खामोशी की डोर से
बँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
और..,
बीच में पसरा पड़ा है
कभी भी न सिमटने वाला
सन्नाटा..,
फासला तो अधिक नहीं है
हमारे बीच
मगर सोचों की गहराई का
छोर..,
दूर -दूर तक नहीं दीखता
***
खामोशी की डोर से
बँध कर हम
चले जा रहे हैं किनारे-किनारे
और..,
बीच में पसरा पड़ा है
कभी भी न सिमटने वाला
सन्नाटा..,
फासला तो अधिक नहीं है
हमारे बीच
मगर सोचों की गहराई का
छोर..,
दूर -दूर तक नहीं दीखता
***
रूई के फाहों जैसे ढक गए हैं
तुषार-कणों से देवदार ..,
धरती पर भी नमक सी बिखर गई है
बर्फ़…,
पास ही पहाड़ की बाहों में
लिपटे घर से
नीम उजाले की चमक के साथ मद्धम सा सुर
गूँज उठता है -
“लाइयाँ मोहब्बतां दूर दराचे..,,
हाय ! अँखियों तां होया कसूर,..,
मायें मेरिये, शिमले दी रावें,
चम्बा कितनी दूर…,
चम्बा कितनी दूर…!”
सुर की मिठास कब शब्दों की कसक के साथ
एक जोड़ी आँखों से बूँदें बन
ढलकने लगती हैं
ना गीत को पता..,
ना गाने वाली आवाज़ को..,
बस..,
दर्द दरिया बन
दो अजनबियों के बीच बेआवाज़
बहने लगता हैं
संवेदनाओं के ना पैर होते हैं ना पँख
वे सदियों से
यूँ ही बेआवाज़ जीवित हैं
***
उड़ती रेत पर मंजिल का ठिकाना
ढूँढता रहा बटोही
मरु -लहरियों में गुम
मंजिल का ठिकाना तो नहीं मिला
मगर मिली
रेत के दरिया में सिमटी असंख्य कहानियाँ ।
*
घर के स्टोर-रूम में संभाल कर रखती हैं
गृहणियाँ अपने सामान की
पोटली …,
जिसमें बँधा होता है उनका अपना
ग़ैरज़रूरी..,
लेकिन बहुत ज़रूरी सामान ।
*
समय निर्बाध
तय करता रहा अपनी यात्रा
और..,
जीवन आकंठ डूबा रहा अपनी आपाधापी में
जी लेंगे अपनी जिन्दगी भी
फुर्सत मिलने पर…,
जैसे जीवन साल भर की
कतर-ब्योंत का बजट हो
आम आदमी की सोच यही तो रहती है
लेकिन…
समय की गति कहाँ रूकती है सोचों के मुताबिक़
वक्त मिलने तक ..,
वक्त के दरिया में बह जाता है
न जाने कितना ही पानी
सांसारिकता कब समझ पाती है
सृष्टि के नियम
सिक्के के पहलुओं की तरह बँधे हैं
समय और जीवन
समय पर न साधने पर फिसल जाते हैं
रेत के कणों जैसे बन्द मुट्ठी से ।
***
दिन की गठरी से चुरा कर
थोड़ा सा समय..,
अपने लिए रखने की आदत
एक गर्भनाल से
बाँध कर रखती रही है
हमें..,
जब से तुम्हारे समय की गठरी की
गाँठ खुली है
हम एक-दूसरे के लिए अजनबी
से हो गए हैं
पलट कर देखने पर हमारा
जुड़ाव …,
अब तो बीते जमाने की
बात भर लगने लगा है
***
बीमार सा रहने लगा है
मन अब ..,
बन्द कर लिए इसने अपने वजूद के
खिड़की-दरवाज़े..,
हवा की छुवन भी अब
ताजगी की जगह सिहरन सी
भरने लगी है
जानती हूँ ऐसा ही रहा तो
एक दिन…
यह धीरे-धीरे यूँ ही मर जाएगा
अभिव्यक्ति ख़ामोश हो जाएगी
और..,
बहुत सारी बातें किसी शेल्फ़ में रखे
सामान की तरह
गर्द की परतों तले दब कर
समय के साथ
अर्थहीन होती चली जाएँगी।
***
बहुत सारे किन्तु-परन्तुओं के
सानिध्य में
नैसर्गिक विकास अवरूद्ध
हो जाया करता है
वैचारिक दृष्टिकोण में अनावश्यक हस्तक्षेप
चिंतन के दायरों में
सिकुड़न भर देता है और विचार
न चाहते हुए भी
पेड़ की शाख से टूटे पत्तों के समान
अपना अस्तित्व खो बैठते हैं
***