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रविवार, 28 अक्तूबर 2018

आज और कल

जब से मिट्टी के घड़ों का चलन घट गया ।
तब से आदमी अपनी जड़ों से कट  गया ।।

कद बड़े हो गए इन्सानियत घट गई ।
जड़ें जैसे अपनी जमीं से कट गई ।।

खाली दिखावा रह गया नेह कहीं बह गया ।
अपनेपन की जगह मन भेद जम के रह गया ।।

नीम पीपल घर में बोन्साई सज्जा हो गए ।
कच्चे आंगन वाले घर जाने कब के खो गए ।।

मन वहीं तुलसी के बिरवे सा बंध के रह गया ।
वक्त का पहिया बस धुरी पर फिरता रह गया ।।
               
                       XXXXX

सोमवार, 22 अक्तूबर 2018

"प्रभात वेला” ( तांका )

( 1 )
उजली हँसी
खन खन खनकी
सुन के लगा
भोर वेला में कहीं
कलियाँ सी चटकी

( 2 )

एक टुकड़ा
सुनहरी धूप का
छिटक गया
मन के आंगन में
चपल हिरण सा

( 3 )

बिखर गई
अंजुरी भर बूँदें
ओस कणों की
धुली धुली निखरी
कलियाँ गुलाब की

XXXXX

गुरुवार, 18 अक्तूबर 2018

" त्रिवेणी"

( 1 ) गीली रेत पर कभी उकेरी थी एक तस्वीर ।
समेट ले गई सब कुछ वक्त की लहर ।

बस कुछ शंख सीपियों के निशान बाकी हैं ।।

( 2 ) कभी कभी बेबाक हंसी ।
बेलगाम झरने सरीखी होती है ।

गतिरोध आसानी से हट जाया करते हैं ।।

( 3 ) आज कल बोलने का वक्त है ।
कहने सुनने से आत्मबल बढ़़ जाता है ।

मछली बाजारों में बातें कहां शोर ही सुनता है ।।
XXXXX

शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2018

"माहिया" ( स्वीकारोक्ति )

(1) बचपन कब बीत गया
इस के जाने से
मन मेरा रीत गया

(2) मैं तो बस ये जानूं
तुम को  ही अपना
सच्चा साथी मानूं

(3) लम्बी बातें कितनी
नापूं तो निकले
गहरी सागर जितनी

(4) मैं याद करूं क्या क्या
बीच हमारे थीं
सौ जन्मों की बाधा

(5) छोटी छोटी बातें
अब लगती हैं सब
जन्मों की सौगातें

XXXXX

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2018

“सीख” (रोला छंद)

विषम चरण  - ११ मात्राएं
सम चरण  - १३ मात्राएं

( १ )   मन ने ठानी आज , सृजन हो नया पुराना ।
        मिली-जुली हो बात , लगे संगम की धारा ।।

( २ )   हो सब का सम्मान , कर्म कुछ ऐसे कीजै ।
        बने एक इतिहास , देख सुन के सब रीझै ।।

( ३ )   रहना सब को साथ , जिद्द होगी बेमानी ।
        विलग करो अभिमान , छोटी सी जिंदगानी ।।

( ४ )   भोर करे संकेत , हुआ है नया सवेरा ।
         दुनिया एक सराय , मुसाफिर वाला डेरा ।।

( ५ )   होते नहीं निराश , राहें और भी बाकी ।
        मन अपने को साध , वही सुख-दुख का साथी ।।

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सोमवार, 1 अक्तूबर 2018

"जीवन रंग"

भोर का तारा जा सिमटा
नींद के आगोश में ।
अरूणाभ ऊषा ने
छिड़क दिया सिंदूरी रंग
कुदरत के कैनवास पर ।

पूरी कायनात सज गई
अरूणिम मरकती रंगों से ।
भोर की भंगिमा निखर गई
प्रकृति के विविध अंगों से ।

सात रंगों की उजास ने
सूर्य प्रभामंडल संग मिल
श्वेताभ रंग बिखेर दिया ।
सृष्टि को कर्मठता से
कर्मपथ पर कर्मरत रहने
हेतु संदेश दिया ।

विश्रान्ति काल ……..,
सांझ का तारा ले आया
टिमटिमाता मटियाला कम्बल ।

चाँद-तारों से बात कर
प्राणों में ऊर्जा संचित कर ।
कर्म क्षेत्र की राह पर
कर्मठता का रथ तैयार कर ।

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