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रविवार, 8 दिसंबर 2019

"संकल्प"

संभल कर चल !
सांझ के साये में...,
सांझ के साये में
घूमते हैं नर-पिशाच
तेरे संभले डग
और तेरी बुद्धिमता…,
तेरा रक्षा कवच है
खुद पर कर यकीन 
तेरा यकीन ही
देगा तुझे ताकत
महिषासुरमर्दिनी सी …,

जानती तो है तू !
दोधारी तलवार है 
तेरी जिन्दगी…
अबला है तो...
रोती क्यों हैं ?
सबला है तो
बेलौस क्यों है ?

शतरंज की बिसात 
जैसी है जिन्दगी
जरा सी अनदेखी
पलट देती है बिसात
चंद हमदर्दी के अल्फाज़
और फिर…
वही ढाक के तीन पात

★★★





शुक्रवार, 6 दिसंबर 2019

"कुंडलियां"

"बेटी"

बेटी घर का मान है, मन उपवन का फूल ।
मात-पिता की लाडली , यह मत जाओ भूल ।।
यह मत जाओ भूल , याद रखना नर-नारी ।
रखती सब का मान , मान की वह अधिकारी ।।
कह 'मीना' यह बात, करो मत यूं अनदेखी ।
बेटों सम अधिकार , हम से मांगती बेटी

"किसान"

जी तोड़ मेहनत करे , खेतों बीच किसान ।
फल की आशा के बिना , जीवन लगे मसान ।।
जीवन लगे मसान , करे क्या वह बेचारा ।
धरती माँ का लाल , फिरे वो मारा मारा ।।
कह 'मीना' बिन आस ,गृहस्थी रुकती चलती ।
पालन अब परिवार ,  मुश्किल हो गया है जी ।।

( एक प्रयास कुंडलियां लिखने का ✍️)

★★★★★

मंगलवार, 3 दिसंबर 2019

"नियति"

आड़ी-टेढ़ी पगडंडी ,
और उसके दो छोर ।
एक दूजे से मिलने की ,
आस लिए चले जा रहे हैं ।
उबड़-खाबड़ रास्तों से  ,
कभी पास-पास , कभी दूर-दूर ।
हमें आपस में बाँधने को ,
ना पगडण्डी है , 
और ना ही कोई कूल-किनारा ।
मगर फिर भी ,
बन्धन तो बन्धन है ।
हमें बाँधता है ,
सब की 'आँखों का तारा' ।
कभी घटता , कभी बढ़ता ,
नीलगगन की शोभा ...
दुग्ध धवल सा चाँद ।
दिन-भर की दौड़-धूप ,
और उसके बाद विश्रांति काल ।
जब उससे ... 
नजरें मिलती है ,
मेरी भी.. तुम्हारी भी ।
 तो , तार जुड़ते हैं ,
मन के ..मन से..
आ जाती है ।
कुशल-क्षेम ..
मिलना ना मिलना ,
तो बस…
नियति की बात है ।

★★★

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

"नारी"

नारी का व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव रचनाकारों की
लेखनी का प्रिय विषय रहा है । मैं भी इस भावना से
परे नहीं हूँ । मुझे नारी का गृहस्थ जीवन की धुरी
होने के साथ-साथ उसका कर्मठ और बुद्धिमतापूर्ण
व्यक्तित्व बहुत मोहता है । नारी के उसी सशक्त
रुप को अपनी लेखनी से अंकित करने का प्रयास
मेरी तरफ से --

नही जानती किसी की नजर में , अहमियत मेरी ।
मैं जानती हूँ अपने घर में , हैसियत मेरी ।।

ओस का कतरा नहीं , जो टूट कर बिखर जाऊँ ।
कमजोर भी इतनी नहीं , यूं ही उपेक्षित की जाऊँ ।।

घर के कोने में सजा  , 'कॉर्नर-पीस' नहीं हूँ मैं ।
तुम्हारी माथे की हूँ पाग , अपना मान जानती हूँ मैं ।।

कोशिश भले ही कितनी भी हो , मुझको मिटाने की ।
चुन ली गर कोई डगर , फिर ना हट पाने की ।।

जीवनरुपी कैनवास पर , बिखरे अनगिनत रंग मैं ।
प्रकृति में सिमटी तेजोमय , सतरंगी  आभा सी मैं ।।

★★★★★

रविवार, 24 नवंबर 2019

"मुक्तक"

(1)
वृक्षों के जैसा कोई उपकारी नही है
नष्ट करना इनको समझदारी नही है।
पोषित इन के दम पर पूरा पर्यावरण
वन रक्षण क्या सबकी जिम्मेदारी नहीं है
( 2 )
स्व को कर परमार्जित हम आगे बढ़ते हैं ।
अपनी 'मैं' को भूल कर सबकी सुनते हैं ।।
हो सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय का भाव ।
करे उन्नति सम्पूर्ण राष्ट्र ,यही स्वप्न देखते हैं ।।
(3)
ऐसे भी नौनिहाल हैं जो काँटों में पलते हैं ।
श्रम की भट्टी में वो लौह खण्ड से ढलते हैं ।।
दो अवसर उनको भी तो स्व उन्नयन का ।
नन्ही आशा के दीप उन नैनों में भी जलते हैं ।।
(4)
सकारात्मकता का भाव हृदय में संचित करेंगे ।
सर्वांगीण शिक्षा के कीर्तिमान अर्जित करेंगे ।।
नहीं रहे समाज में वर्गभेद और निरक्षर कोना ।
कैसे फिर विकास और उत्थान  से वंचित रहेंगे ।।

★★★★★

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

तांका

शाश्वत आभा
मनस्वी नगपति
आदि सृष्टि सी
स्वर्णिम रश्मियां
सौन्दर्य स्थितप्रज्ञ

मानस-सर
अमृत सम अम्बु
निर्बन्ध मुक्त
सुषमा नैसर्गिक
दृग-मन विस्मित

पुष्प गुच्छ सी
सुवासित मधुरम्
विबुध धरा
हिमगिरि आंचल
प्रकृति अनुपम

★★★★★

रविवार, 17 नवंबर 2019

"क्षणिकाएं"

(1)
थके तन में बोझल मन
डूब रहा है यूं .....
जैसे..अतल जल में
पत्थर का टुकड़ा

(2)
स्नेहिल अंगुलियों की
छुवन मांगता है मन..
बन्द दृगों की ओट में
नींद नहीं..जलन भरी है

(3)
दिखावे से भरपूर
ढेर सारी गर्मजोशी
आजकल के
रिश्ते-नाते भी ..
हायब्रिड गुलाब 
जैसे लगते हैं

★★★