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सोमवार, 8 नवंबर 2021

"नदी"

न जाने क्यों..,
बहती नदी 
मुझे इन दिनों
थमी-थमी सी लगती है 
लगता है ...
तटस्थता ओढ़े वह
मंथर गति से 
बढ़ी जा रही है
किनारे-किनारे
उसकी अप्रत्याशित सी 
खामोशी…,
उद्विग्नता के बावजूद
‘अंगद के पांव सी‘अपनी
पराकाष्ठा लिए स्थिर है

***

19 टिप्‍पणियां:

  1. सम्भवतः आपकी अपनी अनुभूति ही इन शब्दों में उतर आई है।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. भावाभिव्यक्ति सराहना हेतु हार्दिक आभार जितेन्द्र जी ।

      हटाएं
  2. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार
    (9-11-21) को बहुत अनोखे ढंग"(चर्चा अंक 4242) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है..आप की उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी .
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  3. मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद कामिनी जी।

    जवाब देंहटाएं
  4. धावक के तीर जैसी गहरे भाव समेटे अभिनव सृजन।
    मन के आलोड़न और ऊपर की स्थिरता को दर्शाता मानव व्यवहार ठीक नदी सा ही है न जाने कितने भंवर मचलते हैं भीतर ।
    वाह!

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपकी अनमोल व्याख्या ने सृजन को सार्थक किया ।आपका हृदय से असीम आभार कुसुम जी !

      हटाएं
  5. थावक को नावक पढ़ें कृपया।

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत गहरे भाव समेटे गूढ़ रचना ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार जिज्ञासा जी!

      हटाएं
  7. न जाने क्यों..,

    बहती नदी 

    मुझे इन दिनों

    थमी-थमी सी लगती है 

    बहुत सुन्दर

    जवाब देंहटाएं
  8. उत्तर
    1. सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार अनीता जी !

      हटाएं
  9. जब खामोशी की जरूरत हो तो तटस्थता बेहतर है
    विचारणीय एवं लाजवाब सृजन।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. सारगर्भित सराहना सम्पन्न प्रतिक्रिया ने सृजन को सार्थक किया ।आपका हृदय से असीम आभार सुधा जी !

      हटाएं
  10. नदी की प्रवृति खामोश है पर बहते रहना भी उसी का स्वभाव है ... मंथर हो कर भी चलती रहती है ...

    जवाब देंहटाएं


“मेरी लेखन यात्रा में सहयात्री होने के लिए आपका हार्दिक आभार…. , आपकी प्रतिक्रिया‎ (Comment ) मेरे लिए अमूल्य हैं ।”

- "मीना भारद्वाज"