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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

“मौन”

मौन में..,
शब्दों का अभाव नहीं
अर्थों की पराकाष्ठा
छिपी होती है ।

मौन..,
 आवरणों के पार जाकर
 उन अनकहे इतिहासों को लिखता है,
 जिन्हें शब्द कभी कह नहीं पाते ।

कभी-कभी..,
 मौन के साथ दृष्टि अपनी नहीं
 अर्जुन की सी लगती है
 स्थिर, एकाग्र और अडिग ।

जहाँ लक्ष्य..,
 सिर्फ़ लक्ष्य नहीं रहता,
  धीरे-धीरे
 साधना का पर्याय बन जाता है ।

और तब..,
 मौन बोलता नही अपितु हृदय पर
 लिख देता है अमिट सत्य ।

जिसे सुनने के लिए
 कानों की नहीं,
 अन्तरात्मा की आवश्यकता होती हैं ।

 क्योंकि ..,
कुछ आवाज़ें शब्दों में नहीं,
 मौन में ही गूँजती हैं ।

***