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सोमवार, 7 सितंबर 2026

“भोर की किरणें”

आविर्भाव के साथ ही

 धीमे- धीमे गीत गाती हैं 

भोर की किरणें

 

 स्वर्णिम सी उजास में उनकी 

गुनगुनाहट 

आँखें बंद करके मैंने

 बहुत करीब से सुनी है 


  

दिन भर की गहमागहमी में

 यही गुनगुनाहट

कहीं खो सी जाती है 


चाह कर भी सुनना चाहूँ 

तो भी 

दिन में मैं नहीं सुन पाती वह

मध्दम मधुर आवाज़ 



ढलती सांझ के 

धुँधलके में धीमे-धीमे  

 सरकती सी 

वह आती है मेरे समीप 


मानो मुझसे कह रही हो —

जीवन का सार यही तो है 


कुछ पाने की चाह में

 हम दिन भर भागते रहते हैं 

और अंततः

 ठहरना ही सीखते हैं ।


***


गुरुवार, 20 अगस्त 2026

“खोज”

बादलों की ओट में
 लुप्त नहीं हुआ है चन्द्रमा,
वह  केवल दृष्टि से ओझल है
 जैसे सत्य
 अज्ञान के आवरण में
 कभी-कभी छिप जाता है ।

काली घटाएँ घिरती हैं आसमान में
और बरस जाती हैं धरा पर,
  मन का आँगन भी 
उनके साथ सावन-भादों सा
 भीगा-भीगा रहता है ।

 जीवन भी ऐसा ही है
 कभी धूप,
 कभी घनघोर घटाएँ,
 कभी उजास,
 कभी अनंत प्रतीक्षा ।

नेह के घट से
 अमृत छलकता है,
 तो उसी प्रेम की गहराई में
 अश्रु भी जन्म लेते हैं ।

 सुख और दुःख
 वास्तव में विरोधी नहीं,
 एक ही अनुभूति के
 दो किनारे हैं ।

पूनम की रात है,
 फिर भी नभ घनपूरित है
 चाँदनी को तरसती आँखें
 यह भूल जाती हैं
 कि चाँदनी बाहर  नहीं,
 मन के भीतर भी है  ।

बादल चन्द्रमा को
 कब तक ढक पाएँगे ?

आवरण बदलते हैं,
मगर आकाश वही रहता है ।
 दृश्य बदलते हैं,
लेकिन सत्य शाश्वत रहता है ।

मनुष्य भी…,
 अपने जीवन रूपी बादलों में
 स्वयं को खोजता है
बस ढंग बदलता रहता है

***


शनिवार, 1 अगस्त 2026

“संवाद“

झील-सा धीर-गंभीर
 दिखने में निश्चल 

लेकिन…,
 भीतर ही भीतर अनगिन वृत्ताकार
तरंगों के जाल में गुम्फित 

मन का आँगन भी
बड़ा  विचित्र है 

सागर के ज्वार-सा
अपनी ही निस्तब्धता से
बार-बार संवाद करता है 


***



शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

“शुरुआत”

लम्बी खामोशी के बाद 

एक दिन जानी-पहचानी आवाज़ 

कानों में गूंजी —


"फिर से शुरुआत करें सुख-दुख साझा करने की"


तीर सी सिहरन

समूचे वजूद को सिहरा गई

कुछ देर की चुप्पी 

और फिर …

अन्तस् से एक आवाज उभरी


ऐसा है -

 “वक्त गुजर गया”

अब भी बहुत काम बाकी हैं जो कभी 

हमारे साझी थे

कुछ मेरे और कुछ तुम्हारे


देखो…,

मेरे पास काम बहुत हैं

और तुम्हारे पास फुर्सत बहुत 


मेरी मानो तो ..,,

खाली वक्त में थोड़ा 

आत्ममंथन करना 

 अगले जन्म में मेरे और तुम्हारे काम

 ईमानदारी से

बराबर -बराबर रखना


अगर ऊपर वाले की मेहर हुई तो

 एक बार और सही— 


फिर से शुरुआत कर ही लेंगे

अपने सुख-दुःख

साझा करने की


***


सोमवार, 22 जून 2026

“उस पार”

