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शनिवार, 27 अगस्त 2016

"क्षणिकाएँ"

(1)
आजकल पता नही क्यों?
गुलाब खूबसूरत तो बहुत होते हैं
मगर उनमें खुश्बू नही होती
लगता है इनको भी शहरों की
लत लग गई है

(2)
मेरी लिखावट में कुछ कमी सी है
काम तो भारी है
ठीक तो करना ही पड़ेगा
कुछ काम गणित के सवाल होते है
समझ में जाए तो ठीक
ना आए तो जी का जंजाल होते हैं

(3)
बातों का मौसम भी अजीब होता है
तीखी बातें सर्द हवाओं की तरह होती हैं;
जब भी चलती हैं बस ठिठुरन बढ़ा जाती हैं  


(4)
तेरी यादों का पुल्लिन्दा तकिए के सिरहाने रखा है
फुर्सत के पलों में जब जी चाहा खोल लिया;
जब जी चाहा बाँच लिया


(5)
नफरत निभाना सब के बस की बात कहाँ?
इस के लिए भी मुहब्बत से अधिक;
शिद्दत की जरुरत होती है


XXXXX

6 टिप्‍पणियां:


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"