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गुरुवार, 10 जून 2021

"विभावरी"

                         

शुक्ल पक्ष की चाँदनी में

 भीगी रातें..,

जब होती हैं

अपने पूरे निखार पर

तब...

 रात की रानी 

मिलकर

 रजनीगंधा के साथ

टांक दिया करती हैं 

उनकी खूबसूरती और

मादकता में

चार चाँद ..

उन पलों के आगे

कुदरत का 

सारा का सारा

सौन्दर्य

ठगा ठगा

और

फीका फीका सा लगता हैं

फूलों का राजा

 गुलाब

 तो बस यूं हीं .., 

गुरूर में

ऐंठा-ऐंठा फिरा करता है ।


***

शुक्रवार, 21 मई 2021

"नाराजगी"

बादल!

सावन में अब की 

बरसो तो…

लाना कुछ ऐसा

जिससे हो 

इम्यूनिटी बूस्ट

जरूरत है उसकी

मनु संतानों को

जो रख सके

उनके श्वसन को मजबूत

चन्द्र देव!

बड़े इठला रहे हो

यह ठसक

किस काम की ?

जब...

सदियों से तुम्हारी प्रशंसा में 

 कसीदे पढ़ने वालों की

  नींव...

 दरक रही है धीरे-धीरे

सुनो !

 जड़-चेतन साझा सहभागी हैं

प्रकृति के ..,

हम भी उन्हीं की संतान हैं

और माँ की नजर में तो

 सभी समान है

माना कि..

हो गई मानव से कुछ गलतियां

 खुद को सृष्टि में सबसे 

ताकतवर और बुद्धिमान 

समझने की गलतफहमियां

अब बस भी करो…

कितनी सजा और दिलवाओगे

 अगर न रहा मनुज

तो अपने आप में अधूरेपन की

सजा तुम भी तो पाओगे


***

शनिवार, 15 मई 2021

"प्रश्न"

काम से कभी कोई,

 थकता  कहाँ था  ।

उलझनों से दौर से,

डरता कहाँ था   ।।


सांसों से बंधे हैं, 

सबके जीवन- सूत्र ।

आज जो मंजर है कल 

 सोचा कहाँ था ।।


जीत में जश्न क्या,

हार पर विमर्श क्या ?

जीव तो जीव ही था, 

 आकड़ा कहाँ था  ।।


 अपने में खोया ,

कुछ जागा कुछ सोया ।

 पहले मन कभी इतना 

अकेला कहाँ था ।।


 रेत के सागर से रखी

 मीठे जल सी चाह। 

  दुनिया में  मुझसा नासमझ

कोई दूसरा कहाँ था ।।


***

रविवार, 2 मई 2021

।। क्षणिकाएं।।

                 

लबों को रहने दो खामोश

काफी है, 

आँखों की मुस्कुराहट ।

बर्फ ही तो है

इस आँच से ,

बह निकलेगी ।

**

हौंसला और जिजिविषा

 देन है तुम्हारी ।

 विश्वास की डोर का 

छोर भी ,

तुम्हीं से बंधा है ।

जानती हूँ 

रात के आँचल के छोर से,

यूं ही तो बंधी होती है ।

उजली भोर के,

सुनहरे आँचल की गाँठ ।

**

 कई बार

अनुभूत पलों का,

मुड़ा-तुड़ा कोई पन्ना ।

बाँचना चाहती हैं आँखें ,

मगर 

इज़ाज़त कहाँ देता है ,

जटिल बुनावट वाला विवेक ।

समझदारी के फेर में

कस कर मूंद  देता है ,

सुधियों भरा संदूक ।

**


रविवार, 25 अप्रैल 2021

"त्रिवेणी"



ईर्ष्या और रंजिश के भाव...

फसल के रुप में उगते तो नहीं ।


बस अमरबेल से पल्लवित हो जाते हैं ।

--


 हाथ मिलाने भर से क्या होना है..,

 गले लग कर भी अपनापा महसूस नहीं होता ।


 दिल की जमीनें भी अब ऊसर होना सीख गई है ।।

--


ऑनलाइन मंगवाया सामान कभी कभी…,

दरवाजों पर पड़ा पूछता सा लगता है कुशलक्षेम ।


कभी-कभी संवेदनाएँ  यूं भी दिखती हैं ।।

--


शहर और गाँव उदास व गमगीन हैं..,

इन्सान भी हताशा और निराशा में डूबा है ।


'कोरोना' को फिर से भूख  लगी  है ।।


***

रविवार, 18 अप्रैल 2021

"प्रश्न"

                      

लीक पर चलती 

पिपीलिका..

एकता-अनुशासन और

संगठन की प्रतीक है

आज हो या कल

 बुद्धिजीवी उनकी

कर्मठता का लोहा मानते  हैं

प्रकृति के चितेरे सुकुमार कवि

 सुमित्रानंदन पंत जी ने भी कहा है-

"चींटी को देखा?

वह सरल, विरल, काली रेखा

चींटी है प्राणी सामाजिक,

वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।"

कविता याद करते समय

 एक खुराफाती प्रश्न

मन में अक्सर  उभरता था

मगर…,

काम के बोझ में डूबी माँ

और होमवर्क की कॉपियों में

डूबी शिक्षिका की

हिकारत भरी नज़रों से

बहुत डरता था

है तो धृष्टता..,

 लेकिन आज भी

मेरे मन में यह बात

 खटकती है

और प्रश्न बन बार-बार उभरती है

प्रश्नों का क्या ?

किसी के भी मन में आ सकते हैं

मैं इस धृष्टता के लिए

क्षमा चाहती हूँ

और अपना वही पुराना

घिसा-पीटा सा प्रश्न

 दोहराती हूँ

पिपीलिका अगर लीक पर

चल कर भी..

साहस और लगन की प्रतीक है

तो…,

लीक पर चलने वाला इन्सान

क्यों"लकीर का फकीर" है


***

【चित्र-गूगल से साभार】

बुधवार, 14 अप्रैल 2021

"नाराज़गी"

                       


नाराज हैं मुझसे

मेरी सबसे गहरी दोस्त

किताबें..

कल धूल झाड़

 करीने से लगा रही थी तो

मानो कर रहीं थीं 

शिकायत-

माना 'कोरोना काल' है

एक साल से 

तुम परेशान हो..

लहरें आ रहीं हैं - 

पहले पहली और अब दूसरी

यह भी सच है कि

बाहर आना-जाना मना है

दूरी बनाये रखनी भी

जरूरी है

मगर हम तो हैं ना..

घर की घर में,घर की सदस्य

फिर हम क्यों कैद हैं

तुम्हारी आलमारी में

एक साल से..,

हमसे यह अबोलापन

और

दूरी क्यों ?


***

【चित्र-गूगल से साभार】