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रविवार, 31 मई 2026

“अनुत्तरित प्रश्न ”


रात अपने अंतिम प्रहर में है,
 और तारे भी बुझने लगे हैं

इन्सान होने के नाते मेरी सोच 
 कहीं खो सी गई है
 जैसे भूसे के अथाह ढेर में
 एक छोटी सी सुई ।

 कई बार कुछ प्रश्न 
 बार-बार,
सामने आ खड़े  होते हैं लेकिन 
उनके उत्तर कहीं नहीं दिखते 

एक विचार कौंधता है मन में 
 क्या केवल जीवित रहना ही
 जीवन का होना है ?

सुबह से शाम तक
 समय मनुष्य को खर्च करता रहता है,
 और मनुष्य..,
 जेब में पड़े  सिक्कों की तरह
 धीरे-धीरे खर्च होता जाता है
निरन्तर अपनी जिजीविषा को 
क्षीण होते देखता रहता है 

 छोटी-छोटी ज़रूरतों में
 उसके दिन बँट कर रह जाते हैं
 सपने..,
 जो कभी आसमान से
 विस्तृत हुआ करते थे ,
 जीवन के हिसाब-किताब के बीच
 दम तोड़ते दिखाई देते हैं।

रात के धुँधलके में
 जब तारों की रोशनी भी थक कर बैठ जाती है,
 इस तरह के अनगिनत प्रश्न
 और अधिक स्पष्ट होकर सामने खड़े हो जाते हैं

 तब एक सोच उभरती है —

क्या जीवन केवल इसलिए जीवन है 
 कि एक दिन
 हम पूरी तरह खर्च हो जाएँ,
 और किसी को
 हमारी अनुपस्थिति का कोई फ़र्क़ भी न पड़े 


***