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रविवार, 18 अक्तूबर 2020

"क्षणिकाएं"


जागती आँखों ने

देखे हैं चंद ख्वाब

असामान्य सी 

सामान्य परिस्थितियों में

और मन उनको 

सहेजने की 

जुगत में लगा है

✴️

जिस मोड़ पर

तुम्हें  छोड़ा था

मेरे मुड़ने के बाद भी

जिद्द में...

तुम आज भी वहीं खड़े हो

चलो …

जो भी हुआ अच्छा हुआ

सार्थक हुआ अपना यूं 

बिछड़ना भी...

मुझे हराने की चाह ने

तुम्हे पर्वत बना दिया

और मुझे … 

बहता दरिया

✴️

खुद में खो कर 

खुद के करीब रहना 

अक्सर...

सुकून ही देता है

 सुना है बाहर

अंधेरों की दुनियां 

उजालों पर भारी हैं

✴️✴️✴️

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

"साथी"

                  


जीवन नहीं मधुमास साथी ।  

कठिन बहुत अभ्यास साथी ।।


सुख-दुख  दोनों जीवन पहलू ।

अब तक का इतिहास साथी ।।


छम-छम बरसें बूंदें घन से ।

मन में फिर भी प्यास साथी ।।


होती नहीं हर चाहत पूरी ।

मत बन इनका दास साथी ।।


गांव बसा यादों का मन में ।

उसमें अपना वास साथी ।।


***

【 चित्र - गूगल से साभार 】



एक बार तरही ग़ज़ल के बारे में पढ़ते हुए राहत इन्दौरी जी की कलम से निसृत - तू शब्दों का दास रे जोगी..पढ़ी जो बाद में -जोग कठिन अभ्यास रे जोगी..में ढलती चली गई . एक अकिंचन प्रयास मेरी ओर से ।

      

बुधवार, 7 अक्तूबर 2020

"जी चाहता है"

जी चाहता है...

अपनी तूलिका में

लेकर सातों रंग 

रंग दूं कोरे कैनवास

भर दूं..

शब्दों की गागर से

भावशून्य सागर

खोज लूं..

सृष्टि- रहस्य 

हो जाऊँ…

अपरिचित से परिचित

निर्बल से सबल

मगर..

जानती हूँ 

मैं भी इतना

आसान कहाँ ..

लक्ष्य भेदना

अर्जुन नहीं 

मैं ...

कर्ण जैसा कुशल धनुर्धर 

बनना चाहती हूँ

अपनी राह में आए कंटक

बस...

खुद हटाना चाहती हूँ

***

शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

"क्षणिकाएं"

✴️

अनकही व्यथा मन में दबाये

धूसर मेघ …

बिना नागा चले आते हैं

सांझ की अगवानी में

और न जाने क्यों...

ढुलक जाते हैं अश्रु बूँद से

धरा के आँचल में..

✴️

खड़ी रहने दो

अपरिचय की दीवार

कुछ भरम..

मुस्कुराहटों में सजे 

बड़े भले लगते हैं

✴️

राख के तले

दब सोयी है चिंगारी

अपने आप में 

सुलगती सी..

मत मारो फूंक !

सुनते  हैं..एक फूंक से

वह दावानल भी

बन जाया करती है

✴️✴️✴️

सोमवार, 28 सितंबर 2020

"सीख"

अन्तर्मन से एक

 आवाज़ आई

कुछ कहना है...

चुप !!

विवेक ने तुरन्त 

कस दी नकेल

और...

 दे डाली एक सीख

जब प्रकृति ने 

संरचना में दिये

सुनने को दो कान..

देखने को दो आँख…

और

बोलने को एक जीभ 

तो कुछ तो देख 

समझ के सीख

 सत्य वचन..

दाँतों की लाडली

यह तो..

बोल कर निकल लेती है

चंचल जो ठहरी

और..उसके बाद बेचारा मन

 झेलता है..

झाड़ू की सींक से

बातों के चाबुक

जो पड़ते दिखते तो नही

बस..

अपने निशां छोड़ जाते हैं

---

 

शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

'मुक्तक"

चले जब हाथ थामे फिर संग छोड़ना क्यों है ।

मिले कैसी भी दुश्वारी अब मुँह मोड़ना क्यों हैं ।।

बने जन्मों के साथी हैं  सब सुख-दुख में साझी ।

इरादे नेक  हैं अपने तो  बंधन तोड़ना क्यों है ।।


यादों की गलियों में मैं  बचपन को ढूंढती हूँ ।

पल-पल घटते जीवन में अमन को ढूंढती हूँ ।।

मेघों को देख  दृगों में उतर आती है करूणा ।

इन्द्रधनुषी सुमनों से खिले उपवन को ढूंढती हूँ ।।


थोड़ा भरोसा है खुद पर बहुत ज्यादा नही है ।

सीमित रहेगी सदा वह  यह भी तो वादा नहीं है ।।

न तो मोह की सीमा न चाहतों पर बंधन ।

रुक जाए गंतव्य से पहले धारा का इरादा नहीं है ।।


 🍁🍁🍁🍁


मंगलवार, 22 सितंबर 2020

"मन की वीथियां"

ब्रह्मपुत्र का सिन्दूरी जल

और..

भोर की पहली किरण 

पुल से गुजरते हुए

 एक तैल चित्र सा दृश्य

अक्सर दृग पटल पर

उभर आता है

निरभ्र गगन के कैनवास पर

 इन्द्रधनुष सा...

कुछ नाविक जाल लिए

कुछ मछली के ढेर लिए

घर से आते या घर जाते

ना जाने कौन से

 सम्मोहन में बंधे ..

 हिमालय श्रृंखला की गोद में

 बसे इस अँचल में

एक बार का गया कोई

वापस अपने देस नहीं लौटता..

भूला-भटका यदि कोई

लौट भी आता  है तो...

 मेरी तरह स्मृति के गलियारों में

भटकता फिरता है

कामरूप के 

काले जादू में बंधा

उस नाव और नाविक सा..

"जा रहा है कि आ रहा है" के

 भंवर जाल का बोध कराता

जिसमें...

उलझ कर रह जाता है मन

दृष्टिभ्रम सदृश .. 


***