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शनिवार, 30 मार्च 2019

"उसूल"

चाहे भले लगे या बुरे लगे ,
मेरे उसूल कुछ हैं तो हैं ।
राहें भले ही हो कैसी भी ,
चलना इन पर मुझ को ही है ।
कायम की राय गर समझ बूझ ,
परिणाम मेरे अपने ही हैं ।
फिसल गया कभी पैर कहीं ,
तो टूटन का फिर दुख क्यों है ।
रोने से नही कुछ भी हासिल ,
मेरे सिद्धांत कुछ ऐसे ही  है ।
चल उठ संभल और बढ़ आगे ,
निर्णय ये खुद मेरे  ही है ।

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मंगलवार, 26 मार्च 2019

"ईश प्रार्थना "

मन
बैरागी
भटके क्यों
पगलाया सा
ईश्वर का वास
तेरे अन्तर्मन में

हे
जग
पालक
सर्वव्यापी
निर्गुण ब्रह्म
वन्दन अर्चन
सृष्टि सृजन कर्ता

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शनिवार, 23 मार्च 2019

"फरेब"

सौ सौ फरेब
नयनों  मे समाये
नेह दिखाये
आता नहीं यकीन
बातों पे तेरी
याद पुरानी आए
विश्वास करूँ
भूलूँ अतीत सारा
पैने से बोल
सिहरन तीरों सी
मिल न जाये
वही विश्वासघात
चिन्तित मन
मिलने से पहले
सोचे यही दुबारा
xxxxx


बुधवार, 20 मार्च 2019

"होली"

रंगों भरी घटाएँ
घिर घिर आ गई
बे सावन अम्बर  पर
बदली सी छा गई

महिना है फागुन का
सखि ! होली आ गई
वासन्ती वेला में
मस्ती सी छा गई

रंग अबीर गुलाल संग
टेसू गुड़हल के फूल
घर आंगन महक रहे
पावन रंगों के संग

चंग-ढोल की थाप पर
गूंज रहे हैं गीत
वैर-भाव को भूल कर
बने सभी मन मीत

इन्द्रधनुषी खुशियों से
सजा रहे संसार
आभामयी रंगों  का
मंगलमय त्योहार

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सोमवार, 18 मार्च 2019

"चयन"

दर्द ये कैसा , आज मन व्यथित क्यों है ?
क्या हुआ तुझको , प्रकृति बोझिल सी क्यों है ?

क्या उभर आई ,  कोई पीड़ा पुरानी ।
मौन क्यों है पगले ! खोल तू अपनी वाणी ।।

हो व्यथा अवरुद्ध , वाणी कम बोलती है ।
वेदना के तार , अश्रु जलधार खोलती हैं ।।

कर्म पथ तेरा , “चयन” तुझको करना ।
है संसार का सार , यही पर जीना मरना ।।

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बुधवार, 13 मार्च 2019

"मरीचिका'

मृग मरीचिका मन की
चिन्ह अपने छोड़ती
चल रही सैकत किनारे
क्षितिज छोर खोजती

स्व की खोज में
स्वयं में भ्रमित है
मोह माया जाल में
उलझ मन व्यथित है

बादलों में बूँद सी
आत्मा संसार में
पुष्प में सुगन्ध सी
व्याप्त है ब्रम्हाण्ड में

लहर सी समुद्र की
आवेश में आ दौड़ती
आबद्ध मोहपाश में
वापस वही पे लौटती
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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

" नवगीत "(भुजंगप्रयात छन्द)


चलो आज कोई नया गीत गायें ।
किसी की न माने बहाने बनायें।।

उड़ानेंं पंछी के परों से चुरायें ।
नमी ओस की बादलों से उड़ायें ।।

सजाये सितारे त्रियामा सुहानी ।
हवा भी सुनाती नयी सी कहानी ।।

अनोखी छबीली लिए है रवानी ।
तमन्ना हमारी किसी ने न जानी ।।

कभी चाँदनी है कभी है अंधेरा ।
कहे भोर देखो नया है सवेरा ।।

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सोमवार, 4 मार्च 2019

"अधिगम"

मौन रह कर मैं ,
मुखर होना सीख रही हूँ ।
समझदारी के बटखरों से ,
शब्दों का वजन ।
मैं भी आज कल ,
तौलना सीख रही हूँ ।
रिक्त से कैनवास पर ,
इन्द्रधनुषी सी कोई तस्वीर ।
बिना रंगों की पहचान ,
उकेरना सीख रही हूँ ।
घनी सी उलझन की ,
उलझी सी गाँठों को ।
मन की अंगुलियों से ,
खोलना सीख रही हूँ ।
भ्रमित हूँ , चकित हूँ ,
दुनिया के ढंग देख कर ।
बन रही हूँ  कुशल ,
नये कौशल सीख रही हूँ ।
भौतिक नश्वरता के दौर में ,
मैं भी आज कल ;
दुनियादारी सीख रही हूँ ।

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