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बुधवार, 26 जून 2019

"कब तक"

खामोशी से सहना कब तक
बेमर्जी चुप रहना कब तक

निर्झर जैसी प्रकृति है तब
गैर पात्र मेंं ढलना कब तक

दोस्त लगे जब बेगाने से
हाथ पकड़ कर चलना कब तक

चातक जैसी  तृष्णा ले कर
बूंदों से घट भरना कब तक

बढ़ आगे हक अपना पा ले
छुईमुई सा बनना कब तक

********


14 टिप्‍पणियां:

  1. बड़कर आगे हक अपना पा ले
    छुई मुई सा बनना कब तक
    सुन्दर प्रेरित करती रचना

    जवाब देंहटाएं
  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २८ जून २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत बहुत आभार श्वेता जी ।

    जवाब देंहटाएं
  4. बढ़ आगे हक अपना पा ले
    छुईमुई सा बनना कब तक
    सुन्दर,रचना।

    जवाब देंहटाएं
  5. प्रिय मीना जी -- जीवन में ठहरे हुए कदमों को जड़ता से मुक्त हो अपने अधिकार के प्रति कर्मण्यता के लिए प्रेरित करती रचना के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ |

    जवाब देंहटाएं
  6. स्नेहयुक्त प्रतिक्रिया से रचना को सार्थकता मिली प्रिय रेणु जी !! आपकी अनमोल शब्द मन को आल्हादित कर गए । हार्दिक सस्नेह आभार ...

    जवाब देंहटाएं
  7. सच को अपने शब्दों में पिरो दिया है...

    जवाब देंहटाएं
  8. दोस्त लगे जब बेगाने से
    हाथ पकड़ कर चलना कब तक

    चातक जैसी तृष्णा ले कर
    बूंदों से घट भरना कब तक... वाह! आखिर में संकोच करते करते लिख ही देता हूँ कि मन की बातें उतार दी आपने अपने शब्दों में। आभार और बधाई!!!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अभिभूत हूँ आपकी प्रतिक्रिया पा कर , आपकी अनमोल प्रतिक्रिया से लेखन सफल हुआ ।

      हटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"