जब पछुआ खेतों की..,
मेड़ों से ठंडी खबर लेकर आती
तो देह ही नहीं,
मन भी सिहर उठता ।
बरखा की पहली बूँद
कच्चे आँगन पर गिरने के साथ
मिट्टी से उठती सोंधी गंध और
हँसी के अंकुर..,
बौछार बन बरसने लगते ।
बारिशें अब भी हैं,
मगर…
अब घरों में..,
खिड़कियों पर शीशे हैं
दरवाज़ों पर कुंडियाँ हैं
और घरों के भीतर
मौसम से बेख़बर जीवन है
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