मौन में..,
शब्दों का अभाव नहीं
अर्थों की पराकाष्ठा
छिपी होती है ।
मौन..,
आवरणों के पार जाकर
उन अनकहे इतिहासों को लिखता है,
जिन्हें शब्द कभी कह नहीं पाते ।
कभी-कभी..,
मौन के साथ दृष्टि अपनी नहीं
अर्जुन की सी लगती है
स्थिर, एकाग्र और अडिग ।
जहाँ लक्ष्य..,
सिर्फ़ लक्ष्य नहीं रहता,
धीरे-धीरे
साधना का पर्याय बन जाता है ।
और तब..,
मौन बोलता नही अपितु हृदय पर
लिख देता है अमिट सत्य ।
जिसे सुनने के लिए
कानों की नहीं,
अन्तरात्मा की आवश्यकता होती हैं ।
क्योंकि ..,
कुछ आवाज़ें शब्दों में नहीं,
मौन में ही गूँजती हैं ।
***
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- "मीना भारद्वाज"