Followers

Copyright

Copyright © 2021 "मंथन"(https://www.shubhrvastravita.com) .All rights reserved.

शनिवार, 16 अक्तूबर 2021

कुछ दिनों से....

कुछ दिनों से

खुद ही हारने लगी हूँ

अपने आप से

दर्द है कि घर बना बैठा

तन में…,

घिरते बादलों और डूबते सूरज

को देखते-देखते

ठंड बाँध देती है 

मेरे इर्दगिर्द

 दर्द और थकन की चादर

ज्यों ज्यों गोधूलि की चादर

लिपटती है धरा की देह पर

मन छूने लगता है

झील की अतल गहराई 

 भोर के इन्तज़ार में

नौका पर सवार मांझी

चंद शफरियों की टोह में

ज्यों ही दिखता है

तब….,

बादलों से भीगा

गीला सा एक विचार

थपकियों के साथ देता है

स्नेहिल धैर्य…,कि

इस रात की भी

कभी तो सुबह  होगी 


***


रविवार, 26 सितंबर 2021

अभी-अभी...

                     


अभी-अभी तो राह मिली थी

एक-दूजे को जानें कितना

एक जन्म छोटा लगता है

 नेह गहरा सागर के जितना


अनुमानों की राह पकड़ के

पर्वत पार करेंगे कैसे

चंद दिनों के संग साथ से

हमराही हम होंगे कैसे


घर- आंगन के हर कोने से 

स्मृतियों के तो तार जुड़े है

कौन तार गठरी में बाँधू

सब के सब अपने लगते हैं


इसमें अलग बात कौन सी

दुनिया की यह रीत पुरानी

कठिन लगी होगी यह मुझको

पर जीवन की यही कहानी


***

शनिवार, 18 सितंबर 2021

"चाँद"

                    

 कभी गाढ़ी नहीं छनी

इन आँखों की नींद से

बहाना होता है 

इनके पास जागने का

कभी थकान का 

तो कभी काम का

खुली छत पर..

तब भी तुम आया करते थे

हॉस्टल के अनुशासित

 वार्डन सरीखे

और आज भी..

बिलकुल नहीं बदले तुम

मगर वक्त के साथ

कितना बदल गई मैं


***



मंगलवार, 7 सितंबर 2021

"रिक्तता"

                      

 ताकती परवाज़े भरती

 चील को..

बोझिल,तन्द्रिल दृग पटल मूंद

लेटकर…, 

धूप खाती रजाईयों पर

 शून्य की गहराईयों में

 उतरना  चाहती हूँ


लिख छोड़ी है

 एक पाती तुम्हारे नाम 

 पढ़ ही लोगे 

मेरे मन की बात

जे़हन में ताजा है मेरी

कितनी याद..

तुम्हारी आँखों में

उस बेलिखी इब़ारत को

देखना चाहती हूँ


ख़फा हूँ खुद से ही

ना जाने क्यों..

नाराजगी की वजह

कुछ तो रही होगी

फुर्सत मिलेगी तो

वहीं 'वजह' 

ढूंढना चाहती हूँ


***

【चित्र :- गूगल से साभार】




शुक्रवार, 3 सितंबर 2021

बिन बुलाए मेहमान सी...,

                   

बिन बुलाए मेहमान सी

चली आती हो सात तालों में बंद

 मेरे मन के दरवाजे पर..

कभी अनुराग बन

तो कभी विराग बन

तुम्हारी अंगुली थामें

चंचल हिरण सा... 

मेरा मन थिरकता है

खुले दरवाजे की दहलीज पर

मेरा मौन मुखर हो विहंसता है

अचानक कहीं से विहग की

टहकार आती है

बेसुध सी चेतना 

वर्तमान के आंगन में 

आज की महत्ता का

मंथन कराती है

मौन की गहराइयों में 

मन डूबता-उतराता है

और इसी के साथ

एक-एक बंद ताले 

साकार और सजीव हो ...

मांग उठते हैं हिसाब

अपनी-अपनी गुमशुदा कुंजी का…


***

【चित्र :- गूगल से साभार】


गुरुवार, 26 अगस्त 2021

"निर्वात"

गर्मजोशी से लबरेज़

 तुम्हारा स्टेटस... 

 पुराने सन्दूक में छिपाये

 उपन्यास जैसा लगा

 मुझे वो भी प्रिय था 

और तुम भी

तुम से 

जुदाई के वक्त

अपने नेह पर

यकीन की खातिर

एक बार कहा था-

तुम ऑक्सीजन हो

हमारे खातिर

हमारी प्राणवायु….

आज तुम्हें देख कर

लगता है 

तुम तो किसी और आंगन में

तुलसी,मनीप्लान्ट, 

पीपल,बरगद

सब कुछ हो…

हम तो बस उस 

पुराने वादे के साथ

निर्वात में जी रहे हैं


***

शनिवार, 21 अगस्त 2021

पहली पहल बरसेंगे बादल...

