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गुरुवार, 24 फ़रवरी 2022

“तुम“


झरने सी हँसी फूलों की महक

पूजा की ऋचा लगती तुम ।


उदित  भानु की अरुणिमा

आंगन में पाखी कलरव तुम ।


पूर्णचन्द्र की पूर्ण ज्योत्सना 

इन्द्रधनुषी सुन्दरता तुम ।


उतुंग गिरि की उर्ध्व शिखा पर

हिम किरीट सी आभा तुम ।


मन प्राण बसी साँसें बन कर

सरगम की मधुर रागिनी तुम ।


***

[ चित्र :- गूगल से साभार ]

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2022

“सृजन”



ज्ञान घटे ठग चोर की सँगति मान घटे पर गेह के जाये ।

पाप घटे कछु पुन्य किये अरु रोग घटे कछु औषध खाये ।

प्रीति घटे कछु माँगन तें अरु नीर घटे रितु ग्रीषम के आये ।

नारि प्रसंग ते जोर घटे जम त्रास घटे हरि के गुन गाये


रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह छन्द पढ़ने का 

सुअवसर मिला इस छन्द को पढ़ने के बाद मेरी कलम ने 

इसी तर्ज पर कुछ यूं लिखा -


मित्र बढ़े ऐतबार संग और नेह सोच से सोच मिलाए ।

दर्प बढ़े ‘मैं‘ के बढ़ने संग वैर वाणी में कटुता आए ।

क्रोध बढ़े संयम खोने से उम्र योग से योग मिलाए ।

मान बढ़े सज्जन संगति से ज्ञान बुद्धि से लग्न लगाए ।


***

रविवार, 13 फ़रवरी 2022

“ऋतुराज बसंत”

 


आम की मंजरी पर बैठी

कोयल की कुहूक

 और गुलाबी ठंड में

किताबों के पन्नों के साथ 

चिंतन करता 

शुभ्रवस्त्राविता का

वंदन करता

ऋतु राज बसंत !


वह हँस रहा है -

गेंदे के फूलों में

खेत खलिहानों में

फूली सरसों और गोधूम की 

बालियों में

टेसू में डूबे फाग- राग में

ओह ! बसंत ! 

ऋतु राज बंसत !


उसने…

फिर से दस्तक दी है 

भारी भरकम यातायात के बीच 

अग्निशिखी परिधानों में लिपटे

गुलमोहरों की

चिलमन की ओट से

ऋतुराज मुझसे कह रहा है कि -

कवि पद्माकर के

“बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है”

कि जगह वह भी अब -

सड़कन के किनारों पे बगरयो बसंत है !


***

 











बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

"सागर और लहरें"


सागर के मन में बैचेनी भरी है ।

अजब सी हलचल कूलों पर मची है ।।

 

बढ़ रही हैं देखो प्रबल वेग से ,

लहरें भी आतुर हैं कितनी देर से ।

तोड़ कारा मुक्त होना चाहती हैं ,

अपने ढंग से ये भी जीना चाहती हैं ।


धैर्य की सीमाएं शायद खो रही हैं ,

पाने को तटबंध देखो बावरी सी हो रही हैं ।


व्यग्र होने का कुछ सबब रहा होगा ,

लहरों का अस्तित्व खो रहा होगा ।

उनका मोह जैसे भंग हो रहा है ,

शायद अपना सा कहीं  कुछ खो रहा है ।


मन सरोवर में किसी ने फेंक दी कोई कंकरी है ।

शान्त से माहौल में गूंज शोर की हो रही है ।।


🍁


बुधवार, 2 फ़रवरी 2022

आसमां धुंधला सा है...


आसमां धुंधला सा है..

जाग कर सोया सा है ।


धुंए सी इस भोर में..

दम हवा का घुट रहा है ।


घर तो है अपना मगर..

गैर सा क्यों रास्ता है ।

 

आईने के सामने भी..

बिंब मेरा अपना कहाँ है ।


विटप ठूंठ की शाख पर

एक पल्लव कांपता है ।


***