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सोमवार, 29 अगस्त 2016

"बीती बातें "

कुछ कहना, कुछ सुनना;
अब बीतें दिनों की बातें हैं
अनजानी सी, अनदेखी सी;
डोर का धागा, अब टूट सा गया है ।।
तेरे सपने, तेरे अपने;
दुनियादारी और समझबूझ की बातें
तुम को 'तुम सा'
बनने से दूर करती हैं ।।
तेरे मेरे बीच का अपनापन,
जैसे एक नदी के दो पाट;
रहें साथ, चलें साथ
लेकिन पाटों का अलगाव,
कुछ सोचने को मजबूर करता है ।।
तेरी समझदारी की लहरों के बीच,
मेरी नादानियों का निर्झर सूख सा गया है
दुनियादारी की भीड़ के बीच,
अपनेपन का एक भीगा सा कोना
कहीं छूट सा गया है ।।


XXXXX

शनिवार, 27 अगस्त 2016

"क्षणिकाएँ"

(1)
आजकल पता नही क्यों?
गुलाब खूबसूरत तो बहुत होते हैं
मगर उनमें खुश्बू नही होती
लगता है इनको भी शहरों की
लत लग गई है

(2)
मेरी लिखावट में कुछ कमी सी है
काम तो भारी है
ठीक तो करना ही पड़ेगा
कुछ काम गणित के सवाल होते है
समझ में जाए तो ठीक
ना आए तो जी का जंजाल होते हैं

(3)
बातों का मौसम भी अजीब होता है
तीखी बातें सर्द हवाओं की तरह होती हैं;
जब भी चलती हैं बस ठिठुरन बढ़ा जाती हैं  


(4)
तेरी यादों का पुल्लिन्दा तकिए के सिरहाने रखा है
फुर्सत के पलों में जब जी चाहा खोल लिया;
जब जी चाहा बाँच लिया


(5)
नफरत निभाना सब के बस की बात कहाँ?
इस के लिए भी मुहब्बत से अधिक;
शिद्दत की जरुरत होती है


XXXXX

शुक्रवार, 26 अगस्त 2016

"मंथन"

बादलों की चादर ओढ़े
आजकल वह बीमार सा दिखता है
हल्के नीलेपन संग
छिटपुट अश्रुकण यत्र-तत्र बिखरे
गीलेपन का अहसास दिलाते हैं

बावरा मन, मन का क्या?
मन तो खानाबदोश है
कितनी बार समझाया
पुरातन आवरण उतार देखो
सुनहरी धूप की चमक तीखी है

बर्फ भी पिघलने लगी है
मन की गाँठें खुलने लगी हैं
कागज के पुल बनने लगे हैं
रिश्तों की गठरी खोल दो
उसे भी अपनेपन की धूप दो


XXXXX