 पहली पहल बरसेंगे  बादल

 और माटी भी महकेगी 

मैं होऊं चाहे कहीं भी

यह महक मेरी अपनी सी है

मुझे याद बहुत आएँगी


आधा उजला सा चाँद

जब उतरेगा नभ आँगन में

कोहरे में लिपटी कुछ यादें

 बेमतलब सी खाली बातें

मुझे याद बहुत आएँगी


मेरी आदत कुछ कहने की

तेरी आदत चुप रहने की

भरने बोझिल निर्वात 

बन जाती नेह की नींव

एक तुलसी वाली चाय

मुझे याद बहुत आएगी


***

【चित्र:-गूगल से साभार】

रविवार, 15 अगस्त 2021

" स्वन्तत्रता दिवस"


आओ सब मिल कर आज ,स्वन्तत्रता दिवस मनायें ।


     शहीदों को याद करें ,

     मान से शीश झुकायें ।।

     फहरायें तिरंगा शान से ,

     गर्व से जन गण मन गायें ।।


     आओ सब मिल कर आज ,स्वन्तत्रता दिवस मनायें ।


     सीखें समानता बन्धुता का पाठ ,

     राष्ट्र का मान बढ़ायें ।

     त्यागें राग द्वेष का भाव ,

     कुटुम्ब खुशहाल बनायें ।।


    आओ सब मिल कर आज ,स्वन्तत्रता दिवस मनायें ।


     व्यक्तिगत को भूल कर ,

     समष्टिगत को जीवन सार बनायें ।

     करें सब की इच्छा का आदर ,

     सामान्य इच्छा का सिद्धांत अपनायें ।।


     आओ सब मिल कर आज ,स्वन्तत्रता दिवस मनायें ।

---

आप सबको स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई 🙏🙏

【2018 में स्वतन्त्रता दिवस पर पोस्ट  मेरी एक रचना 】

                              

सोमवार, 9 अगस्त 2021

"माँ"

                           



हे गोविंद.. हे कृष्ण मुरारी…

मंदिर की घंटियों सी

कानों मे  गूंजती

मीठी सी आवाज से

खुलती थी नींद..


चाय की भाप की ओट से

 उजला सा चेहरा

यूं लगता जैसे

धीमे से सुलगते

 लोबान के पीछे 

हो कोई मन्दिर की मूरत ...

 

बहुत सी बातें 

चाँद -सितारों की

जीवन के सिद्धांतों की

मेरे अल्हड़पन की

देश-विदेश की

तुम्हारे नेहसिक्त सानिध्य की...


मगर इन सबके बीच 

 बहुत कुछ ऐसा है

जो रह गया अधूरा

उस आधूरेपन की कशिश

 आज भी  देती है खलिश

गाहे-बगाहे…


***














मंगलवार, 3 अगस्त 2021

"सफ़र"




पल-पल के

 हिसाब से

 तय करती  है

अपना सफ़र…

समय ही कहाँ  है

 इसके पास

चोटी या जूड़ा बनाने का...  

बाल कटने के बाद 

 पोनी टेल भी

 अच्छी ही लगती है

खंजन-नयन

 देखने दिखाने की

फुर्सत किसके पास है

'अकॉर्डिंग टू फेस' गॉगल्स

काफी है खूबसूरती में 

चार चाँद की खातिर…

नन्हे गुड्डे या फिर गुड़िया को

छोड़ती हुई 'डे केयर' में

भागती सी

खींच लेती है अपनी

 पोनी का रबरबैंड और

डाल लेती है

 कलाई में कंगन सा...

कंघी की जगह तेजी से 

फिराती बालों में अंगुलियाँ

करती है रोड-क्रॉस

समेटे कंधे के बैग में

 संधान रूपी तीर

अब इतना करने के बाद

भला...

कौन रोक पाएगा इसको 

अर्जुन की मानिंद

करती दरकिनार

बाधाओं को

ये तो चल पड़ी है

भेदने अपना लक्ष्य 


  ***

【चित्र:-गूगल से साभार】




शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

"खामोशी"


सहज कहाँ है

 इसको साधना

देख कर भी

करना पड़ता है अनदेखा 

सहने पड़ते हैं

विष बुझे तीर..

गरल  सा

पीना पड़ता है

न चाहते हुए भी

अपमान का घूंट

 कभी कभी विवेक 

दे कर.., 

स्वाभिमान का ताना

फूटना चाहता है

आक्रोश बन लावे सा

तब..

बुद्धि समझदारी की

चादर ओढ़ कर

बन जाती है माँ…

 लोरी सी थपकी 

के साथ

 अन्तस् में उठता 

एक ही भाव….

बड़ी दुर्लभ है यह

किलो या ग्राम में

कहाँ मिलती है

दुनिया के बाजारों में 

कितनी ही ..

आत्म-पराजयों के बाद

खुद की जय से 

सधती है खामोशी ….


★★★

शनिवार, 24 जुलाई 2021

सुनहरी धूप का टुकड़ा...

 



कई दिनों से

 लगातार..

 बरस रहे हैं

 काले बादल

तुम्हारी तरफ से

आने वाली 

पछुआ के साथ

अंजुरी भर धूप की

 एक गठरी भेज दो

उन्हीं  के छोर से

मैं भी बांध दूंगी

थोड़ी सी नमी 

धूसर बादल के साथ

पता है.. जब,

धरती पर उतरते

 बादलों के संग

पानी की बौछारें 

बरसती हैं 

धुआं सी तो,

 दृग पटल भी

थक कर 

धुंधलाये से लगते हैं

कब निकलेगा

 बादलों की ओट से

सुनहरी धूप का टुकड़ा

बस…,

उसी की राह तकते हैं


★★★