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शनिवार, 24 जुलाई 2021

सुनहरी धूप का टुकड़ा...

 



कई दिनों से

 लगातार..

 बरस रहे हैं

 काले बादल

तुम्हारी तरफ से

आने वाली 

पछुआ के साथ

अंजुरी भर धूप की

 एक गठरी भेज दो

उन्हीं  के छोर से

मैं भी बांध दूंगी

थोड़ी सी नमी 

धूसर बादल के साथ

पता है.. जब,

धरती पर उतरते

 बादलों के संग

पानी की बौछारें 

बरसती हैं 

धुआं सी तो,

 दृग पटल भी

थक कर 

धुंधलाये से लगते हैं

कब निकलेगा

 बादलों की ओट से

सुनहरी धूप का टुकड़ा

बस…,

उसी की राह तकते हैं


★★★


सोमवार, 19 जुलाई 2021

प्राकृतिक सुषमा【ताँका】

भोर की वेला

सुरभित कुसुम

मृदु समीर

हिमाद्रि आंगन में

नैसर्गिक सुषमा


सावन भोर

धरती के पाहुन

धूसर घन

उतरे अम्बर से

छम छम बरसे


मध्याह्न वेला

बाँस के झुरमुट

मंद बयार

बौराई सी चलती

सरगम बजती


सिंदूरी जल

कर में पतवार

नैया में मांझी

लहरों का गर्जन

बड़ी दूर किनारा


★★★




गुरुवार, 15 जुलाई 2021

जब नित्य लगे सांझ घिरने...,

जब नित्य लगे सांझ घिरने,

घर- आंगन में गौरेया सी।

आ जाती हैं मन के द्वारे,

ये सुधियां भी अवचेतन सी।।


जो बीत गया जीवित करती,

दृग पट पर नव सृष्टि रचती।

गिरने से पूर्व संभलने का,

करती संकेत सीखने का।।


खुद का अस्तित्व बचाने में,

बस जीवन बीता जाता है।

सौ झंझट हैं तो हुआ करे,

बस कर्मयोग से नाता है।।


तारों के झिलमिल आंगन में,

लो ! संध्या डूबी जाती है।

आने में हो जाती अबेर,

यह सोच निशा पछताती है।।


आलोक रश्मियां धुंधली सी,

मेरे अन्तस् का तम हरतीं ।

निर्बल क्षण में संबल बनती,

मुझ में विलीन ये मुझ जैसी।।


***

शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

ख़्वाब

 

सूखी रेत के

 ढूह पर…,

तुम्हारा मन है कि

तुम बनाओ

एक घरौंदा

तो बनाओ ना…,

रोका किसने है

छागल में अभी भी

 बाकी है 

पानी की बूँदें,

एक घरौंदे की 

 गीली रेत जितनी

आज...

समय और फुर्सत से

कर लो अपना

 ख़्वाब पूरा

तुझमें  - मुझमें

बाकी है अभी

 इतना हौसला कि

पहुँच जाएंगे कुएँ के पास

 या फिर …,

खोद लेंगे एक कुँआ

अपनी छोटी सी

प्यास की खातिर 

***

【चित्र : गूगल से साभार】



मंगलवार, 29 जून 2021

जी करता है किसी से मिल करके देखें,


जी करता है  किसी से आज मिल करके देखें,

अपनों से दिल की बात हम करके देखें ।


खैर न खबर उनकी बीते जमाने से,

जा कर उन्हीं के पास हैरान करके देखें ।


उनको लगा कभी हम नहीं थे उनके साथ,

कितना करते हैं वो याद जाँच करके देखें ।


दोस्ती में मिला हमें बेमालूम सा एक नाम,

 तोहफे में वहीं  नाम उनका रख करके देखें ।


झील के उस पार फिर निकलेगा पूरा चाँद,

फुर्सत बहुत है आज जरा टहल करके देखें ।


कौमुदी की छांव और परिजात के फूल,

दिल अजीज  मंज़र को जी भर करके देखें ।


 दोस्तों की महफिल में जरा बैठ करके देखें,

कुछ दिन अपनों के बीच बसर करके देखें ।


***




 

 


गुरुवार, 17 जून 2021

"नेह"

तुम्हारा नेह भी

हवा-पानी सरीखा  है

चाहने पर  भी 

पल्लू के छोर से

बंधता नहीं

बस…,

खुल खुल जाता है 

कभी-कभी…,

चुभ जाता है

कुछ भी

 अबोला सा बोला

जैसे कोई टूटा काँच…,

कुछ समय की

 खींचतान...

और फिर 

कुछ ही पल में

एक सूखी सी

 मुस्कुराहट…,

फर्स्ट एड का रुप धर

बुहार देती है मार्ग के

कंटक…,

कोई नाम नहीं

न ही कोई उपमा

अहं की सीमाएँ लांघ

निर्बाध बहता

तुम्हारे नेह का सागर

बिन बोले 

जता जाता है तुम्हारे

नेह की परिभाषा


***

गुरुवार, 10 जून 2021

"विभावरी"

                         

शुक्ल पक्ष की चाँदनी में

 भीगी रातें..,

जब होती हैं

अपने पूरे निखार पर

तब...

 रात की रानी 

मिलकर

 रजनीगंधा के साथ

टांक दिया करती हैं 

उनकी खूबसूरती और

मादकता में

चार चाँद ..

