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शुक्रवार, 17 जनवरी 2020

'मन की तृष्णा'



अतृप्त तृष्णाएं अनन्त और असीम हैं ।
निस्सार संसार में यही जीवन की रीत है ।।

कोल्हू का बैल  मानव भ्रम में जीता रहता सदा ।
स्पर्धाओं में भागते-दौड़ते कभी कम नही हुई व्यथा ।।

अनेकों रूप धरे पिपासाएं हर दम मन को  उलझाती ।
काम-क्रोध ,लोभ-मोह   जीवन के अभिन्न साथी ।।

मिल गया अगर सब कुछ तो भी तुष्टि नही है ।
अधूरी रह गई अभिलाषाएं अभी अधूरी क्यों है  ।।

अधूरी इच्छाओं को पूरा करने की आशा ।
हो गई यदि सभी पूरी तो और पाने की प्रत्याशा ।।

★★★★★


शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

"जिजीविषा"

पतझर के पीले पात सी
दिन के छोर पर अटकी
वह सर्दियों की 
ठंडी सी सांझ..

ठिठुरी भीगी अधजली
धुआं उगलती लकड़ियाँ
अकड़ी ..सूजी ..नीली पड़ी
तुम्हारी ठंडी अंगुलियां
बता रही यह राज 
कि वे दिन भर
कितना श्रम करती हैं...

चेहरे पर मृदु हास लिए
होठों पर स्मित मुस्कान भरे
स्थितप्रज्ञ सी आकृति तुम्हारी
आ  बैठती है अक्सर
मेरे मन की देहरी पर...

जब मैं सम्बल खोती हूँ
नहीं अपने में होती हूँ
बनती है मेरी उत्प्रेरक
जीवन जीने की जिजीविषा
मेरे अन्तस् में भरती है...

★★★★★

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

"हाइकु"


गोधूलि काल
लौटते निज नीड़
थके पखेरू
राह निहारे
सुकुमार नयन
अंक-पाश की
नन्हें बालक
हँसते मुस्कुराते
आँखों की तारे
जननी अंक
सुखद अनुभूति
सरस लोरी
शैशव काल
शिशु की पहचान
चिन्ताजनक

गुरुवार, 2 जनवरी 2020

"विहान"

सुरम्य सुरभित नव विहान ,
तुमसे है मुझे कुछ मांगना ।
मेरे और अपनों की खातिर ,
ऊर्जस्विता की है कामना ।।

तमस हर  अज्ञान का ,
ज्ञान पुंज बढ़ता रहे ।
राग-द्वेष , वैर-भाव  का 
मनोमालिन्य घटता रहे ।।

विहगों के कलरव गान सम ,
समता -बन्धुता का राग हो ।
मानव निस्पृह तरुवर सदृश
हिमाद्रि सम ठहराव हो ।।

सुरम्य सुरभित नव विहान ,
मेरी तुमसे यही चाहना ।
सम्पूर्ण विश्व परिवार तुल्य ,
बस इतनी सी है कामना ।।

★★★★★

रविवार, 29 दिसंबर 2019

"स्वागत"

आवरण बद्ध कल बस ,
अपने खोल से निकलने ही वाला है ।
हर बार की तरह आज ,
बस कल में बदलने ही वाला है ।।
आज और कल यूं ही ,
साल दर साल बदलते रहेंगे ।
हर बार की तरह इस बार भी ,
आधी रात को पटाखें बजते रहेंगे ।
कहीं अल्कोहलिक बेवरेज के महंगे दौर चलेंगे
और रंगीन होती रहेंगी मधुशालाएं ।
कहीं रहेगी फिक्र सदा की तरह रोजी रोटी की
और जलती रहेंंगी अतृप्त अरमानों की ज्वालाएं ।
चिन्तन-मनन के लिए तीन सौ चौसठ दिन ,
एक दिन का उत्सव तो मन ही सकता है ।
दरवाजे पर खड़ा नया साल हम से, 
अभिनन्दन की उम्मीद तो रख ही सकता है ।
छोड़़ो किन्तु -परन्तु के झंझट
मन में उत्साह का संचार करो ।
फिर से आ गया नया साल ,
हँस बोल  स्वागत सत्कार करो ।

★★★★★

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

"सायली छंद"

Merry Christmas to all of you 🎅

एक प्रयास सायली छंद लिखने का… , भावाभिव्यक्ति के लिए शब्दों का क्रम - 1,2,3,2,1रहेगा ।

(1)

जिन्दगी
तेरे इम्तिहान
कितने अभी बाकी
बावरा मन
पूछे...

(2)

चलो
फिक्र को
फूंक से उड़ाएँ
थोड़ा हँसे
खिलखिलाएँ...

(3)

अंजुरी
भर ख्वाब
मुट्ठी में बन्द
चमकते जुगनुओं
जैसे...

(4) 

स्मृतियों
का सूत
जीवन रुपी चरखा
कातता रहता
अनवरत...

★★★

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

"ताँका"

'ताँका' 

मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'गोदान' के कथा नायक 'होरी' और उसके जैसी जिन्दगी जीते किसानों की मनस्थिति पर मन में उपजे भावों को अभिव्यक्त करने का एक प्रयास -

(1)

पूस की रात
देह में ठिठुरन
गिरता पाला
ठिठुरता अलाव
सोचों में डूबा मन

(2)

सर्दी या गर्मी
करता रखवाली
निज स्वप्नों की
श्रम सार्थक होगा
धनखेत खिलेगा

(3)

दुविधा भारी
बढ़ती महंगाई
मंडी की मंदी
दो पाटों में उलझी
पिसती सी जिन्दगी


★★★