उस पार बँधी खड़ी है
 एक सांसारिक बंधन मुक्त नाव,
 किन्तु  उसका खिवैया कौन है 
 यह प्रश्न ..,
 तम की चादर में लिपटा पड़ा है ।

रात के घने आवरण को चीर
 मन उस पार जाना चाहता है,
 जहाँ अनकहे रहस्यों की गांठें खुलें,
 और मौन अपने भीतर छिपे अर्थों का
 भेद स्वयं प्रकट करे ।

आँखों में थकन उतर आई है,
 जैसे अनगिनत यात्राओं की धूल
 पलकों पर जम गई हो ।
 बहुत दिन बीते
 चैन की गोद में सिर रखे हुए,
 बहुत समय हुआ
 स्वप्नों के निर्भार जल में डूबे हुए ।

अब मन चाहता है
 नींद के उस अथाह सागर में उतर जाना,
 जहाँ स्मृतियाँ शांत हों,
  समय का शोर थम जाए,
 और आँखें..,
 अपनी सारी व्याकुलता छोड़कर
 गहरे विश्राम में खो जाएँ ।

शायद उस पार
 सांसारिक बन्धन रहित नाव तो है 
 मगर खिवैया अब भी अदृश्य है,
 वहीं कहीं अनंत में कोई शांतिपूर्ण तट भी होगा
जिस पर पहुँच कर सभी प्रश्न स्वतः मौन हो जाएँगे ।

***


सोमवार, 15 जून 2026

“भ्रम”

कुछ कहने -सुनने,समझने-समझाने
 की सारी बातें,
 यहीं छोड़ दें तो अच्छा है । 

दुनिया की उलझी हुई रस्में,
 रिश्तों और व्यवहारों का हिसाब-किताब
 इनसे किसी का कुछ 
 कभी अच्छा हुआ है भला।

व्यर्थ बातों में क्यों उलझना
सबके अपने-अपने स्वर्ग और नर्क हैं
 अपनी वैतरणी खुद ही
 पार करता है इन्सान ।

अक्सर हम दुनिया देखते हैं,
  उसके जैसा बनने की कोशिश करते हैं,
 सबके पीछे चलते हैं;
 और इसी अनुकरण की चक्की में
 धीरे-धीरे पिसते हैं।

शायद बेहतर हो कि
 हम एक-दूसरे से बात तो करें,
मगर अपने मन की भी सुने,
 और उस शोर से दूर रहें
 जो केवल भ्रम पैदा करता है ।

***


रविवार, 31 मई 2026

“अनुत्तरित प्रश्न ”


रात अपने अंतिम प्रहर में है,
 और तारे भी बुझने लगे हैं

इन्सान होने के नाते मेरी सोच 
 कहीं खो सी गई है
 जैसे भूसे के अथाह ढेर में
 एक छोटी सी सुई ।

 कई बार कुछ प्रश्न 
 बार-बार,
सामने आ खड़े  होते हैं लेकिन 
उनके उत्तर कहीं नहीं दिखते 

एक विचार कौंधता है मन में 
 क्या केवल जीवित रहना ही
 जीवन का होना है ?

सुबह से शाम तक
 समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
 और मनुष्य..,
 जेब में पड़े  सिक्कों की तरह
 धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को 
क्षीण होते देखता रहता है 

 छोटी-छोटी ज़रूरतों में
 उसके दिन बँट कर रह जाते हैं
 सपने..,
 जो कभी आसमान से
 विस्तृत हुआ करते थे ,
 जीवन के हिसाब-किताब के बीच
 दम तोड़ते दिखाई देते हैं ।

रात के धुँधलके में
 जब तारों की रोशनी भी थक हार कर बैठ जाती है,
 इस तरह के अनगिनत प्रश्न
 और अधिक स्पष्ट होकर सामने आ खड़े होते हैं 

 तब एक सोच उभरती है —

क्या जीवन केवल इसलिए जीवन है 
 कि एक दिन
 हम पूरी तरह खर्च हो जाएँ,
 और किसी को
 हमारी अनुपस्थिति का कोई फ़र्क़ भी न पड़े ।


***