा है...
जरा और खोल दो ।
यादों के जुगनू..
मन के बियाबान में
थोड़े और बढ़ गए हैं ।।
     
       ********



मंगलवार, 4 जून 2019

"एक कप चाय" (लघुकथा)

दिसम्बर की कोहरे में ठंड से कड़कड़ाती रात और दूर की रिश्तेदारी में विवाह । अचानक खबर आई कुछ लोग रात भर रुकेंगे उनके यहाँ.. बरसों बाद मिले सगे-सम्बन्धियों में जब बातें शुरू होती हैं तो थमती कहाँ हैं और समय ठंड का हो तो गर्म चाय के साथ गर्मजोशी से स्वागत करना तो बनता ही है।
               चाय बनाने की जिम्मेदारी उसकी थी और बातों के दौर के मध्य से  कुछ कुछ अन्तराल के बाद 'एक कप चाय' की फर्माइश आ ही रही थी अतः चट्टाई बिछा कर वह रसोईघर में ही बैठ गई । सभी तो अजनबी थे उसके लिए मगर वे परिचित थे तभी तो साधिकार नाम के साथ बिटिया के संबोधन के साथ 'एक कप चाय' की मांग हो रही थी । उन परिचितों के बीच एक जोड़ी अपरिचित आँखें भी थी जिनकी अपनत्व भरी आंच उसको कमरे में जाने से रोक कर रसोई से ही आवाज देने को विवश कर रही थी ।
                      भोर से पूर्व मंदिरों की आरती की घंटियों ने प्रभात-वेला होने की सूचना दी कि सभी जाने की तैयारी में लग गए । उसने कमरे की दहलीज पर पहुँच कर पूछा---'एक कप चाय और' ...स्नेहिल आशीर्वाद भरे ठंडे हाथ उसके ठंडे बालों पर स्वीकृति से टिके कि एक आवाज आई--' चलो एक कप चाय और …, हो ही जाए ।' सर्दियाँ हर साल आती हैं और उनके साथ कोहरा भी…, मंदिरों की आरती आज भी नियत समय पर होती है मगर घंटियों की आवाज के साथ उसके कानों में एक आवाज आज भी गूंजती है ---'चलो एक कप चाय और …, हो ही जाए ।'
आरती के समय पौ फटने से पूर्व उसके हाथ भाप उड़ाती चाय की प्याली को उठा कर होठों से लगा लेते हैं ..., दिमाग आज भी अतीत के गलियारों में घूम रहा है कुछ सोचते हुए ।

                    ***********