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रविवार, 28 अप्रैल 2019

“माँ”

मेरी खातिर
नैसर्गिक आनंद
माँ का आंचल

माँ मेरे लिए
बरगद की छांव
था तेरा अंक

सुन मेरी  माँ
मुझे लगे बेगाना
जग का मेला

जीवन मेरा
मंझधार की नैया
बिन तेरे माँ

अश्रुपूरित
यादोँ के पुष्प
माँ को अर्पित

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सोमवार, 22 अप्रैल 2019

"गर्मी की छुट्टियाँ"

जाने को है वसन्त
पक गए
सरसों के फूल
धरा ने पहने
वासन्ती  वसन

वृक्षों के तन पर
शोभित सुवासित
नव कलिकाएं
मन्जुल मंजरियाँ
आमों के टिकोरे
मलयानिल झकोरे

पूर्वोत्तर क्षितिज पर
बिखरा सोना
कोयल की कूहुक
देती दस्तक
उजली भोर की ।

गर्मी की छुट्टियां
बच्चों की टोलियां
कूदती-फांदती
छुपती-छुपाती
कभी इस डाल
कभी उस डाल

तोड़ती अम्बियाँ
इमली की गुच्छियां
अमरूद , लीचियाँ
लूट का सामान
आपस में बांटती
रूठती मनाती

गाँवों की बागीचियाँ
घनी अमराईयाँ
भरी दोपहरी  
मूक गवाह
चंचल बचपन की




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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

"धारा"

(This image has been taken from Google)

जोड़ती  तटबन्ध
करती समृद्धि का उद्घोष
संस्कृति की पोषक
मानवता की रक्षक
धारा ……, जब
मन्थर हो कर बहती है
नई राहें खोजती
ध्वंसावशेष छोड़ती
गर्व के मद में चूर
हो विवेक शून्य दौड़ती
धारा ….., जब
उन्मुक्त गति से बहती है
मन मानव का.., जीये चाहे वैसा
जीवन है अपना....,धारा के जैसा

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शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

"उस पार"


भरे उर मे बैचनियाँ
शफरियों को ढूँढता
सागर के उस पार
मांझियों का कारवां

तप्त भानु रश्मियाँ
उमस की दुश्वारियाँ
संजोए मन में आस
गीत गुनगुना रहा

कुछ जागे कुछ सोये
नम दृगों की ओट से
झांकते मुठ्ठी भर ख्वाब
निज अस्तित्व टटोलते


सुखद आगत ढूँढती
झोपड़ियाँ खैपरल की
तकती सुदूर लैम्पपोस्ट
तम में उजास खोजती

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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

"कौन हो तुम"

सांझ की वेला में
टिम-टिम करते
दीयों सी
सलमें-सितारों वाली
धानी चुनर ओढ़े
भाल पर
चाँद सा टीका सजा
और अलकें बिखराए
घनी घटाओं का
नयनों में काजल
जूड़े में मोगरे की
लटकन लटकाए
इठलाई सी
भ्रमित हुई सी
कौन दिशा से आई हो?
कल देखा था
तुझे जलधि तट पर
आज मिली हो
निर्जन वन में
शावक छोने सी
चंचल हिरणी सी
इस लोक की
हो सुन्दरी
या देव लोक से आई हो
रूप मनोहर
बहुत तुम्हारा
सुरबाला की
अनुकृति लगती हो

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मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

“पुष्प” (तांका)


फूलों की बात
जब छिड़ ही गई
लम्बी चलेगी
अनुराग जगाते
आकर्षित करते

बेला के फूल
मादक सी महक
श्वेताभ आभा
श्रृंगारित वेणियाँ
सजती  युवतियाँ

मनमोहक
भरे राग उर में
ओस में भीगी
कलियाँ गुलाब की
चक्षु तृप्ति भरती

तारों की छाँह
चाँदनी में झरते
हरसिंगार
उडुगण के जैसे
वसन वसुधा के

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