Followers

Copyright

Copyright © 2019 "मंथन"(https://shubhrvastravita.blogspot.in/) .All rights reserved.

मंगलवार, 12 नवंबर 2019

"फैसला"

उसकी दिनचर्या तारों भरी भोर से आरम्भ हो अर्द्धरात्रि में नीलाकाश की झिलमिल रोशनी के साथ ही समाप्त
होती थी । अक्सर काम करते करते वह प्रश्न सुनती - "तुम ही कहो ? कमाने वाला एक और खाने वाले दस..मेरे बच्चों का भविष्य मुझे अंधकारमय ही दिखता है ।" और वह सोचती रह जाती..,तीन माह पूर्व की नवविवाहिता के पास इन सवालों का कोई जवाब नहीं था ।
 "सुनो ! मायके जा रही हो ? जब तक नहीं बुलायें वहीं
रहना । यहाँ टेंशन चल रही है । जैसे ही सब सही होगा
बुला लेंगे ।" आदेश पर उसने गर्दन हिला कर स्वीकृति
दे दी चलते-चलते ।
महिने भर बाद मायके में सुगबुगाहट - "कब जा रही हो ' लेने कब आ रहे हैं ?" फिर सवाल..लेकिन जवाब कहाँ थे उसके पास । लगभग तीन महिने बाद उसने निर्णय लिया सब सवालों के जवाब देने का । स्कूल- कॉलेज खुल गए थे
नये सत्र के साथ । वह कॉलेज गई.. एडमीशन की प्रक्रिया पूरी की..घर आ कर जैसे ही सब को अपने निर्णय से
अवगत कराया , कानाफूसी और आलोचनाओं के तेवर
तीखे हो गए  - "आजकल की लड़कियां..धैर्य और सहनशक्ति छू कर भी नहीं निकली इन्हें ।" वह जानती थी तेवर और तीखे होंगे और आलोचनाएँ भी मगर फैसला हो चुका था ।

★★★★★

गुरुवार, 7 नवंबर 2019

"क्षणिकाएं"

(1)
बेसबब नंगे पाँव ...
भागती सी जिन्दगी
कट रही है बस यूं …
जैसे एक पखेरु 
लक्ष्यहीन उड़ान में...
समय के बटुए से
रेजगारी खर्च रहा हो …

(2)

नेह के धागों से 
बुनी थी वह  कमीज
वक्त के साथ...
नेह के तन्तु
सूखते गए और….
कमीज की सींवन दुर्बल
एक युग  के बाद
धूल अटी गठरी से ...
उस कमीज का टुकड़ा
घनघनाया…
फोन की घंटी के रुप में...

★★★

सोमवार, 4 नवंबर 2019

"जिन्दगी"


वक्त की शाख पर
ढेरों लम्हें उगे थे
झड़बेरियों मे लदे बेरों सरीखे
कुछ-कुछ खट्टे
कुछ -कुछ मीठे
लम्हा-लम्हा चुन लिया चिड़िया के चुग्गे सा
भर लिया दामन में
और बस..बन  गई
अनुभूत पलों में पगी खट्टी- मीठी जिन्दगी

★★★

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019

"अक्सर"

अक्सर खामोश लम्हों में
किताबें भंग करती हैं
मेरे मन की चुप्पी…
खिड़की से आती हवा के साथ
पन्नों की सरसराहट
बनती है अभिन्न संगी…
पन्नों से झांकते शब्द
सुलझाते हैं मन की गुत्थियां
शब्द शब्द झरता है पन्नों से
हरसिंगार के फूल सा…
नीलगगन में चाँद
बादलों की ओट से झांकता
धूसर सा लगता है…
कशमकश के लम्हों में
एक खामोश सी नज़्म
साकार हो उठती है अहसासों में
बस उसी पल…
प्रभाकर की अनुपस्थिति में
पूर्णाभा के साथ
मन आंगन में..सात रंगों वाला…
इन्द्र धनुष खिल उठता है 

★★★

मंगलवार, 29 अक्तूबर 2019

"वर्ण पिरामिड"

(1)
है
द्वैत
अद्वैत
मतान्तर
निर्गुण ब्रह्म
घट घट व्याप्त
प्रसून सुवासित
(2) 
 है
सृष्टि
अनन्त
निराकार
परमतत्व
अनहद नाद
आवरण भूलोक
(3)
है
पर्व
अनूप
भाईदूज
रक्षाकवच
बहन का नेह
सर्वकामना पू्र्ति
(4)
है
विश्व
बन्धुत्व
अन्तर्भाव
मूल आधार
परराष्ट्र नीति
महनीय भारत

🌸🌸🌸




मंगलवार, 22 अक्तूबर 2019

"वर्ण पिरामिड'

ओ 
मेरे
दीपक 
हर तम 
सकल हिय
कर ज्योतिर्मय 
हो प्रफुल्लित मन
✳️ ✳️ ✳️ ✳️
माँ
तेरी
ममता
स्नेहाशीष
रक्षा कवच
मेरे जीवन का
तुझ से सम्पूर्णता
✳️ ✳️ ✳️ ✳️

शुक्रवार, 18 अक्तूबर 2019

"समय "



सांझ की चौखट पर
आ बैठी दोपहरी
कब दिन गुजरा
कुछ भान  नही...
नीड़ों में लौट पखेरु
डैनों में भर
उर्जित जीवन
उपक्रम करते सोने का
वे कब सोये 
फिर कब जागे
पौ फटने तक
अनुमान नही...
गुजरा हर दिन
एक युग जैसा
कितने युग गुजरे
बस यूंहीं
अवचेतन मन को
ज्ञान नही...

★★★★★