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सोमवार, 5 अगस्त 2019

"सेदोका"

आस किरण
लिए अपनी आब
सुनहली आशाएँ
सजी दृगों में
बन के हसीं ख्वाब
जगाती नेह राग

मुस्कुराहट
छलकी अनायास 
सूर्य आभा के साथ
निर्विघ्न खुले
मन की देहरी के
सांकल चढ़े द्वार

मन का दीया
मन की देहरी पे
प्रज्वलित हो कर 
कितनी बार
जाकर जलता है
गत के उस पार

सोमवार, 25 फ़रवरी 2019

"विविधा"(सेदोका)

अलग अलग मूड से लिखे सेदोका , भावाभिव्यक्ति में विविधता लिए …., इसलिए शीर्षक “विविधा” उचित लगा ।

क्षितिज पार
छिटकी अरुणिमा
जीव जगत जागा
अभिनन्दन
कलरव ध्वनि से
भोर की उजास में

मौन का स्पर्श
स्नेहसिक्त सम्बल
गढ़ता पहचान
निज नेह की
खामोशी की जुबान
अक्सर बोलती है

मिटती नही
वैचारिक दूरियाँ
कैसी मजबूरियाँ
देती हैं क्लेश
कि खत्म नही होते
आपसी मनभेद

       ✍️✍️

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

"परामर्श" (सेदोका)

(1)            

तुम ही कहो
ये भी कोई बात है
अपना ही अपना
गौरवगान
समझदारी नहीं
दर्प का पर्याय है

   (2)

बुरी बात है
किसी की ना सुनना
मनमानी करना
जिद्द होती है
यदि जाना है आगे
सब के साथ चलो

     (3)

भोर का तारा
कर रहा इशारा
दिन की शुरुआत
ऊषा के साथ
कल को भूल कर
आज की नींव रख

       XXXXX

बुधवार, 18 जुलाई 2018

"सेदोका”

        (1)

अंजुरी भर
रंग छिड़क दिये
कोरे कैनवास पे
उभरा अक्स
ओस कणों से भीगा
जाना पहचाना सा

(2)

धीर गंभीर
झील की सतह सा
सहेजे विकलता
मन आंगन
कितना  उद्वेलित
सागर लहरों सा

  (3)

तुम्हारा मौन
आवरण की ओट
कहानी कहता है
एक लक्ष्य है
अर्जुन के तीर सा
चिड़िया के चक्षु सा


XXXXXXX