उन पलों के आगे

कुदरत का 

सारा का सारा

सौन्दर्य

ठगा ठगा

और

फीका फीका सा लगता हैं

फूलों का राजा

 गुलाब

 तो बस यूं हीं .., 

गुरूर में

ऐंठा-ऐंठा फिरा करता है ।


***

शुक्रवार, 21 मई 2021

"नाराजगी"

बादल!

सावन में अब की 

बरसो तो…

लाना कुछ ऐसा

जिससे हो 

इम्यूनिटी बूस्ट

जरूरत है उसकी

मनु संतानों को

जो रख सके

उनके श्वसन को मजबूत

चन्द्र देव!

बड़े इठला रहे हो

यह ठसक

किस काम की ?

जब...

सदियों से तुम्हारी प्रशंसा में 

 कसीदे पढ़ने वालों की

  नींव...

 दरक रही है धीरे-धीरे

सुनो !

 जड़-चेतन साझा सहभागी हैं

प्रकृति के ..,

हम भी उन्हीं की संतान हैं

और माँ की नजर में तो

 सभी समान है

माना कि..

हो गई मानव से कुछ गलतियां

 खुद को सृष्टि में सबसे 

ताकतवर और बुद्धिमान 

समझने की गलतफहमियां

अब बस भी करो…

कितनी सजा और दिलवाओगे

 अगर न रहा मनुज

तो अपने आप में अधूरेपन की

सजा तुम भी तो पाओगे


***

शनिवार, 15 मई 2021

"प्रश्न"

काम से कभी कोई,

 थकता  कहाँ था  ।

उलझनों से दौर से,

डरता कहाँ था   ।।


सांसों से बंधे हैं, 

सबके जीवन- सूत्र ।

आज जो मंजर है कल 

 सोचा कहाँ था ।।


जीत में जश्न क्या,

हार पर विमर्श क्या ?

जीव तो जीव ही था, 

 आकड़ा कहाँ था  ।।


 अपने में खोया ,

कुछ जागा कुछ सोया ।

 पहले मन कभी इतना 

अकेला कहाँ था ।।


 रेत के सागर से रखी

 मीठे जल सी चाह। 

  दुनिया में  मुझसा नासमझ

कोई दूसरा कहाँ था ।।


***

रविवार, 2 मई 2021

।। क्षणिकाएं।।

                 

लबों को रहने दो खामोश

काफी है, 

आँखों की मुस्कुराहट ।

बर्फ ही तो है

इस आँच से ,

बह निकलेगी ।

**

हौंसला और जिजिविषा

 देन है तुम्हारी ।

 विश्वास की डोर का 

छोर भी ,

तुम्हीं से बंधा है ।

जानती हूँ 

रात के आँचल के छोर से,

यूं ही तो बंधी होती है ।

उजली भोर के,

सुनहरे आँचल की गाँठ ।

**

 कई बार

अनुभूत पलों का,

मुड़ा-तुड़ा कोई पन्ना ।

बाँचना चाहती हैं आँखें ,

मगर 

इज़ाज़त कहाँ देता है ,

जटिल बुनावट वाला विवेक ।

समझदारी के फेर में

कस कर मूंद  देता है ,

सुधियों भरा संदूक ।

**


रविवार, 25 अप्रैल 2021

"त्रिवेणी"



ईर्ष्या और रंजिश के भाव...

फसल के रुप में उगते तो नहीं ।


बस अमरबेल से पल्लवित हो जाते हैं ।

--


 हाथ मिलाने भर से क्या होना है..,

 गले लग कर भी अपनापा महसूस नहीं होता ।


 दिल की जमीनें भी अब ऊसर होना सीख गई है ।।

--


ऑनलाइन मंगवाया सामान कभी कभी…,

दरवाजों पर पड़ा पूछता सा लगता है कुशलक्षेम ।


कभी-कभी संवेदनाएँ  यूं भी दिखती हैं ।।

--


शहर और गाँव उदास व गमगीन हैं..,

इन्सान भी हताशा और निराशा में डूबा है ।


'कोरोना' को फिर से भूख  लगी  है ।।


***

रविवार, 18 अप्रैल 2021

"प्रश्न"

                      

लीक पर चलती 

पिपीलिका..

एकता-अनुशासन और

संगठन की प्रतीक है

आज हो या कल

 बुद्धिजीवी उनकी

कर्मठता का लोहा मानते  हैं

प्रकृति के चितेरे सुकुमार कवि

 सुमित्रानंदन पंत जी ने भी कहा है-

"चींटी को देखा?

वह सरल, विरल, काली रेखा

चींटी है प्राणी सामाजिक,

वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक।"

कविता याद करते समय

 एक खुराफाती प्रश्न

मन में अक्सर  उभरता था

मगर…,

काम के बोझ में डूबी माँ

और होमवर्क की कॉपियों में

डूबी शिक्षिका की

हिकारत भरी नज़रों से

बहुत डरता था

है तो धृष्टता..,

 लेकिन आज भी

मेरे मन में यह बात

 खटकती है

और प्रश्न बन बार-बार उभरती है

प्रश्नों का क्या ?

किसी के भी मन में आ सकते हैं

मैं इस धृष्टता के लिए

क्षमा चाहती हूँ

और अपना वही पुराना

घिसा-पीटा सा प्रश्न

 दोहराती हूँ

पिपीलिका अगर लीक पर

चल कर भी..

साहस और लगन की प्रतीक है

तो…,

लीक पर चलने वाला इन्सान

क्यों"लकीर का फकीर" है


***

【चित्र-गूगल से साभार】