आस किरण
लिए अपनी आब
सुनहली आशाएँ
सजी दृगों में
बन के हसीं ख्वाब
जगाती नेह राग
मुस्कुराहट
छलकी अनायास
सूर्य आभा के साथ
निर्विघ्न खुले
मन की देहरी के
सांकल चढ़े द्वार
मन का दीया
मन की देहरी पे
प्रज्वलित हो कर
कितनी बार
जाकर जलता है
गत के उस पार